जन्म नक्षत्रों का जीवन पर प्रभाव

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Astro Rakesh Periwal 13th Sep 2017

जन्म नक्षत्र का व्यक्तित्व पर प्रभाव

१.अश्विनी नक्षत्र का व्यक्तित्व पर प्रभाव:-ज्योतिषशास्त्र के अन्तर्गत बताया गया है कि नक्षत्रों की कुल संख्या२७ है विशेष परिस्थिति में अभिजीत को लेकर इनकी संख्या २८ हो जाती है। गोचरवश नक्षत्र दिवस परिवर्तित होता रहता है। ज्योतिष सिद्धान्त के अनुसार हर नक्षत्र का अपना प्रभाव होता है। जिस नक्षत्र में व्यक्ति का जन्म होता है उसके अनुरूप उसका व्यक्तित्व, व्यवहार और आचरण होता है। नक्षत्रों में सबसे पहला अश्विनी होता है इस नक्षत्र में जिनका जन्म होता है वे कैसे होते हैं आइये इसे जानें:ज्योतिषशास्त्र में अश्विनी नक्षत्र को गण्डमूल नक्षत्रों के अन्तर्गत रखा गया है। इस नक्षत्र का स्वामी केतुदेव हैं। इस नक्षत्र में उत्पन्न होने वाले व्यक्ति बहुत ही उर्जावान होते हैं। ये सदैव सक्रिय रहना पसंद करते हैं इन्हें खाली बैठना अच्छा नहीं लगता, ये हमेशा कुछ न कुछ करते रहना पसंद करते हैं।

इस नक्षत्र के जातक उच्च महत्वाकांक्षा से भरे होते हैं, छोटे-मोटे काम से ये संतुष्ट नहीं होते, इन्हें बड़े और महत्वपूर्ण काम करने में मज़ा आता है।अश्विनी नक्षत्र में जिनका जन्म होता है वे रहस्यमयी होते हैं। इन्हें समझपाना आमजनो के लिए काफी मुश्किल होता है। ये कब क्या करेंगे इसका अंदाज़ा लगाना भी कठिन होता है। ये जो भी हासिल करने की सोचते हैं उसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने से नहीं डरते। ये इस प्रकार के कार्य कर जाते हैं जिसके बारे में कोई अंदाज़ा भी नहीं लगा पाता।

इनके स्वभाव और व्यक्तित्व की एक बड़ी कमी है कि इनमें उतावलापन बहुत होता है। ये किसी बात पर बहुत जल्दी गुस्सा करने लग जाते हैं। इनके व्यक्तित्व की एक बड़ी कमी यह है कि ये काम को करने से पहले नहीं सोचते अपितु बाद में उस पर विचार करते हैं। जो भी इनसे शत्रुता करता है उनसे बदला लेने में ये पीछे नहीं हटते, अपने दुश्मनों को पराजित करना इन्हें अच्छी तरह आता है। इस नक्षत्र के जातक को दबाव या ताकत से वश में नहीं किया जा सकता।

ये प्रेम एवं अपनत्व से ही वश में आते हैं। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति उत्तम एवं आदर्श मित्र होते हैं ये छल कपट से दूर रहते हैं तथा सच्ची मित्रता निभाते हैं, ये अपने मित्र के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं। ये यूं तो बाहर से सख्त दिखते हैं परंतु भीतर से कोमल हृदय के होते हैं। इन व्यक्तियों का बचपन संघर्ष में गुजरता है। ये अपनी धुन के पक्के होते हैं, जो भी तय कर लेते हैं उसे पूरा करके दम लेते हैं।

२. भरणी नक्षत्र के जातक का व्यक्तित्व:- नक्षत्रों की कड़ी में भरणी को द्वितीय नक्षत्र माना जाता है। इस नक्षत्र का स्वामी शुक्र ग्रह होता है। जो व्यक्ति भरणी नक्षत्र में जन्म लेते हैं वे सुख सुविधाओं एवं ऐसो आराम चाहने वाले होते हैं। इनका जीवन भोग विलास एवं आनन्द में बीतता है। ये देखने में आकर्षक व सुन्दर होते हैं। इनका स्वभाव भी सुन्दर होता है जिससे ये सभी का मन मोह लेते हैं। इनके जीवन में प्रेम का स्थान सर्वोपरि होता है।

इनके हृदय में प्रेम तरंगित होता रहता है ये विपरीत लिंग वाले व्यक्ति के प्रति आकर्षण एवं लगाव रखते हैं।भरनी नक्षत्र के जातक उर्जा से परिपूर्ण रहते हैं। ये कला के प्रति आकर्षित रहते हैं और संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। ये दृढ़ निश्चयी एवं साहसी होते हैं। इस नक्षत्र के जातक जो भी दिल में ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं। आमतौर पर ये विवाद से दूर रहते हैं फिर अगर विवाद की स्थिति बन ही जाती है तो उसे प्रेम और शान्ति से सुलझाने का प्रयास करते हैं। अगर विरोधी या विपक्षी बातों से नहीं मानता है तो उसे अपनी चतुराई और बुद्धि से पराजित कर देते हैं।

