विंशोत्तरी दशा

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Ravinder Pareek 08th Oct 2020

*विंशोत्तरी दशा*                                                        ज्योतिष की कसौटी है - फलादेश !  
फलादेश की सत्यता दशाओ से जानी जा सकती है। 
इसलिये जातक के भूत भविष्य वर्तमान के विवेचन हेतु ग्रहो के फल पाक समय या किसी योग के फल पाक समय को ज्ञात करने के लिये दशाओ का ज्ञान आवश्यक है। 
आचार्यो ने लगभग 104 प्रकार की दशाओ का वर्णन कर उनके स्पष्ट करने की रीतिया भी बताई है। 
बृहत्पाराशरी ग्रन्थ मे 42 प्रकार की दशाओ का वर्णन और उनके स्पष्ट करने की रीति है। 
सम्पूर्ण भारत मे लगभग 52 प्रकार की दशाएं प्रचलित है। 
दशाओ के 1- निसर्गायु, 2- पिण्डायु,  3- अंशायु, 4- नक्षत्रायु  ये चार भेद प्रसिद्ध है। 
निसर्गायु  -  जिसमे ग्रहो की संख्या नियत होती है।
पिण्डायु  -  जिसमे ग्रहो के उच्च-नीच के कारण संख्या कम-ज्यादा होती है। 
अंशायु  -  जिसमे नवांश आदि द्वारा संख्या निर्धारित होती है। 
नक्षत्रायु -  जिसमे जन्म नक्षत्र के भुक्त भोग्य से दशा निर्धारित की होती है। 
भारतीय दशा पद्धतिया : भारत मे मुख्यतया नक्षत्र दशा पद्धति 1-विंशोत्तरी, 2-अष्टोत्तरी, 3-योगिनी तथा 4-कालचक्र दशा, 5-मुद्दा दशा प्रचलित है। 
पाश्चात्य दशा पद्धतिया  : 1- दिन वर्ष one day - one year (एलेन लियो) 2- सूर्य भ्रमण पद्धति या वर्ष प्रवेश  प्रचलित है। 
नाक्षत्र दशाएं : इनमे तीन अष्टोत्तरी, योगिनी, विंशोत्तरी प्रमुख है। 
योगिनी दशा - यह नक्षत्र दशा है। इसका आधार चंद्र नक्षत्र ही है। कुछ विद्जनो अनुसार इसका हिमालय की तराई, हिमाचल प्रदेश मे प्रचलन अधिक है तथा अक्षांश देशांश अनुसार वहा के जनजीवन पर विशेष प्रभाव देखा गया है। इसका मुख्य आधार अष्ट योगिनिया 1 मंगला, 2 पिंगला, 3 घन्या, 4 भ्रामरी, 5 भद्रिका, 6 भद्रा, 7 सिद्धा, 8 संकटा है।  इनके दशा वर्ष 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8 है।  यह कुल 36 वर्ष की होती है। इनके स्वामी क्रमशः चंद्र, सूर्य, गुरु, मंगल, बुध, शनि, शुक्र, राहु है। संकटा के पूर्वार्द्ध का स्वामी राहु और उत्तरार्ध का स्वामी केतु माना जाता है। एक चक्र पूर्ण हो जाने पर पुनः दूसरा चक्र प्रारम्भ हो जाता है।
➧ इसके साधन हेतु जन्म नक्षत्र मे 3 जोड़कर 8 का भाग दे। जो शेष बचे उस अनुसार योगिनी होती है। प्रथम आवृत्ति मे आर्द्रा से आठ नक्षत्र  हस्त तक, द्वितीय आवृत्ति मे चित्र से आठ नक्षत्र उत्तराषाढ़ा तक, तृतीय आवृत्ति मे श्रवण से रेवती तक तथा रोहिणी और मृगशीर्ष एवं मंगल मे अश्विनी, बुध मे भरणी, शनि मे कृतिका से गणना की जाती है।
➧ योगिनी का साधन विंशोत्तरी अनुसार ही करते है। अन्तर्दशा ज्ञात करने के लिए ग्रह दशा वर्ष से ग्रह अन्तर्दशा वर्ष का गुना करे। गुणनफल मे 36 का भाग देने पर लब्धि ग्रह के अन्तर्दशा वर्षादि होगे।
➧ कुछ विद्जन विंशोत्तरी या अष्टोत्तरी और योगिनी दोनो से गणना करते है। फल दोनो से शुभ आये तो शुभ और विपरीत आये तो मध्यम मानते है।
