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दरिद्रता और बदहाली लाता है शनि-चंद्र से बना विषयोग

Astro Arvind shukla 10th Sep 2017

दरिद्रता और बदहाली लाता है शनि-चंद्र से बना विषयोग

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शनि और चंद्रमा का संयोग जातक के लिए बेहद कष्टकारी माना जाता है। शनि अपनी धीमी प्रकृति के लिए बदनाम है और चंद्रमा अपनी द्रुत गति के लिए विख्यात। किंतु शनि क्षमताशील होने की वजह अक्सर चंद्रमा को प्रताड़ित करता है। यदि चंद्र और शनि की युति कुंडली के किसी भी भाव में हो, तो ऐसे में उनकी आपस में दशा-अंतर्दशा के दौरान विकट फल मिलने की संभावना बलवती होती है। शनि धीमी गति, लंगड़ापन, शूद्रत्व, सेवक, चाकरी, पुराने घर, खपरैल, बंधन, कारावास, आयु, जीर्ण-शीर्ण अवस्था आदि का कारक ग्रह है जबकि चंद्रमा माता, स्त्री, तरल पदार्थ, सुख, सुख के साथ, कोमलता, मोती, सम्मान, यश आदि का कारकत्व रखता है।

 

शनि और चंद्र की युति से विष योग नामक दुर्लभ अशुभ योग की सृष्टि होती है। ये विष योग जातक के जीवन में यथा नाम विषाक्तता घोलने में पूर्ण सक्षम है।



जिस भी जातक की कुण्डली में विष योग का निर्माण होता है, उसे जीवन भर अशक्तता, मानसिक बीमारी, भ्रम, रोग, बिगड़े दाम्पत्य आदि का सामना करना पड़ता है। हां, जिस भी भाव में ऐसा विष योग निर्मित हो रहा हो, उस भाव अनुसार भी अशुभ फल की प्राप्ति होती है।   

 

 

जैसे यदि किसी जातक के लग्न चक्र में शनि-चंद्र के संयोग से विष योग बन रहा हो तो ऐसा जातक शारीरिक तौर पर बेहद अक्षम महसूस करता है। उसे ताउम्र कंगाली और दरिद्रता का सामना करना पड़ता है। लग्न में शनि-चंद्र के बैठ जाने से उसका प्रभाव सप्तम भाव पर बेहद नकारात्मक होता है, जिससे जातक का घरेलू दाम्पत्य जीवन बेहद बुरा बीतता है। लग्न शरीर का प्रतिनिधि है इसलिए इस पर चंद्र और शनि की युति बेहद नकारात्मक असर छोड़ती है। जातक जीवन भर रोग-व्याधि से पीड़ित रहता है।

 

इसी प्रकार यदि द्वितीय भाव में शनि-चंद्र का संयोग बने तो जातक जीवन भर धनाभाव से ग्रसित होता है। तृतीय भाव में यह युति जातक के पराक्रम को कम कर देती है। चतुर्थ भाव में सुख और मातृ सुख की न्यूनता तथा पंचम भाव में संतान व विवेक का नाश होता है। छठे भाव में ऐसी युति शत्रु-रोग-ऋण में बढ़ोत्तरी व सप्तम भाव में शनि-चंद्र का संयोग पति-पत्नी के बीच सामंजस्य को खत्म करता है। अष्टम भाव में आयु नाश व नवम भाव में भाग्य हीन बनाता है। दशम भाव में ऐसी युति पिता से वैमनस्य व पद-प्रतिष्ठा में कमी एवं ग्यारहवें भाव में एक्सिडेंट करवाने की संभावना बढ़ाने के साथ लाभ में न्यूनता लाती है। जबकि बारहवें भाव में शनि-चंद्र की युति व्यय को आय से बहुत अधिक बढ़ाकर जातक का जीवन कष्टमय बना देने में सक्षम है।    



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