जो व्यक्ति भरणी नक्षत्र में जन्म लेते हैं वे विलासी होते हैं। अपनी विलासिता को पूरा करने के लिए ये सदैव प्रयासरत रहते हैं और नई नई वस्तुएं खरीदते हैं। ये साफ सफाई और स्वच्छता में विश्वास करते हैं। इनका हृदय कवि के समान होता है। ये किसी विषय में दिमाग से ज्यादा दिल से सोचते हैं। ये नैतिक मूल्यों का आदर करने वाले और सत्य का पालन करने वाले होते हैं। ये रूढ़िवादी नहीं होते हैं और न ही पुराने संस्कारों में बंधकर रहना पसंद करते हें।

ये स्वतंत्र प्रकृति के एवं सुधारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले होते हैं। इन्हें झूठा दिखावा व पाखंड पसंद नहीं होता।इनका व्यक्तित्व दोस्ताना होता है और मित्र के प्रति बहुत ही वफादार होते हैं। ये विषयों को तर्क के आधार पर तौलते हैं जिसके कारण ये एक अच्छे समालोचक होते हैं। इनकी पत्नी गणवंती और देखने व व्यवहार मे सुन्दर होती हैं। इन्हें समाज में मान सम्मान और प्रतिष्ठा मिलती है।

३.पहली नज़र के प्यार पर नहीं करते ऐतबार कृतिका नक्षत्र के जातक:-ज्योतिषशास्त्र में नक्षत्रों को काफी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। जब भी किसी व्यक्ति के जीवन के सम्बन्ध में कोई भविष्यवाणी करनी होती है तब ग्रह स्थिति, राशि आदि के साथ नक्षत्रों का भी आंकलन किया जाता है। नक्षत्र न केवल भविष्य को दर्शाते हैं वरन इंसान के व्यक्तित्व को भी उजागर करते है।

ज्योतिषशास्त्री यहां तक कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति का स्वभाव कैसा है, उसका व्यक्तित्व एवं उसकी जीवन शैली किस प्रकार की है यह व्यक्ति के जन्म के समय नक्षत्रों की स्थिति को देखकर जाना जा सकता है। नक्षत्रों का व्यक्तित्व पर प्रभाव की कड़ी में हम यहां नक्षत्रों की गणना में तीसरे स्थान पर रहने वाले नक्षत्र कृतिका की बात करते हैं।सूर्यदेव को कृतिका नक्षत्र का स्वामी माना जाता है । इन नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति पर सूर्य का प्रभाव रहता है।

सूर्य के प्रभाव के कारण ये आत्म गौरव से परिपूर्ण होते हैं। ये स्वाभिमानी होंते हैं और तुनक मिज़ाज भी, छोटी-छोटी बातों पर ये उत्तेजित हो उठते हैं और गुस्से से लाल पीले होने लगते हैं। इस नक्षत्र के जातक उर्जा से परिपूर्ण होते हैं और दृढ़ निश्चयी होते हैं जो बात मन में ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं।कृतिका नक्षत्र में पैदा लेने वाले मनुष्य लगनशील होते हैं, जिस काम को भी अपने जिम्मे लेते हैं उसमें परिश्रम पूर्वक जुटे रहते हैं।

ये नियम के पक्के होते हैं, किसी भी स्थिति में नियम और सिद्धांत से हटना पसंद नहीं करते। इस नक्षत्र के  जातक सरकारी क्षेत्र में प्रयास करते हैं तो इन्हें अच्छी सफलता मिलती है। शारीरिक रूप से ये स्वस्थ और सेहतमंद रहते हैं। ये व्यवसाय की अपेक्षा नौकरी में अधिक कामयाब होते हैं। इनके जीवन में इनका सिद्धांन्त, जीवनमूल्य काफी अहम होता है। अपने सिद्धांत और आदर्शवादिता के कारण समाज में इन्हें काफी मान सम्मान मिलता है।

ये समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में आदर प्राप्त करते हैं।जो व्यक्ति इस नक्षत्र में पैदा होते हैं वे महत्वाकांक्षी होते हैं। ये नौकरी में हों  अथवा व्यवसाय में अपना प्रभुत्व बनाये रखते हें, इस नक्षत्र के जातक अगर सरकारी नौकरी में होते हैं तो पूरे दफ्तर पर नियंत्रण बनाये रखते हैं। इनकी मित्रता का दायरा बहुत छोटा होता है क्योंकि ये लोगों से अधिक घुलते मिलते नहीं हैं परंतु जिनसे मित्रता करते हैं उनकी मित्रता को दिलोजान से निभाते हैं।

शत्रुओं के प्रति इनका व्यवहार काफी सख्त़ होता है। ये जीवन में कभी भी हार नहीं मानते हैं और शत्रुओं को पराजित करने की क्षमता रखते हैं।ये प्रेम सम्बन्धों के मामले से दूर रहना पसंद करते हैं। इनकी संतान कम होती है, परंतु पहली संतान गुणवान व यशस्वी होती है। पत्नी से इनके सम्बन्ध सामान्य रहते हैं।

