दुसरा भाव या खाना

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Acharyaa Rajesh 21st Aug 2017

दूसरा भाव हम कितने ऐसे आराम से रहते है इसका भी बखान करता है,यह भाव हमारे ज्ञान,हमारे अंदर नेकी या बदी यानी जो हमारा दुनिया से सम्बन्ध है,उसके बारे में हमारी मोहमाया या हमारा दूसरों से काम निकलवाने का तरीका आदि भी दर्शाता है। इसके अलावा मानसिक तौर पर प्रेम का संबन्ध भी इसी घर से संबन्ध रखता है।

वहां का स्वामित्व शुक्र व् चन्द्र को दिया है और कारक गुरु को माना गया है , ऐसा क्यों इसलिए की शुक्र भौतिक ग्रह है और भौतिक सुखों को प्राप्त करने के लिए धन की ज़रुरत पड़ती ही है , विचारनिए बात यहाँ ये भी है के गुरु को दुसरे, पांचवे , नवं और एकादस का कारक भी माना गया है क्यों की सब असली निधियों का स्वामी गुरु ही होता है जो के किसी के साथ कभी पक्षपात नहीं करता और अगर ये ही अधिकार दुसरे ग्रह को दिया गया होता तो व ज़रूरी पक्षपात करता , तो यही वृहस्पति का बढ़प्पन माना जाता है जो की किसी के साथ कभी अन्याय नहीं करते हैं और सबको सद्बुधि देने वाले ग्रह माने जाते हैं !

हम यह भी देखते हैं के दूसरा भाव मारकेश का भी मन जाता है वजह चाहे जो भी रही हो मसलन के अष्टम जो के आयु का भाव माना गया है उससे अष्टम यानी तीसरे भाव से दवाद्ष भाव यानी दूसरा भाव इसलिए इसे मारकेश माना जाएगा परन्तु दर्शन के रूप में देखें तो यही पता चलता है के शुक्र और चन्द्र के रूप में जो हम भौतिकता जब वृहस्पति रुपी प्यूरिटी को हम एक्सक्लूड यानि बाहर करना शुरू करते हैं तो वह मारक का काम करना शुरू कर देती है 

जैसा के मैंने बोला के हम यहाँ इसको लॉजिकल एंगल से देखें तो यही निष्कर्ष निकलता है के बिना मतलब का, बिना मेहनत और गलत तरीकों से कमाया भौतिक सुख आखिरकार हमारे लिए मारकेश का ही काम करेगा, गुरु इस घर का कारक होने के कारण यह घर भी किसी हद तक हमारी आध्यात्मिकता के बारें ज्ञान का कारक है,इस ज्ञान का विशेष सम्बन्ध हमारे जीवन के पहले हिस्से में उम्र की पहली साल से पच्चीसवी साल तक जो ज्ञान हम प्राप्त करते है,उसका भी सम्बन्ध भी है।

यह घर हमारी आध्यात्मिकता के बारे में बताता है। यह घर मिट्टी यानी खेती आदि से भी सम्बन्ध रखता है,इसके अलावा गैसे भी इसी घर से देखी जातीं है,उन हवाओं का सम्बन्ध भी इसी घर से जो हवा में ऊपर की ओर उठतीं है,हमारी की गयी बचत तथा स्त्री से मिला धन भी इसी घर से देखा जाता है,आध्यात्मिक रूप से प्राप्त धन भी इसी घर से देखा जाता है। सन्यासी का धन भी इसी घर से देखा जाता है,सन्यासी के धन से मतलब उस धन से जो शुभ कामों के द्वारा कमाया गया हो।

दूसरा भाव हमारे जन्म मरण का दरवाजा भी है। यानी इसका सम्बन्ध हमारे पिछले और आगे के जन्म से भी है,लेकिन यह सम्बन्ध कोई इतना विशेष नहीं जिसे हम फ़लकथन के साथ प्रयोग कर सकें,यह घर हमारे ससुराल का घर भी है,यानी ससुराल के साथ हमारे कैसे सम्बन्ध रहेंगे तथा ससुराल की स्थिति कैसी होगी आदि बातें इसी भाव से देखी जातीं हैं।