अष्टोत्तरी दशा - यह भी नक्षत्र दशा है।  इसका आधार भी चंद्र नक्षत्र है। इस दशा का विशेष प्रचलन नही है। यह दक्षिण भारत, गुजरात, पंजाब में प्रचलित है। इसमे मानव की  पूर्णायु 108 वर्ष मानी गई है। इसमे केवल आठ ग्रहो की गणना की जाती है।  केतु की गणना नही की जाती है। उनके क्रम तथा दशा वर्ष सूर्य 6 वर्ष, चंद्र 15 वर्ष, मंगल 8 वर्ष, बुध 17 वर्ष, शनि 10 वर्ष, गुरु 19 वर्ष, राहु 12 वर्ष, शुक्र 21 वर्ष कुल 108 वर्ष होते है। यह दो प्रकार की होती है। 1- कृतिकादि  इसमे गणना कृतिका नक्षत्र से होती है इसका स्वामी सूर्य और दशा वर्ष 6 है। 2- आर्द्रादि  इसमे गणना आर्द्रा नक्षत्र से होती है इसका स्वामी सूर्य और दशा वर्ष 6 है। अष्टोत्तरी मे अन्तर्दशा हेतु ग्रह दशा वर्षो से ग्रह अन्तर्दशा वर्षो का गुना करे, गुणनफल मे 108 का भाग दे लब्धि वर्षादि अन्तर्दशा ग्रह के वर्ष, मास, दिनादि  होगे।
➧ इसमे कही-कही अभिजीत (उत्तराषाढ़ा चतुर्थ चरण श्रवण का आरम्भ का पन्द्रहवा भाग या 4 घटी) सहित 28 नक्षत्रो की गणना की जाती है। नक्षत्रो का समान विभाजन नही है।  कही-कही केवल 27 नक्षत्र ही गणना मे लिये जाते है अभिजीत की गणना नही करते है। उत्तराषाढ़ा जन्म नक्षत्र होने पर केवल इसके प्रथम तीन चरण की गणना भभोग मे कर दशा स्पष्ट करते है।
➧ अष्टोत्तरी कृतिकादि मे नक्षत्र इस प्रकार 3, 4, 5 चंद्र 6, 7, 8, 9  मंगल 10, 11, 12  बुध 13, 14, 15, 16  शनि 17, 18, 19  गुरु 20, 21, 22, अभिजित  राहु 23, 24, 25  शुक्र 26, 27, 1, 2 है। इसमे शुभ ग्रह चंद्र, बुध, गुरु, शुक्र के चार-चार नक्षत्र होते है।
➧ अष्टोत्तरी आर्द्रादि मे नक्षत्र इस प्रकार सूर्य 6, 7, 8, 9  चंद्र 10, 11, 12  मंगल 13, 14, 15, 16  बुध 17, 18, 19 शनि 20, 21, 22, अभिजित  गुरु 23, 24, 25  राहु 26, 27, 1, 2 शुक्र 3, 4, 5 है। इसमे अशुभ ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु के चार-चार नक्षत्र होते है। (नक्षत्र 1 = अश्विनी ---------27 = रेवती)
विंशोत्तरी या अष्टोत्तरी 
● कई विद्जन इस दुविधा में रहते है कि विंशोत्तरी या अष्टोत्तरी मे से किस दशा से गणना की जाये। ज्योतिषियो का मानना है कि उत्तर भारत के लिए विंशोत्तरी दशा और दक्षिण भारत के लिए अष्टोत्तरी दशा ज्यादा प्रभावी है पर इस कथन का कोई तर्क  सम्मत एवं वैज्ञानिक आधार नही है।
● बृहद्पाराशर होराशास्त्र अनुसार जिसका जन्म कृष्णपक्ष मे दिन मे और शुक्लपक्ष मे रात्रि मे हो, तो जातक के जीवन मे अष्टोत्तरी घटित होती है। यह परिक्षण पर घटित नही होता है। 
● मानसागरी ग्रन्थ अनुसार शुक्लपक्ष मे जन्म लेने वालो के लिए अष्टोत्तरी और कृष्णपक्ष मे जन्म लेने वालो के लिए विंशोत्तरी ग्रहण करना चाहिये। परिक्षण पर यह सिद्धांत सटीक नही उतरता है। 
● एक अन्य मत है कि लग्नेश से त्रिकोण (5, 9) मे राहु और लग्न मे शुक्र हो, तो अष्टोत्तरी दशा ग्रहण करना चाहिये। परन्तु इसका भी कोई प्रमाण नही मिलता है।                      विंशोत्तरी दशा                                           
उपरोक्त दशा पद्धतिया न्यूनाधिक रूप से प्रभावित है।
फल कथन मे किसको लिया जाय यह विवादस्पद है। इस पर मतमतान्तर है। परन्तु विंशोत्तरी दशा सर्वाधिक प्रभाव युक्त वैज्ञानिक है यह निर्विवाद है। विंशोत्तरी दशा मे मानव का जो शुभाशुभ कथन किया जाता है वह सत्य और प्रामाणिक होता है।  इसे कई देशी और विदेशी विद्जन प्रामाणिक और विश्वसनीय मानते है।  