४.भावुक और संवदेनशील होते हैं रोहिणी नक्षत्र के जातक:-हर इंसान के व्यक्तित्व पर नक्षत्रों का प्रभाव" इस कड़ी में हम रोहिणी नक्षत्र पर चर्चा करेंगे। ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार रोहिणी चारों चरणों में वृषभ राशि में होता है। जो व्यक्ति इस नक्षत्र में जन्म लेते हैं उनका व्यक्तित्व कैसा होता है चलिए देखते हैं। चन्द्रमा को रोहिणी नक्षत्र का स्वामी कहा जाता है। इस नक्षत्र में जिनका जन्म होता है वे कल्पना की ऊंची उड़ान भरने वाले होते हैं।

वे अपनी कल्पना की दुनियां में खुश रहना पसंद करते हैं। इनका मन हिरण के समान चंचल होता है, किसी विषय पर देर तक विचार करना और मुद्दे पर कायम रहना इनके लिए कठिन होता है। कला के प्रति इनमें गहरी अभिरूचि होती है ये संगीत, नृत्य, चित्रकारी, शिल्पकला आदि में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। इनका स्वभाव मधुर और प्रेम से ओत प्रोत रहता है। इनका जीवन सुखमय रहता है, ये सभी प्रकार के सांसारिक सुखों का आनन्द लेते हैं। अगर ये प्रयास करें तो जीवन में निरंतर आगे की ओर बढ़ते रहते हैं। ये जिस विभाग या क्षेत्र में होते हैं उसमें उच्च पद तक जाते हैं।

विपरीत लिंग वालों के प्रति इनमें विशेष आकर्षण देखा जाता है, इनका जीवन रोमांस से भरपूर होता है।रोहिणी नक्षत्र के जातक सरकारी विभाग में हों या व्यवसाय में दोनों ही जगहों पर ये प्रसिद्धि और यश प्राप्त करते हैं  इन्हें माता से पूरा सहयोग मिलता है और प्रेम प्राप्त होता है, मां के साथ इस नक्षत्र के जातक का विशेष लगाव रहता है। ये हृदय से भावुक और संवदेनशील होते हैं, भावनाओं पर नियंत्रण रखना इनके लिए अच्छा रहता है।

ये जितने कल्पनाशील होते हैं, उसके अनुरूप अगर कल्पना को यथार्थ बनाने का प्रयास करें तो काफी आगे जा सकते हैं अन्यथा कल्पना रेत के महल बनकर रह जाते हैं। इनके जीवन में स्थायित्व की कमी पायी जाती है क्योंकि ये चींजों में परिवर्तन करते रहते हैं। इन्हे यात्रा करना, सैर सपाटा करना काफी अच्छा लगता है, परंतु अपने घर के प्रति भी बहुत लगाव रखते हैं। जीवन साथी के प्रति आकर्षण और हृदय से लगाव रहने के कारण इनका वैवाहिक जीवन बहुत ही सुखमय और आनन्दमय रहता है।

ये अपने मन पर बोझ लेकर नहीं चलते हैं इसलिए हमेशा प्रसन्न और खुश रहते हैं। इनके बच्चे समझदार और नेक गुणों वाले होते हैं। अपने नेक और सुन्दर व्यवहार रके कारण ये समाज और अपने परिवेश में आदर व सम्मान प्राप्त करते हैं।


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*वसंत नवरात्र 13 अप्रैल से 21 अप्रैल 2021 तक* चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल दिन मंगलवार प्रातः 5:30 से 10:15 तक। अभिजीत मुहूर्त 11:56 से दोपहर 12: 47 तक होगा। 13 अप्रैल से नव संवत्सर भारतीय नववर्ष की शुरुआत भी होगी। क्रमश: नवरात्र 13 अप्रैल प्रतिपदा ,शैलपुत्री। 14 अप्रैल द्वितीया, ब्रह्मचारिणी। 15 अप्रैल तृतीया, चंद्रघंटा। 16 अप्रैल चतुर्थी ,कुष्मांडा। 17 अप्रैल पंचमी, स्कंदमाता। 18 अप्रैल षष्ठी, कात्यायनी। 19 अप्रैल सप्तमी, कालरात्रि। 20 अप्रैल अष्टमी, महागौरी। 21 अप्रैल नवमी, सिद्धिदात्री मां का पूजन होता है। ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री के अनुसार दुर्गा सप्तशती नारायण अवतार श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में मार्कंडेय पुराण से ली गई है। इसमें 700 श्लोक व 13 अध्यायों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक क्रियाओं का इसके पाठ में बहुत उपयोग होता है। दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य ने बताया है कि शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य है। दुर्गासप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मवशिष्ठ विश्वामित्र ने शापित किया है। शापोद्धार के बिना पाठ का फल नहीं मिलता दुर्गा सप्तशती के 6 अंगों सहित पाठ करना चाहिए कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती का रहस्य बताया गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती की चरित्र का क्रमानुसार पाठ करने से शत्रु नाश और लक्ष्मी की प्राप्ति व सर्वदा विजय होती है।

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आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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