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Astro Ankit Gupta 16th Apr 2021

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हमें आकारक ग्रहों का रत्न धारण करना चाहिए या नहीं , यदि धारण करना चाहिए तो किन परिस्थिति में ग्रह कौन है क्या है ?
सबसे पहले हमें यह जानना जरूरी है कि विशेष रूप से पृथ्वी पर निवास करने वाले लोगों के ऊपर जिन ऊर्जा स्त्रोतों का प्रभाव पड़ता है उसे ग्रह के नाम से पुकारा जाता है । हम सभी जानते हैं कि सूर्य एक तारा है चंद्रमा एक उपग्रह है एवं राहु केतु सिर्फ एक ऊर्जा के केंद्र । परंतु ज्योतिष में इन सभी को ग्रहों के नाम से बुलाया जाता है । इसका अर्थ यह नहीं था कि हमारे ऋषि-मुनियों नहीं जानते थे कि सूर्य तारा और चंद्रमा उपग्रह हैं । इन सभी को एक संज्ञा दी गई ।
ग्रह कोई देवी देवता नहीं है जितने भी ग्रहों का प्रभाव पृथ्वी निवासियों पर पड़ता है वह एक ऊर्जा है और उसके अंदर अलग-अलग प्रकार के तत्व हैं । हम ग्रह को प्रसन्न नहीं कर सकते उनके प्रभाव को संतुलित कर सकते हैं ।
🔹हम सभी लोग जानते हैं भगवान सूर्य महर्षि कश्यप एवं अदिति के पुत्र हैं तो क्या महर्षि कश्यप के पुत्र सूर्य के पहले इस ब्रह्मांड में सूर्य नहीं थे ? क्या महर्षि कश्यप के पहले सूर्य नहीं थे ? जब से इस ब्रह्मांड का निर्माण हुआ तभी से सूर्य ब्रह्मांड में विराजम हैं । परंतु महर्षि कश्यप आदित्य के पुत्र सूर्य को उसे सूर्य की उपाधि दी गई या उसके नाम की संज्ञा दी गई ।
शनि सूर्य के पुत्र हैं इसका अर्थ क्या सूर्य पुत्र के पहले शनि ग्रह नहीं था । फिर यह ब्रह्मांड कैसे चल रहा था ? सूर्य पुत्र का शनि ग्रह के साथ मिलते जुलते स्वभाव के कारण उस नाम की संज्ञा दी गई । जिस समय इस ब्रम्हांड का निर्माण हुआ था उस समय से संपूर्ण ग्रह , नक्षत्र ब्रम्हांड में स्थापित हो थे और उनका प्रभाव प्रारंभ हो चुका था । मानव का विकास तो बहुत बाद में धीरे-धीरे हुआ और फिर जो ऋषि मुनि हुए उनके नाम से इन ग्रहों नक्षत्रों का नामकरण किया गया या इसकी संज्ञा दी गई ।
हम भारतवाशी ब्रह्मांड के सभी तत्वों को जिनके माध्यम से सृष्टि चल रही है उसे देवता की उपाधि देते है एवं उनका सम्मान करते हैं ।
🔹इस ब्रह्मांड में जो नौ ग्रह है यह हमारे धरती निवासियों पर किस प्रकार काम करते हैं ? कई लोग ज्योतिष को नहीं मानने वाले कहते हैं इतने दूर से ग्रह हमारे ऊपर कैसे प्रभाव डाल सकते हैं । एक समय मैंने सुना है रामदेव बाबा बोल रहे थे कि शनि तुम्हारे सर पर कैसे बैठ जाएगा ? अरे मूर्ख कोई भी ग्रह तुम्हारे सर पर नहीं बैठता है सूर्य यदि पृथ्वी पर अपनी ऊर्जा भेज रहा है तो इसका अर्थ नहीं है कि सूर्य तुम्हारे सर पर बैठ गया ।
इस ब्रह्मांड में जो ग्रह है उनसे संबंधित तत्व होता है और उस तत्व से संबंधित ऊर्जा हमारे ऊपर प्रभाव डालते हैं । जिस प्रकार नौ ग्रहों में अलग-अलग ऊर्जा है , तत्व है उसी प्रकार इस पृथ्वी में भी अलग-अलग तत्व और ऊर्जा है , और उसी प्रकार हमारे शरीर में भी अलग-अलग प्रकार के उर्जा एवं तत्व हैं । जिनके माध्यम से हमारा जीवन चलता है । यदि इन शक्तियों का संतुलन बिगड़ जाता है जो चाहे यह पृथ्वी हो ,चाहे हमारा शरीर हो इनमें समस्याएं उत्पन्न होने लगती है । जैसे पृथ्वी के जिस भाग में जल तत्व नहीं है वहां लोगों को निवास करने में बहुत ज्यादा परेशानी होती है । कई ऐसे देश हैं जहां जरूरत से ज्यादा गर्मी होती है ।
🔸🔹सूर्य एवं मंगल अग्नि तत्व है । चंद्रमा एवं शुक्र जल तत्व है । बुध पृथ्वी तत्व है । गुरु आकाश तत्व है । शनि वायु तत्व है ।
