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कैसे बनता है जन्म कुंडली में कालसर्प योग , Applicability and Cancellation points of Kaalsarp Yog

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Deepika Maheshwari 29th Oct 2019

ज्योतिष शास्त्र में राहु तथा केतु को मायावी ग्रह कहते हैं। छाया ग्रह होने के बावजूद भी इन ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में आश्चर्य जनक रूप से देखने को मिलता है। राहु-केतु का प्रभाव राक्षसी प्रभाव होता हैं। अत: इनका अधिकतर अशुभ प्रभाव ही देखने को मिलता हैं। राहु शनि के समान पाप प्रभाव देने वाला ग्रह है तथा केतु मंगल के समान क्रूर प्रभाव देता है। ज्योतिष शास्त्र में राहु को सर्प के रूप में जाना जाता है जबकी केतु को मृत्यु या मारक प्रभाव देने वाला ग्रह कहते हैं। इन दोनों ग्रहों के पाप प्रभाव को ही कालसर्प कहा जाता हैं।जन्म कुंडली में सभी ग्रहों की राहु केतु के मध्य स्थिति कालसर्प दोष बनाती है। इस स्थिति में सभी ग्रह एक दूसरे से 180 अंश के भीतर स्थित होते हैं। जब किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु  और केतू ग्रहों के बीच अन्य सभी ग्रह आ जाते हैं तो कालसर्प दोष का निर्माण होता है।


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