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चंद्रमा और उनसे निर्मित योग

AACHARYA YATIN S UPADHYAY 09th Mar 2017

ज्योतिष में चंद्रमा को मन कहते है ( चंद्रमा  मनसो जायता ) मन ही बंधन का कारण  है वा मन ही मुक्ति का  कारण  है । मूल रूप से मनुष्य अकेला पैदा होता है  व अकेला ही मरता है । यह मन ही है जो मानता है यह मेरा मित्र है  वह मेरा शत्रु है  या  मै  अकेला हूँ घर परिवार व समाज मे मेरा कोई नहीं है । मेरे को किसी का साथ नहीं मिलता  है ।  जिस व्यक्ति के मन में अकेलापन घर कर जाता है  तनाव, चिड़चिड़ापन  उसके व्यक्तित्वमे समां जाता है अन्तो गत्वा सब उससे दूर होते जाते  है  व वह  अवसाद का शिकार हो   जाता है । 

चन्द्रमा व उसके आगे पीछे  स्थित होने वाले गृहो की  युतिके  आधार पर  बनने  वाले योगों के बारे में जानकारी प्राप्त करे जो निम्न  अनुसार है :-
सुनफा योग :
चंद्रमा से दुसरे  भाव में सूर्य को छोड़ कर कोई गृह हो तो सुनफा योग बनता है । ऐसे योग  में जातक स्वयं के प्रयास  से धनि , उत्तम बुद्धि  से युक्त  तथा  यसस्वी होता है । 
योग  कारक  मंगल हो तो जातक उत्साही,साहसी, धनवान एवं  उग्र पृकृति । 
योग कारक  बुध हो तो  तो चतुर, वाक कला   में निपुर्ण । 
योग  कारक गुरु हो तो   विद्या वान ,  राज पूजित , धनि । 
योग कारक  शुक्र हो  तो कामी,  विषय भोगी  । 
योग कारक  शनि हो तो अपने श्रम  से अपनी स्थिति मजबूत करता है । 
अनफा योग :
चंद्रमा से द्वादस  भाव में सूर्य को  छोड़कर कोई गृह  हो तो अनफा योग बनता है । अनफा योग से युक्त जातक भोग युक्त जीवन व मानसिक चिंताओ से मुक्त रहता है । योग कारक गृहो  का वर्णन निम्न अनुसार है :
योग कारक  मंगल हो तो  मानी, क्रोधी,साहसी। 
योग करक  बुध हो तो शिल्पी,लेखक, कवी, वक्ता । 
योग कारक  गुरु हो तो राज पूजित, धार्मिक, गम्भीर, सतोगुणी होता है । 
योगकारक  शुक्र हो तो विलाशी,बुद्धिमान, धन युक्त होता है । 
योग करक शनि हो तो  वचन निभाने वाला दलितो का नेता होता है । 
दुरुधरा योग 
:
चंद्रमा के आगे व पीछे  सूर्य को छोड़ कर  कोई गृह हो तो दुरुधरा  योग बनता है । ऐसा जातक धनि, मानी, सफल, सुखी जीवन जीता है । हमेशा लोगो से घिरा रहता है । कभी अकेला नहीं रहता है । हमेसा लोगो की  चाहत व आकर्षण का केंद्र  बना रहता है । योग कारक गृहो के अनुसार फल में परिवर्त्तन निम्न अनुसार होता है :
योग कारक  मंगल व बुध हो तो  असत्य बोलने वाला  व लोभी होता है । 
योग कारक  मंगल व गुरु हो तो ज्ञानी, बलवान, धर्म की रक्षा करने  वाला  होता है । 
योग करक गृह मंगल व शुक्र हो तो बहादुर, भोगी , विषय व कामना पर ज्यादा ध्यान । 
योग कारक  मंगल व शनि हो तो क्रोधी व चुगलखोर होता है । 
योग कारक  बुध व गुरु  हो तो   शास्त्रज्ञ , सज्जन व्यक्तियो का संग  व धर्म  प्रेमी होता  है । 
योग  कारक बुध शुक्र हो तो गीत संगीत, कला में अभिरुचि , वाक   पटु, श्रृंगार रस का कवी  । 
योग  कारक  बुध व शनि हो तो  अल्प ज्ञानी , बंधुओ से बेर । 
गुरु शुक्र  से योग बने  तो राज पूजित , यश, ऐश्वर्य, धर्म पूर्ण जीवन । 
गुरु व शनि योग कारक  हो तो सेवा भाव, शान्ति पूर्ण जीवन, त्याग व तपस्या की तरफ आकर्षण । 
शुक्र व शनि होने पर कुलीन स्त्रियो में रूचि रखने वाला   उनसे प्रेम की चाहत बनी रहती है । 
केमद्रुम  योग :
चंद्रमा जिस भाव में बेठा हो उसके आगे पीछे कोई गृह नहीं  हो तो ऐसे  योग को केमद्रुम  योग कहते है  । 
चंद्रमा हमारे मन का कारक  होता है ऐसे में उसके आगे पीछे कोई गृह स्थित नहीं हो तो मन में एक भाव उत्पन्न होता है  की परिवार व समाज में मेरा कोई नहीं है मै  अकेला हूँ । धीरे धीरे उसका वेवहार भी अकेलेपन का बनने लगता है । वह परिवार व समाज के हर आदमी में  दुर्गुण ढूंढ़ने लगता है । 
परिणाम सब उससे दूरी बनाने लगते है  , मानव चिड़चिड़ापन का शिकार हो जाता है । तनाव में रहने लग जाता है ।  अंततोगत्वा अवसाद का शिकार हो जाता है  अपना शत्रु स्वयं बन जाता है  । 
ऐसा जातक किसी भी परिवार में जन्मे दरिद्र हो जाता है, अपमानित जीवन जीने   के सारे रास्ते स्वयं बना लेता है । 
केमद्रुम योग के अपवाद :
निम्न स्थितियों में केमद्रुम योग निस्प्रभावी होगा यथा । 
- चंद्रमा की आगे पीछे कोई गृह नहीं है पर चंद्रमा के साथ सूर्य को छोडकर  कोई गृह स्थित है  तो केमद्रुम योग भंग । 
-चंद्रमा से केंद्र में कोई गृह है  तो केमद्रुम योग भंग । 
-लग्न से केंद्र में कोई गृह है तो केमद्रुम योग भंग । 
उपरोक्त तथ्यो से इस निष्कर्ष  पर पहुचते है कुंडली का फलित जान्ने के लिए धैर्य , एकागर्ता , कुंडली सब योगो  के बारे गहरी  समझ होनी  चाहिय तभी फलित का सही निर्णय सम्भव है ।

इस प्रकार कुंडली में कोई दुर्योग है  और उसके दुष्परिणाम सामने आ रहे है तो अच्छे ज्योतिषी को पत्रिका दिखा कर  उचित उपाय के प्रयोग से जीवन को सफल बनाया जा सकता है ।

मनो दशा  पर विपरीत प्रभाव की स्थिति में :

ॐ ह्रीम  नमः 

का निरंतर जप हर समस्या को दूर कर सकता है । 
मोती धारण करना काफी लाभदायक रहेगा


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