और हमारे शरीर में भी यह सारे तत्व हैं । इन ग्रहों के माध्यम से इनसे संबंधित तत्व या ऊर्जा पृथ्वी पर प्रवाहित होते रहते हैं । कुछ ऊर्जा हमें दिखाई देती है एवं महसूस होती है । कुछ ऊर्जा हमें दिखाई नहीं देती । जिस प्रकार पेट्रोल से ऊर्जा तैयार होती है और वाहन चलता है परंतु पेट्रोल हमें दिखाई देता है । उसी प्रकार वायु में भी ऊर्जा होती है परंतु वह हमें दिखाई नहीं देता आजकल के जो बड़े वाहन आ रहे हैं उसमें वायु के प्रभाव के माध्यम से ब्रेक लगाया जाता है । बड़े-बड़े जो प्लांट होते हैं उसमें वायु के माध्यम से वालों को बंद किया जाता है एवं खोला जाता है । कहीं दूर बैठे वायु के प्रेशर से उस वालों को खोल सकते हैं एवं बंद कर सकते हैं परंतु हमें दिखाई नहीं देता है । उसी प्रकार सूर्य की ऊर्जा है वहां महसूस होती है हमें गर्मी लगती है परंतु बाकी जो ग्रह हैं वे भी ऊर्जा प्रदान करते रहते हैं , परंतु वह हमें प्रत्यक्ष रूप से महसूस नहीं होता है परंतु यह सारे ग्रह से संबंधित ऊर्जा प्रवाहित होती रहती है ।
हमारे शरीर में इन सभी तत्वों की आवश्यकता है । यदि किसी भी तत्व की जरूरत से ज्यादा कमी हो जाती है तब उसके कारण हमारे जीवन में भी परेशानी होती है एवं हमारे जीवन में अलग-अलग प्रकार के सुख - दुख होते हैं ।
🔹प्रत्येक लग्न के अनुसार अलग-अलग ग्रहों को कारक एवं आकारक के भाग में बांटा गया है इसका अर्थ यह नहीं है कि जो आकारक ग्रह है उनकी ऊर्जा की हमें आवश्यकता नहीं है । हमें सभी ग्रहों की ऊर्जा की आवश्यकता है , परंतु अलग-अलग लग्न के अनुसार किसी को किसी ऊर्जा की ज्यादा आवश्यकता है किसी दूसरे को उसी ग्रह से संबंधित ऊर्जा की कम आवश्यकता है । परंतु आवश्यकता सभी ग्रहों से संबंधित ऊर्जा की है ।
और ज्योतिष के सिद्धांत के हिसाब से जो अकारण ग्रह होते हैं उनका रत्न धारण करने के लिए नहीं बोला गया , इसका अर्थ क्या है ? इसका अर्थ यह है कि यदि आकारक ग्रह ठीक-ठाक है । उदाहरण के लिए 5 - 6 डिग्री के हैं तब इनका रत्न धारण करके बहुत ज्यादा बलवान नहीं करना चाहिए , परंतु यदि कोई कारक ग्रह है जो फलादेश के अनुसार हमें लाभ दे रहे हैं और यदि वह 12 - 14 अंश के भी हैं तब भी उसका रत्न धारण करने से हमें कोई नुकसान नहीं होगा ।
परंतु यदि कोई ग्रह आकारक है और वह जीरो या 1 अंश का है तब हमें उस ग्रह से संबंधित तत्व या ऊर्जा प्राप्त करने के लिए उसे कुछ प्रबल करना आवश्यक है । यदि हम नहीं करेंगे तो उस ग्रह से संबंधित जो हमारे शरीर का भाग है या जो कुंडली में उससे संबंधित भाव है या जो उससे संबंधित तत्व है उसमें कमी हो जाएगी जिसके कारण बीमारी भी होगी और समस्या भी होगी । जैसे कुंडली में छठे भाव को आकारक माना जाता है परंतु छठा भाव किडनी का होता है , कमर का होता है , नौकरी का होता है , यदि षष्ठेश जीरो डिग्री का हो जाएगा तो क्या कमर और किडनी या नौकरी में कमी नहीं होगी ? अतः ऐसी अवस्था में जबकि आकारक ग्रह जीरो या 1 – 2 अंश का है तो हमें कुछ उसको प्रबल तो करना ही पड़ेगा । जिससे उसे संबंधित ऊर्जा या तत्व की कमी हमारे शरीर या हमारे जीवन में ना हो । 