दान का महत्व

Share

Acharyaa Rajesh 21st Aug 2017

श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है कि परहित के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने के समान कोई पाप नहीं है.
दान का महत्व
दान एक ऐसा कार्य है, जिसके जरिए हम न केवल धर्म का ठीक-ठीक पालन कर पाते हैं बल्कि अपने जीवन की तमाम समस्याओं से भी निकल सकते हैं. आयु, रक्षा और सेहत के लिए तो दान को अचूक माना जाता है. जीवन की तमाम समस्याओं से निजात पाने के लिए भी दान का विशेष महत्व है. दान करने से ग्रहों की पीड़ा से भी मुक्ति पाना आसान हो जाता है.

शास्त्रों में खास तौर पर चार प्रकार के दान बताए गए हैं।

पहला नित्यदान-परोपकार की भावना और किसी फल की इच्छा न रखकर यह दान दिया जाता है।

दूसरा नैमित्तिक दान-यह दान जाने-अंजाने में किए पापों की शांति के लिए दिया जाता है।

तीसरा काम्यदान-संतान, जीत, सुख-समृद्धि और प्राप्त करने की इच्छा से यह दान दिया जाता है।

चौथा दान है विमलदान-यह दान ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए दिया जाता है।

ऐसा कहा गया है कि न्यायपूर्वक यानी ईमानदारी से अर्जित किए धन का दसवां भाग दान करना जीवन मे दान का महत्व है,माता अपने ममत्व को बच्चे के लिये दान करती है पिता अपने पुरुषार्थ के लिये अपने जीवन के की जाने वाली मेहनत का दान अपने बच्चे के लिये करता है,भाई अपने बाहुबल को दान करता है, बहिन अपने तरीके से सम्बन्ध बनाकर और समाज बनाकर अपने भाई के क्षेत्र का दान करती है, भाई अपनी बहिन के लिये आजीवन अपनी सहायता और शक्ति का दान करता है.

बडा होकर बच्चा अपने माता पिता के वृद्ध होने पर उनकी देख रेख और भोजन का दान करता है,पत्नी पति को रति सुख प्रदान करती है,अपने द्वारा पति के लिये निस्वार्थ भाव से भोजन और पति सुख और आयु वृद्धि के प्रति पूजा पाठ करती है आगे के लिये वंश चलाने के प्रति अपनी कामना को समर्पित करती है। बहू अपने स्वार्थ को त्याग कर पति के कुल मे शांति और सम्पन्नता बनाने के प्रति अपने ज्ञान का दान करती है, दामाद अपने बाहुबल और सम्मान के द्वारा अपने ससुराली जनो का मान बढाने में अपनी शक्ति का दान करता है।

कुछ लोग अपने व्यवसाय स्थान पर बैठ कर रास्ता बताकर अपने ज्ञान का दान करते है,कुछ लोग प्यासों के लिये प्याऊ खुलवाकर धर्मशाला बनवा कर लोगों के जीवन को सर्दी गर्मी से बचाने के लिये अपने बाहुबल का दान करते है। हकीकत मे देखा जाये तो यह शरीर ही दान से और दान के लिये बना है।

एक व्यक्ति एक लाख रोजाना कमा रहा है लेकिन वह अपने लिये मात्र कुछ सौ रुपया में अपना पेट भर लेता है,और बाकी का धन वह अपने परिवार के लिये जमा करता है कि वह अपनी संतान के लिये इतना इकट्ठा कर दे कि उसके बाद उसकी संतान किसी की मोहताज नही रहे और वह सुखी रहे।

लेकिन इस सुखी रखने के कारणों में मोह पैदा हो जाता है,यह मोह करना ही उसकी भूल है और इसी मोह के चक्कर में शरीर से की जाने वाली मेहनत दान स्वरूप न होकर मोह के जंजाल में चली जाती है। माता ने अगर पुत्र को जन्म देने के बाद यह सोच लिया कि उसका पुत्र बडा होकर उसकी पालना करेगा,उसकी सेवा करेगा,उसके लिये बहू लाकर उसकी आज्ञा का पालन करवायेगा तो माता का यह मोह उस समय बेकार हो जाता है

जब लडका बडा होता है और अपनी मर्जी से शादी विवाह करने के बाद अपना घर अलग बसा लेता है माता अपने पुत्र के सहारे रहने के कारण और अपने लिये कुछ न बचाकर केवल पुत्र के लिये ही सब कुछ करने के बाद जब पुत्र पास से निकल जाता है और पत्नी के लिये सोचने लगता है तो माता का वह पालन पोषण से लेकर पढाने लिखाने और सभी साधन पुत्र के लिये जुटाने के प्रति बेकार हो जाता है।

उस समय माता और पुत्र के बीच तनातनी चलती है और बहू जो दूसरे घर से आयी है उसके अन्दर यह भावना घर कर जाती है कि माँ केवल बेटे से धन का मोह करती है और बेटा माँ के कहे पर चलता है उसकी बात को नही सुनता है,इस प्रकार से तकरार बढ कर बडी तकरार बन जाती है,बेटा न तो माँ को छोड सकता है और न ही पत्नी को छोड सकता है,पत्नी के पास दो रास्ते होते है एक अपने माता पिता का और दूसरा कानून का,लेकिन माता के पास एक ही रास्ता होता है वह होता है अपने पुत्र का,बहू या तो अपने माता पिता से प्रताणना दिलवाती है अथवा कानून का सहारा लेकर माता पिता को बजाय भोजन और सहायता देने के जेल की हवा दिलवाने का काम करती है,बेटे के सामने दो ही रास्ते हो


Like (0)

Comments

Post

Latest Posts

यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

Top