ज्योतिष के आधार पर  विद्या अध्ययन हेतु विषय के चयन की संभावनाऐं

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ज्योतिष के आधार पर  विद्या अध्ययन हेतु विषय के चयन की संभावनाऐं

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Ravindra Kumar Wadhwa 25th Aug 2020

ज्योतिष के आधार पर  विद्या अध्ययन हेतु विषय के चयन की संभावनाऐं

ज्योतिष का भावार्थ ईश्वर की ज्योति है । अर्थात यह एक ऐसा शास्त्र है जिसकें माध्यम से ईश्वर हमें संकेत देतें है कि हमें किन-किन क्षैत्रों में कर्म करने पर सफलता मिलेगी एवं कौनसें क्षैत्र हमारे लिये र्निषेध है । जिस प्रकार यदि व्यक्ति पानी के प्रवाह की दिशा में तैरता है तो उसें जल्दी ही किनारा मिल जाता है एवं यदि वह पानी के प्रवाह के विपरीत दिशा में तैरता है तो उसकें किनारें तक पहुॅचने में विफलता की सम्भावना अधिक रहती है । इसी प्रकार हम ज्योतिषीय आधार पर अपने जीवन में कियें जाने वालें कर्मो की दिषा निर्धारित करतें रहें तो हमें शीघ्र ही सफलता मिलती है एवं उसकें विपरीत दिषा में हमारे कर्मो को करने का प्रयास करतें है तो सफलता या तो संदिग्ध हो जाती है अथवा काफी अधिक परिश्रम के पष्चात हम गन्तव्य तक पहुॅचतें है ।

आज के लेख की भूमिका का मेरा मूल उददेश्य विद्याार्थी वर्ग के विषय चयन में सहयोग के लियें ग्रहों की भूमिका का विश्लेशण करना है । विद्याार्थी माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के पष्चात इस पेशोपेश में रहता है कि मेरे द्धारा किस विषय का चयन किया जायें ताकि वह विषय मेरे लिये रोजगारोन्मुख हो सकें ।

ज्योतिष की पौराणिक पुस्तकों में दिये गयें संकेतो एवं मेरे अनुभव के आधार पर मैनें यह पाया है कि सर्वप्रथम गुरू एवं बुध के बलाबल को देखना आवश्यक है क्योंकि शिक्षा के यह दो प्रमुख नैसर्गिक कारक ग्रह है यदि यह दोनों बलषाली हो साथ ही कुण्ड़ली का पंचमेश एवं नवमेश भी मजबूत हो तो जातक निश्चित ही उच्च षिक्षा प्राप्त करता है ।

अब प्रष्न यह उत्पन्न होता है कि जातक किस क्षैत्र की शिक्षा ग्रहण करे जो उसकें भावी जीवन के लियें उपयुक्त हों । यदि किसी जातक की कुण्ड़ली में मंगल एवं सूर्य योगकारक ग्रह होकर युक्ति या परस्पर दृष्टि संबध बना रहें हो तो जातक को बाॅयोलाॅजी सब्जेक्ट लेना चाहियें ऐसा जातक चिकित्सा क्षैत्र में काफी सफल होतें देखे गयें है । यदि अंशो एवं षड़बल के आधार पर भी सूर्य एवं मंगल बलशाली हो तो जातक निश्चित ही एक सफल चिकित्सक बनता है,साथ ही यदि सूर्य एवं मंगल दोनों अपने मित्र ग्रहों के नक्षत्रों में हो तो ‘‘सोने पर सुहागा’’ होता है  । यदि इन ग्रहों के बलों में क्षीणता हो किन्तु इनकी युक्ति या परस्पर दृष्टि संबध हो तो जातक चिकित्सा क्षैत्र की अन्य नौकरियों अर्थात नर्सिग कर्मी आदि बनता है । सूर्य मंगल की युक्ति वालें जातक चिकित्सा क्षैत्र अर्थात् मेडिकल व्यावसाय में सफल होतें देखें गयें है ।

सूर्य मंगल की युक्ति लग्न,पंचम, दशम अथवा एकादश भाव में हो तो जातक चिकित्सक होने के साथ-साथ वह किसी अन्य क्षैत्र में पी.जी. भी करता है । सूर्य मंगल की उक्त स्थानों पर स्थिति जातक को सर्जरी में पी.जी. करवाती है ।

यदि सूर्य मंगल के साथ यदि बुध भी योगकारक ग्रह होकर इनके साथ हो जातक के न्यूरोसर्जन बननें की संभावनायें अधिक होती है । इसी प्रकार यदि सूर्य मंगल के साथ गुरू की युक्ति हो तो जातक स्त्रीरोग विषेशज्ञ बनता है । सूर्य मंगल की युक्ति के साथ यदि शनि भी योगकारक होकर बैठा हो तो जातक अस्थिरोग सर्जन होता है ।

इसी प्रकार यदि सूर्य मंगल के साथ शुक्र एवं बुध भी हो तो जातक चर्म रोग विषेशज्ञ होता है । इसी प्रकार हम चिकित्सा क्षैत्र की अन्य शाखाओं का भी विश्लेशण कर सकतें है ।

सूर्य मंगल की युक्ति वालें जातक विद्युत संबधी एवं अग्नि,होटल आदि व्यवसायों में भी सफल होतें देखें जा सकतें है । इन सबका विष्लेशण करतें समय जातक की अध्ययन के समय चल रही विशोंतरी महादशा,अन्र्तेदशा एवं प्रत्यान्तरदशा का विश्लेशण करना भी आवश्यक होता है ।


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यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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