🔹आकारक ग्रहों का रत्न धारण नहीं करने का बारे में जो बताया गया है इसका अर्थ यही है कि जो प्रबल है उन आकारक ग्रहों के रत्न को धारण करके उसे बल ना दे , परंतु यदि 0 अंश का है तो आप को धारण करना ही पड़ेगा । परंतु भेड़िया धसान है एक दूसरे की कॉपी कर कर के लिखते रहते हैं और सारे एक ही गीत गाते रहते हैं । यदि कोई ग्रह अकारक भाव का स्वामी है तो उसके साथ किसी दूसरे भाव का भी तो स्वामी है और यदि वह बिलकुल जीरो अंश का हो गया तो 12 में से 2 भावों से संबंधित तत्व ऊर्जा में कमी हो जाएगी । फिर जीवन का संतुलन बिगड़ जाएगा । और कोई भी ग्रह अकेले यदि पीड़ित नहीं है तो किसी भी प्रकार की कोई बहुत ज्यादा परेशानी नहीं दे सकता है । जीवन में संघर्ष देते हैं और उसके बाद सफलता देते हैं । यदि कुंडली में रोग होने का योग बन रहा है और उसके साथ षष्ठेश संबंध बनाएगा तभी बड़ी बीमारी होगी यदि कोई बीमारी का योग कुंडली में नहीं बन रहा है तब आकारक ग्रह ज्यादा परेशानी नहीं दे सकता है । कई लोगों की कुंडली में अष्टम भाव बहुत ही प्रबल होते हैं , परंतु देखा गया है यदि उनके कुंडली में किसी बीमारी के योग नहीं है तो ऐसे लोगों को कोई बीमारी नहीं होती है । बहुत से लोग संपूर्ण जीवन आराम से जीवन व्यतीत करते हैं उन्हें कोई परेशानी नहीं होती है । उनकी कुंडली में भी तो आकारक ग्रहों की दशा अंतर्दशा जाती है ।
मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि आप सभी लोग आकारक ग्रहों के रत्न धारण करें । इसके लिए एक योग्य ज्योतिषी की आवश्यकता है जो वर्षों से ज्योतिष का कार्य कर रहा हो जो इन सभी चीजों को बारीकी से समझता हो , उसके परामर्श के अनुसार आकारक ग्रहों का रत्न धारण कर सकते हैं ।
यदि कोई आकारक ग्राह है और बहुत ज्यादा कमजोर है तो हमें उसे कुछ तो बल देना ही पड़ेगा , जिससे संबंधित तत्व की कमी हमारे शरीर में एवं हमारे जीवन में ना हो ।
💢🏵️ इस पूरे ब्रह्मांड में , या हमारे शरीर में , या ज्योतिष में सभी जगह सिर्फ और सिर्फ ऊर्जा का खेल है । ऊर्जा का कमाल है । इसी से ब्रह्मांड चल रहा है , इस वजह से हमारा शरीर चल रहा है । यदि हम कोई मंत्र जाप करते हैं तो वह भी एक ऊर्जा ही है । कई लोग बोलते हैं कि मंत्र जाप से कोई देवता थोड़ी सामने आ जाएंगे । मंत्र जाप से देवता सामने नहीं आएंगे लेकिन लगातार मंत्र जाप करने से उससे संबंधित ऊर्जा हमें प्राप्त होती है । और हमारे जीवन के दुख - परेशानी को दूर करेगी । जैसे किसी की कुंडली में यदि चंद्रमा , सूर्य , गुरु शुभ ग्रह पीड़ित हो जाते हैं तो उस व्यक्ति के आभामंडल में नेगेटिव ऊर्जा दिखाई देती है , जिसके कारण ही उस पर किसी भी प्रकार के बाहरी शक्ति आक्रमण करती है ।
💢 यदि हम किसी देवता से संबंधित मंत्र जाप करते हैं तब उस मंत्र में जो भी अक्षर होते हैं उन सभी अक्षरों के मिलाने से जो ऊर्जा तैयार होती हैं वह ऊर्जा ही हमारे जीवन में कष्ट एवं बाधाओं को समाप्त करती हैं ।
💢जो रत्न होता है कई लोग बोलते हैं यह पत्थर क्या करेगा ? परंतु उन्होंने रत्न के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त नहीं किया । रत्न से संबंधित पूरे विश्व में कई जगह ऐसी संस्थाएं हैं जो रत्न के बारे में पढ़ाई होती है । जब आप उसका अध्ययन करेंगे तो आपको पता चलेगा कि उसने के अंदर ऐसे तत्व है जो ग्रहों से संबंधित ऊर्जा इस ब्रह्मांड से हमारे शरीर में प्रवाहित करते हैं ।


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RahulNimje

Nice


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यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

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आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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