दशाओ मे विंशोत्तरी सटीक, प्रामाणिक, और पूर्णतया वैज्ञानिक नक्षत्र दशा पद्धति है। भारतीय आचार्यो ने कलियुग मे मानव की पूर्ण आयु 120 वर्ष मानकर इस दशा पद्धति को विकसित किया ! इसके महर्षि पाराशर जनक माने जाते है। विंशोत्तरी नाक्षत्र दशा का आधार चंद्र नक्षत्र ही है।
(1) सम्पूर्ण भचक्र (वृत्त या 360 अंश) 27 नक्षत्रो में विभाजित है तथा 27 नक्षत्रो का तीन बार भाग करने पर प्रत्येक भाग मे 9 नक्षत्र आते है। जिनके स्वामी सूर्यादि नवग्रह माने गए है। इनका क्रम सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु शुक्र है। इनके दशा वर्ष सूर्य 6 वर्ष, चंद्र 10 वर्ष, मंगल 7 वर्ष, राहु 18 वर्ष, गुरु 16 वर्ष, शनि 19 वर्ष, बुध 17 वर्ष, केतु 7 वर्ष और शुक्र 20 वर्ष है। ग्रहो की  दशा वर्ष का कुलमान 120 तथा तीन आवृत्तियो के 360 सौरवर्ष या एक चक्र  होता है।
(2) दशा का प्रारम्भ कृतिका नक्षत्र से होता है।  कृतिका से पूर्वाफाल्गुनी तक प्रथम आवृत्ति या जन्म नक्षत्र आवृत्ति, उत्तराफाल्गुनी से पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र तक द्वितीय आवृत्ति या अनुजन्म आवृत्ति, उत्तराषाढ़ा से भरणी नक्षत्र तक तृतीय आवृत्ति या त्रिजन्म आवृत्ति कहलाती है। इस तरह प्रथम नक्षत्र का स्वामी दसवे और उन्नीसवे नक्षत्र का स्वामी होता है। 
(3) महर्षि पराशर ने ग्रहो का क्रम सू-चं-मं-रा-गु-श-बु-के-शु रखा है। सूर्य सितारा, पृथ्वी गृह, चंद्र पृथ्वी का उपग्रह, राहु-केतु छाया ग्रह है। गगन मंडल सूर्य को केन्द्र मानकर ग्रहो की कक्षा क्रम बु-शु-पृ-चं-मं-गु-श  होगा। किन्तु पृथ्वी को केन्द्र माने तो कक्षा क्रम सू, चं, मं, गु, श, बु, शु होगा। इसमे राहु-केतु सम्मलित करने पर कक्षा क्रम सू, चं, मं, रा, गु, श, बु, के, शु होगा।  अतः महर्षि पाराशर द्वारा निर्धारित यह ग्रह क्रम पूर्णतः तर्क संगत, युक्तियुक्त और वैज्ञानिक है। 
(4) यदि सूर्य को कृतिका नक्षत्र पर अवस्थित कर देखे तो एक ओर बुध और दूसरी ओर शुक्र (सूर्य से इनकी दूरी क्रमशः 28 और 48 अंश से ज्यादा नही होती है) दिखाई देता है। पृथ्वी से अवलोकन करने पर एक छोर पर मंगल और दूसरे छोर पर बुध दिखाई देते है। इसलिये  मंगल के बाद राहु और बुध के बाद केतु को रखा गया। 
(5) ग्रहो के दशा वर्ष आचार्यो का गहन चिंतन तथा वैज्ञानिक दृष्टि ही है। खगोलीय दृष्टि से ग्रहो के जो दशा वर्ष निश्चित किये है  प्रायः ग्रह उतने समय पश्चात उसी बिन्दु पर दिखाई पड़ते है जहा से उन ग्रहो ने भ्रमण प्रारम्भ किया था। यही इस दशा का वैज्ञानिक तथ्य है।।


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Comments

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अष्टोत्तरी, योगिनी, विंशोत्तरी प्रमुख है


good knowledge


bhut mast lekh


jyotishi gyan sagar


bhut khub


waw


Suman Sharma

very nice article by Astro Ravinder pareek ji


very good knowledge


great


ग्रहो के दशावर्ष आचार्यो का गहन चिंतन ही वैज्ञानिक दृष्टि है।


ज्योतिष की कसौटी है - फलादेश


madan mohan

very nice article


Very important articles


The truth of the land can be known from the conditions.


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