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एकादशी

KAMAL FUNDA 24th Mar 2017

पापमोचनी एकादशी (24 March 2017) व्रत -Papmochani Ekadashi Vrat .पापमोचनी एकादशी व्रत--- पाप मोचनी एकादशी व्रत चैत्र मास के कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है. पापमोचनी एकादशी व्रत व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्त कर उसके लिये मोक्ष के मार्ग खोलती है. इस एकादशी को पापो को नष्ट करने वाली, एकादशी के रुप में भी जाना जाता है. वर्ष 2017 में पापमोचनी एकादशी व्रत 24 मार्च के दिन किया जायेगा. इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु जी का पूजन करना चाहिए. अगर कोई व्यक्ति इस पूजा को षोडशोपचार के रुप में करने पर व्रत के शुभ फलों में वृ्द्धि होती है. 

---- पापमोचनी व्रत विधि | PAPMOCHANI EKADASI VRAT VIDHI--- एकादशी व्रत में श्री विष्णु जी का पूजन किया जाता है. पापमोचनी एकादशी व्रत करने के लिये उपवासक को इससे पूर्व की तिथि में सात्विक भोजन करना चाहिए. एकादशी व्रत की अवधि 24 घंटों की होती है. इसलिए इस व्रत को प्रारम्भ करने से पूर्व स्वयं को व्रत के लिये मानसिक रुप से तैयार कर लेना चाहिए. एकाद्शी व्रत में दिन के समय में श्री विष्णु जी का स्मरण करना चाहिए. और रात्रि में भी पूरी रात जाग कर श्री विष्णु भगवान् जी का पाठ करना चाहिए. व्रत के दिन सूर्योदय काल में उठना चाहिए. और स्नान आदि सभी कार्यो से निवृ्त होने के बाद व्रत का संकल्प करना चाहिए. संकल्प लेने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए. पूजा करने के बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठ्कर श्रीमद भागवत कथा का पाठ करना चाहिए. इस तिथि के दिन व्रत करने के बाद जागरण करने से कई गुणा फल प्राप्त होता है. व्रत की रात्रि में भी निराहार रहकर जागरण करने से व्रत के पुन्य फलों में वृ्द्धि होती है. व्रत के दिन भोग विलास की कामना का त्याग करना चाहिए. इस अवधि में मन में किसी भी प्रकार के बुरे विचार को लाने से बचना चाहिए. व्रत करने पर व्रत की कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिए. एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि के दिन प्रात:काल में स्नान करने के बाद भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करने के बाद . ब्राह्मणों को भोजन व दक्षिणा देकर करना चाहिए. यह सब कार्य करने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए. पापमोचनी एकादशी व्रत कथा | PAPMOCHANI EKADASHI VRAT KATHA-कथा के अनुसार -भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, राजा मान्धाता ने एक समय में लोमश ऋषि से जब पूछा कि प्रभु यह बताएं कि मनुष्य जो जाने अनजाने पाप कर्म करता है उससे कैसे मुक्त हो सकता है. राजा मान्धाता के इस प्रश्न के जवाब में लोमश ऋषि ने राजा को एक कहानी सुनाई कि प्राचीन समय की बात है, चित्ररथ नामक सुन्दर वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या में लीन थे, इस वन में गंधर्व कन्याएं और देवता सभी विहार करते थें. तभी वहां पर मंजुघोषा नामक एक अप्सरा ऋषि को देख कर उन पर मोहित हो गई. मंजूघोषा ने अपने रुप-रंग और नृ्त्य से ऋषि को मोहित करने का प्रयास किया. उस समय कामदेव भी वहां से गुजर रहे थें, उन्होने भी अप्सरा को इस कार्य में सहयोग किया. जिसके फलस्वरुप अप्सरा ऋषि की तपस्या भंग करने में सफल हो गई. कुछ वर्षो के बाद जब ऋषि का मोहभंग हुआ, तो ऋषि को स्मरण हुआ कि वे तो शिव तपस्या कर रहे थें. अपनी इस अवस्था का कारण उन्होने अप्सरा को माना. और उन्होने अप्सरा को पिशाचिनी होने का श्राप दे दिया. शाप सुनकर मंजूघोषा ने कांपते हुए इस श्राप से मुक्त होने का उपाय पूछा. तब ऋषि ने उसे पापमोचनी एकादशी व्रत करने को कहा. स्वयं ऋषि भी अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिये इस व्रत को करने लगें. दोनों का व्रत पूरा होने पर, दोनों को ही अपने पापों से मुक्ति मिली. तभी से पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की प्रथा चली आ रही है. यह व्रत व्यक्ति के सभी जाने- अनजाने में किये गये पापों से मुक्ति दिलाता है.

 


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