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चिकित्सा ज्योतिष , MEDICAL ASTROLOGY

Gurvinder Singh 28th Nov 2018

चिकित्सा विज्ञान का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना कि धरती पर मनुष्य जीवन। चिकित्सा ज्योतिष विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो हजारों वर्षो से मनुष्य जीवन में अहम किरदार निभा रहा है, ज्योतिष मानव नियति में बहता है जो पेशे, शिक्षा, चरित्र, प्रसिद्धि, पारिवारिक जीवन, व्यापार और स्वास्थ्य से अवगत करवाता है।

प्राचीन काल से, चिकित्सा और ज्योतिष दोनों ने जीवन का एक माध्यम गठित किया है और इन्हें प्राचीन भारत में धर्म  की एक शाखा के रूप में विकसित किया जो की ज्ञान का अत्यंत प्राचीन रूप हैं। एक सक्षम ज्योतिषी, व्यक्ति की जन्म कुंडली का विश्लेषण कर शारीरिक शक्तियों और कमजोरियों को निर्धारित कर सकता है और विभिन्न बीमारियों, पौष्टिक कमियों के लिए विशिष्टता का निर्धारण कर सकता है। बीमारी या बीमारी की स्थिति में, एक चिकित्सा ज्योतिषी जन्म कुंडली से बीमारी की गंभीरता और अवधि निर्धारित कर सकता है। 

जातक के मजबूत स्वास्थ्य के लिए लग्न और उसके स्वामी का मजबूत होना और पस्ट्मेश का कमजोर होना आवश्यक है। सूर्य एक प्राकृतिक आत्मकारक ग्रह है, जो स्वास्थ्य और ऊर्जा देता है। अच्छा स्वास्थ्य देने के लिए सूर्य को विशेष रूप से शनि या राहु से मजबूत और दोष मुक्त होना चाहिए । चंद्रमा जो की मन का करक है, उसको भी दोष मुक्त होना चाहिए। ज्योतिष विद्यार्थी को यह ज्ञात है कि स्वास्थ्य की दृष्टि से पष्ठम, अष्टम और द्वादश हानिकारक भाव हैं। इन भावो में हानिकारक ग्रहों का होना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है। पष्ठम भाव बीमारियों का  भाव है, और पष्ठम  भाव के स्वामी की दशा / भुक्ति के दौरान ही बीमारी की शुरू होती हैं। 

किसी भी जन्म कुंडली से पष्ठम भाव में ग्रह और चंद्रमा से पष्ठम भाव, पष्ठम भाव के स्वामी और पष्ठम भाव में ग्रह, ये सभी संयुक्त रूप से बीमारी और उस बीमारी से प्रभावित शरीर के हिस्से के बारे में एक सुराग देते है, यहां तक ​​कि अन्य घरों और उनमें विराजमान ग्रहों द्वारा शासित विशिष्ट बीमारियां होती हैं। इस तरह की बीमारियों को आम तौर पर उन ग्रहों कि दशा / भुक्ति के दौरान अनुभव किया जाता है। एक पीड़ित ग्रह का गोचार बीमारी का कारण भी हो सकता है, क्योंकि बीमारी तब होती है जब पीड़ित ग्रह, गोचरा में अप्रतिकूल स्थिति में आ जाता है और कुण्डली मे उसकी दशा / भुक्ति भी चल रही होती है।


यदि लग्नेश पष्ठम, अष्टम या द्वादश भाव मे हो, विशेष रूप से पष्ठम भाव मे हो तो यह संकेत है कि जातक को शारीरिक रूप से कष्ट झेलना पडे। स्तिथि और भी बदतर हो जाती है जब लग्नेश पर किसी नकारात्मक ग्रह की दृष्टि पड़ती हो जबकि एक पहलु यह भी है अगर कोई शुभ ग्रह लग्नेश को देखता है तो यह अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली स्तिथि बन जाती है। लग्न से दूसरे या सातवें (मराका भाव) के ग्रह की दशा भी बीमारी दे सकती है। 


        पष्ठम भाव में बृहस्पति स्थित हो या पष्ठम भाव पर बृहस्पति की दृष्टि हो, तो यह दोनों स्तिथियाँ जातक के अच्छे स्वास्थ्य का कारक बनती है । वही दूसरी और चंद्रमा के साथ बृहस्पति पंचम भाव में स्तिथ हो या भाव पर दृष्टि हो, तो यह स्तिथियाँ जातक को अच्छा  मानसिक स्वास्थ्य देता है। शनि के साथ चंद्रमा एक कमजोर शारीरिक, चिंतित मन, गरीबी और झूठे आरोपों के लिए उत्तरदायित्व का कारण बनता है, जब तक कि शनि लग्न का स्वामी न हो या बृहस्पति की दृष्टि न हो। ध्यान देने योग्य एक तथ्य यह भी है कि चंद्रमा की युति राहु या केतु के साथ, विशेष रूप से राहु के साथ चंद्रमा सामान्य स्वास्थ्य / मानसिक संतुलन के लिए ज्यादा लाभदायक नहीं होता।

   बुध कुंडली में जातक की बुद्धि और सोच को नियंत्रित करता है। यदि बुध ग्रह पीड़ित हो खासतौर पर मंगल ग्रह द्वारा, तो उसकी सोच बुरी तरह प्रभावित हो सकती है और मूलरूप से कभी-कभी क्रोध में उड़ने की संभावना बन जाती है और एक अंतर्निहित भाषा का उपयोग करता है। क्रोध स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हो सकता है|

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि, पष्ठम भाव बीमारियों को दर्शाता है अष्टम भाव लंबी बीमारी को दर्शाता है, जो जातक के लिए घातक हो सकती है| जबकि द्वादश भाव अस्पताल का संकेत देता है। ज्योतिष विद्यार्थी को ज्योतिष चिकित्सा का प्रयोग, कुंडली पर करने के पश्चात् ही बीमारी की गंभीरता और अवधि निर्धारित होने का कथन करना चाहिए है| अत: चिकित्सा ज्योतिष की सहायता से होने वाले शारीरिक दुष्ट प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है|


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