कुंडली में दुर्भाग्य को देखने का तरीका

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Astro Rakesh Periwal 20th Apr 2020

*ज्योतिष अनुसार दुर्भाग्य एवं हानि संबंधी विचार* : प्रारब्ध और कर्मो के आधार पर हर कोई अपना अलग भाग्य लेकर आता है, किसी का भाग्य कितना मज़बूत है वह जन्म कुण्डली में ग्रहों की स्थिति को देख कर पता लगता है ।
ज्योतिष अनुसार जन्म कुण्डली के शुभ और मज़बूत ग्रह अपनी दशा आने पर भाग्य वृद्धि करते हैं जबकि अशुभ ग्रह , शत्रु राशि में विराजमान ग्रह अपनी दशा आने पर भाग्य की हानि करते हैं । वैसे तो कुण्डली विश्लेषण कर फलादेश करना जटिल कार्य है लेकिन यह अनुभव में देखने में आया है कि जन्म कुण्डली में कोई भी ग्रह सिर्फ अपनी दशा आने पर ही प्रभाव देता है, माने प्रतिष्ठा का कारक ग्रह सूर्य नीच राशि का हो तो इसका मतलब यह नहीं कि उम्र भर वह व्यक्ति प्रतिष्ठा से विहीन रहेगा, बल्कि यह प्रभाव सिर्फ सूर्य की दशा अंतरदशा में ही होगा । इसी प्रकार अन्य ग्रहो से विचार करना चाहिए । लेकिन इनके इलावा कुछ अन्य कारण भी होते हैं जब किसी के प्रयास सफल नहीं होते, कोई भी कार्य हो उस में बाधा ही आती है और उसको ऐसा लगने लगता है कि उस के आस पास वाले या रिश्तेदार उस से बहुत आगे निकल गए हैं और वह अकेला ही संघर्ष कर रहा है , ऐसी परिस्थितियों के कारण पर चर्चा का प्रयास करते हैं :

#अष्टम_भाव_है_महत्वपूर्ण : कुण्डली का नवम भाव यदि भाग्य है तो अष्टम ( नवम से 12 ) भाव दुर्भाग्य है, जब आप कुछ करने में असमर्थ हो जाते हैं या फिर भरम अधीन होकर फैसले गलत कर जाते हैं या फिर खुद को विचारों में फंसा हुआ अनुभव करते हैं यह सब अष्टम भाव का ही प्रभाव होता है । बुद्धि बड़ी या भैंस वाली कहावत भी यही काम आती है कि ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति को अपनी बुद्धि से कार्य करना चाहिए ज्ञान की शरण मे जाना चाहिए , जबकि वह अंहकार के आधीन होकर अपने शरीर और ताकत को ही सब कुछ समझ कर समय नष्ट करता रहता है , इसी लिए अष्टम भाव को गूढ़ ज्ञान कहा जाता है कि जब भी अष्टमेश की अंतरदशा हो या अष्टम भाव में विराजमान ग्रह की अंतरदशा हो तो ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति को चाहिए कि वह भौतिक सुख की चाह ना रख कर आध्यात्मिक उन्नति की तरफ ध्यान दे , ऐसा करने से भले ही कमाई आपकी 2 पैसा कम हो जाये लेकिन जो भी आप प्राप्त करेंगे उस से सुख ज़रूर मिलेगा । इसी लिए जब भी अष्टम भाव से संबंधित कोई अंतरदशा हो तो शिव जी, दुर्गा, विष्णु जी, हनुमान जी, गायत्री , जिस में आपका मन ही उनकी आराधना करनी चाहिए , या फिर सिर्फ इष्ट देव की पूजा अराधना नियमित करनी चाहिए ।

#बाहरवें_भाव_से_संबंधित_दशा : जन्म कुण्डली के 12वे भाव को मोक्ष भाव , व्यय भाव कहा जाता है, सरल शब्दों में इस भाव को Loss in General कहा जाता है, जब भी किसी ऐसे ग्रह की अंतरदशा होती है जो 12वे भाव से संबंधित होता है तो उस दशा समय के दौरान व्यक्ति कोई भी कार्य करे वह असफल ही रहता है, इस के इलावा अगर 6 और 12 दोनो भावो से संबंधित ग्रहो की दशा हो तो 12वा भाव हानि और 6ठा भाव रोग यानी किसी वस्तु की रिपेयरिंग पर खर्च होने लगते हैं , और यदि 8th और 12th भावो से संबंधित दशा हो तो किसी वस्तु के खोने , जल जाने या खो जाने का भय उस समय में होता है । इस लिहाज से जन्म कुण्डली के 12 भावो में से 6, 8, 12वे भावो को ही सबसे ज़्यादा कष्ट देने वाला माना जाता है ।

#जातिकारक_ग्रह_है_महत्वपूर्ण : ज्योतिषअनुसार नवग्रहों में शनि ग्रह को सामान्य तौर पर दुख दर्द का कारक ग्रह यानी जातिकरक ग्रह माना जाता है इस लिए शनि ग्रह की दशा अंतरदशा में भी कार्यो में रुकावट आती है, इस के इलावा जैमिनी ज्योतिष अनुसार भी जातिकरक ग्रह को जानकर देखना चाहिए कि वह ग्रह कोनसा है और उसकी दशा कब होगी , उस दशा समय में भी कोई भी महत्वपूर्ण कार्य करने से बचना चाहिए , इस के साथ ही उन ग्रहो को जानकर ग्रहो की अनुकूलता के लिए उचित उपाये करने चाहिए , इस से तरक्की भले ही ना हो लेकिन आपको यह कभी नहीं लगेगा कि बाकी लोग आपसे आगे निकल गए हैं और आप उनसे पीछे हैं , ऐसी नकारात्मकता को ज़रूर आप दूर कर पाएंगे , और सुख का अनुभव कर पाएंगे ।


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*वसंत नवरात्र 13 अप्रैल से 21 अप्रैल 2021 तक* चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल दिन मंगलवार प्रातः 5:30 से 10:15 तक। अभिजीत मुहूर्त 11:56 से दोपहर 12: 47 तक होगा। 13 अप्रैल से नव संवत्सर भारतीय नववर्ष की शुरुआत भी होगी। क्रमश: नवरात्र 13 अप्रैल प्रतिपदा ,शैलपुत्री। 14 अप्रैल द्वितीया, ब्रह्मचारिणी। 15 अप्रैल तृतीया, चंद्रघंटा। 16 अप्रैल चतुर्थी ,कुष्मांडा। 17 अप्रैल पंचमी, स्कंदमाता। 18 अप्रैल षष्ठी, कात्यायनी। 19 अप्रैल सप्तमी, कालरात्रि। 20 अप्रैल अष्टमी, महागौरी। 21 अप्रैल नवमी, सिद्धिदात्री मां का पूजन होता है। ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री के अनुसार दुर्गा सप्तशती नारायण अवतार श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में मार्कंडेय पुराण से ली गई है। इसमें 700 श्लोक व 13 अध्यायों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक क्रियाओं का इसके पाठ में बहुत उपयोग होता है। दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य ने बताया है कि शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य है। दुर्गासप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मवशिष्ठ विश्वामित्र ने शापित किया है। शापोद्धार के बिना पाठ का फल नहीं मिलता दुर्गा सप्तशती के 6 अंगों सहित पाठ करना चाहिए कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती का रहस्य बताया गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती की चरित्र का क्रमानुसार पाठ करने से शत्रु नाश और लक्ष्मी की प्राप्ति व सर्वदा विजय होती है।

यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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