श्रीकृष्ण जी के 51 नाम और उनके अर्थ

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Ravinder Pareek 12th Aug 2020

श्रीकृष्ण जी के 51 नाम और उनके अर्थ । 1. कृष्ण : सब को अपनी ओर आकर्षित करने वाला। 2. गिरिधर: गिरी: पर्वत ,धर: धारण करने वाला। अर्थात गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले। 3. मुरलीधर: मुरली को धारण करने वाले। 4. पीताम्बर धारी: जिस ने पिले वस्त्रों को धारण किया हुआ है। 5. मधुसूदन: मधु नामक दैत्य को मारने वाले। 6. यशोदा या देवकी नंदन: यशोदा और देवकी को खुश करने वाला पुत्र। 7. गोपाल: गौओं का या पृथ्वी का पालन करने वाला। 8. गोविन्द: गौओं का रक्षक। 9. श्रीनाथ : लक्ष्मी व आनंद देंने वाला। 10. कुञ्ज बिहारी: कुंज नामक गली में विहार करने वाला। 11. चक्रधारी: जिस ने सुदर्शन चक्र या ज्ञान चक्र या शक्ति चक्र को धारण किया हुआ है। 12. श्याम: सांवले रंग वाला। 13. माधव: माया के पति। 14. मुरारी: मुर नामक दैत्य के शत्रु। 15. असुरारी: असुरों के शत्रु। 16. बनवारी: वनो में विहार करने वाले। 17. मुकुंद: जिन के पास निधियाँ है। 18. योगीश्वर: योगियों के ईश्वर या मालिक। 19. गोपेश :गोपियों के मालिक। 20.हरि: दुःखों का हरण करने वाले। 21. मदन: सूंदर। 22. मनोहर: मन का हरण करने वाले। 23. मोहन: सम्मोहित करने वाले। 24. जगदीश: जगत के मालिक। 25. पालनहार: सब का पालन पोषण करने वाले। 26. कंसारी: कंस के शत्रु। 27. रुख्मीनि वलभ: रुक्मणी के पति । 28. केशव: केशी नाम दैत्य को मारने वाले या पानी के उपर निवास करने वाले या जिन के बाल सुंदर है। 29. वासुदेव:वसुदेव के पुत्र होने के कारन। 30. रणछोर:युद्ध भूमि स भागने वाले। 31. गुड़ाकेश: निद्रा को जितने वाले। 32. हृषिकेश: इन्द्रियों को जितने वाले। 33. सारथी: अर्जुन का रथ चलने के कारण। 35. पूर्ण परब्रह्म: :देवताओ के भी मालिक। 36. देवेश: देवों के भी ईश। 37. नाग नथिया: कलियाँ नाग को मारने के कारण। 38. वृष्णिपति: इस कुल में उतपन्न होने के कारण 39. यदुपति:यादवों के मालिक। 40. यदुवंशी: यदु वंश में अवतार धारण करने के कारण। 41. द्वारकाधीश:द्वारका नगरी के मालिक। 42. नागर:सुंदर। 43. छलिया: छल करने वाले। 44. मथुरा गोकुल वासी: इन स्थानों पर निवास करने के कारण। 45. वल्लभ: सदा अपने आनंद में लीन रहने वाले। 46. दामोदर: पेट पर जिन के रस्सी बांध दी गयी थी। 47. अघहारी: पापों का हरण करने वाले। 48. सखा: अर्जुन और सुदामा के साथ मित्रता निभाने के कारण। 49. रास रचिया: रास रचाने के कारण। 50. अच्युत: जिस के धाम से कोई वापिस नही आता है। 51. नन्द लाला: नन्द के पुत्र होने के कारण।


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Suman Sharma

very nice article by Astro Ravi ji


santanukumar padhy

Jai shree krishna


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न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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