जब हम घर के अन्दर कई तरह के पालतू जानवर रखते है तो उनके बारे में भी यह घर अपनी स्थति बताता है। दूसरे घर को धर्म स्थान या मन्दिर भी कहा जा सकता है,यह धर्म स्थान का घर तो है लेकिन पुराने जमाने में इसे गाय के बांधने का स्थान भी जाना जाता था,इस भाव का सम्बन्ध उन पौधों से भी जिनको उनके अंगों को काटकर उगाया जाता है,जैसे मनीप्लांट गुलाब गन्ना केला आदि।

हमारे शरीर में यह भाव गर्दन तथा तिलक लगाने की जगह माथे के बीच में जो स्थान है उसका सम्बन्ध भी इस घर से है,यह घर हमारी गृहस्थी कुटुंब से भी सम्बन्ध रखता है,लेकिन यह जवानी के समय का प्रतीक है,इसके अलावा जो कुछ हम रिस्तेदारों से प्राप्त करेंगे या जो कुछ उन्हे देना पडेगा उसका सम्बन्ध भी इसी भाव से है। किसी सीमा तक रुहानी अर्थात आध्यात्मिक प्राप्ति का सम्बन्ध भी दूसरे घर से है,शायद इस घर पर गुरु का अधिकार होने से यह अध्यात्म का कारक बन गया है।

दिशाओं के अनुसार यह घर उत्तर-पश्चिम दिशा का कारक है,इस घर मे गुरु सबसे अच्छा फ़ल देता है,आमतौर पर इस घर में बैठे सभी ग्रह शुभफ़ल देते है,अगर आठवें भाव के अन्दर कोई ग्रह नहीं हो,इस घर का कारक गुरु है और चन्द्रमा को इस घर में उच्चता प्राप्त है,गुरु को इस घर का कारक इसलिये माना गया है,कि यह घर धन स्थान है,तथा आदर सम्मान का घर भी माना गया है,कोई आदमी आराम के साधन कितने प्रकार के पायेगा इसका फ़लादेश इसी घर से मिलता है,राशि के अनुसार यह घर शुक्र का है,शुक्र हमारे जीवन में आराम के साधनों का प्रतीक है,कालपुरुष के अनुसार यहां शुक्र की वृष राशि आती है,और वृष राशि किसी भी ग्रह को नीच नहीं करती,इस घर में आये हुये सभी ग्रह ग्रहफ़ल के होंगे,यानी उनका कोई उपाय नहीं होगा,इनका उपाय करने के लिये किसी अन्य ग्रह की सहायता लेनी पडेग आदमी की पहचान उसकी वाणी के द्वारा होती हैं।

व्यक्ति के अंदर छुपे ज्ञान या अज्ञान की झलक उसकी वाणी के द्वारा हो जाती हैं। वाणी मानव के धन के समान हैं। इसीलिये ज्योतिष शास्त्र में धन और वाणी को दूसरे भाव से देखा जाता हैं। जहां एक तरफ मीठी वाणी आपके लिये सौहार्द पूर्ण माहौल बनाती हैं, वहीं दूसरी तरफ कटु वाणी अपनों को भी शत्रु बनाने में देर नही लगाती।हिंदु जीवन में वाणी का अत्यधिक महत्व हैं, वाणी शुद्ध और पवित्र हो तो वह साक्षात देव वाणी होती हैं, जो बोला जाता हैं, वह सत्य हो जाता हैं।

धर्म वाणी पर संयम व नियंत्रण हेतु हमारे शास्त्र में मौन व्रत करने का विधान हैं, मौन व्रत का दूसरे भाव पर ग्रहों का जैसा प्रभाव होगा, वैसी ही वाणी होगी। बुध, गुरु, शुक्र में से किसी की दूसरे स्थान पर प्रभाव स्थिति व्यक्ति की वाणी को सौम्य, ज्ञान युक्त व प्रभाव शाली बनाती हैं, और यदि यें ग्रह नीचगत हो या अशुभ ग्रहों के प्रभाव में फल देने वाले हो तो विपरीत फल प्राप्त होते हैं।


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