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विशोंत्तरी में नवग्रहों के दशा फल

Dr Rakesh Periwal 25th Jan 2019

विशोंत्तरी में नवग्रहों के दशा फल 

 

सूर्य दशा फल - 6 वर्ष 

सूर्य की दशा मे परदेश गमन, राज्य कार्य मे पदोन्नति, धन लाभ, व्यापार से आमदनी मे वृद्धि, ख्याति लाभ, धर्म मे अभिरुचि होती है। यदि सूर्य नीच राशि गत हो या पापयुत या पापदृष्ट हो, ऋण, पीड़ा, प्रियजनो का वियोग, कष्ट, राज्य से भय, कलह, रोगादि (मष्तिष्क पीड़ा, शूल, उदर पीड़ा, नेत्र रोग) अशुभ फल होते है। 

 

यदि सूर्य बलवान और अनुकूल हो, तो आत्मा का विकास, आध्यात्म प्राप्ति, शानदार जीवन, लम्बी दूरी की यात्रा, अच्छा लाभांश उत्पन्न करने वाले संघर्ष या विरोध, प्रतिष्ठा और पद मे उन्नति, व्यापार से लाभ, पिता से लाभ या पिता को लाभ होता है। यदि सूर्य बलहीन अथवा पीड़ित हो, तो आतंरिक विकृति, मानसिक और शारीरिक कौशल मे पतन, शारीरिक कष्ट, प्रतिष्ठा और पद मे अवनति, सरकार की नाराजी, पिता से पीड़ित या पिता को रोग या पिता की मृत्यु होती है।

 

बृहद्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार यदि सूर्य स्वगृही, उच्च, केंद्र स्थान, लाभ भाव, नवमेश (धर्मेश) या दशमेश (कर्मेश) के साथ, वर्ग मे बलवान हो, तो धनार्जन, सरकार से महान सौहार्द्र और सम्मान होता है।  जातक को पंचम भाव के स्वामी (पुत्रेश) के साथ होने पर पुत्र की प्राप्ति होती है। धनेश से युत होने पर सम्पत्ति की प्राप्ति, बंधु भाव के स्वामी (चतुर्थ स्थान) से युत होने पर वाहन सुख और आनन्द होता है। सूर्य की दशा मे जातक को सेनाध्यक्ष, राजा से सभी प्रकार की ख़ुशी का आनंद प्राप्त होता है।  इस प्रकार बलवान और अनुकूल सूर्य की दशा मे वस्त्राभूषण, सम्पत्ति, वाहन, सभी प्रकार की कृषि उपज, सम्मान प्राप्त होता है।

यदि सूर्य नीच राशि, शत्रु राशि, अरि या रन्ध्र या व्यय स्थान, अशुभ ग्रह से युत या दृष्ट, अरि या  रन्ध्र या व्यय के स्वामी ग्रह  से युत हो, तो चिंताऐ, धन हानि, सरकार से दंड, अपमान, स्वजनो से कष्ट, घर मे अशुभ घटनाऐ, पिता को कष्ट, पैतृक और मातृक चाचाओ को कष्ट, अकारण ही दूसरो से तनाव और शत्रुता के सम्बन्ध होते है। 

(बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार भावो के नाम : 1 प्रथम = तनु, 2 द्वितीय = धन, 3 तृतीय = सहज, 4 चतुर्थ = बंधु, 5 पंचम = पुत्र, 6 षष्ठ = अरि, 7 सप्तम = युवती, 8 अष्टम = रन्ध्र, 9 नवम = धर्म, 10 दशम = कर्म, 11 एकादश = लाभ, 12 द्वादश = व्यय।)

 

फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार यदि सूर्य शुभ*well placed हो, तो सूर्य की दशा मे क्रूर कर्मो के माध्यम से धन अर्जन, यात्रा और झगड़े, पहाड़ो पर घूमना, उद्योगो का रखरखाव, उद्यम मे सफलता, स्वभाव और प्रकृति (मनोवृत्ति) मे कठोरता, वास्तविकता, कर्तव्य भक्ति, ख़ुशी होती है।

यदि सूर्य अशुभ* badly placed हो, तो लड़ाई-झगडे, राजा का अचानक कोप, रिश्तेदारो मे रोग, जातक व्यर्थ घूमने वाला, तीव्र पीड़ा, छुपे धन से खतरा, आग लगने का भय, स्त्री-पुत्र को कष्ट होता है। 

* "well placed" means by sign, house, or aspect, and whether it is dignified or exalted.

* "badly placed" means by sign, house, or aspect, and whether it is debilitated. 

 

सूर्य मेष राशि मे हो, तो नेत्र रोग, धन हानि. राजभय, नाना प्रकार के कष्ट;  वृषभ मे हो, तो स्त्री पुत्र के सुख से हीन, हृदय और नेत्र रोगी, मित्रो से विरोध; मिथुन मे हो, तो अन्न-धन युक्त, शास्त्र - काव्य से आनंद, विलास ; कर्क मे हो, तो राज सम्मान, धन प्राप्ति, माता-पिता व बन्धुवर्ग से पृथकता, वातजन्य रोग; सिंह मे हो, तो राजमान्य, उच्च पदासीन, प्रसन्न; कन्या मे हो, तो कन्या रत्न की प्राप्ति, धन लाभ, धर्म मे अभिरुचि होती है। 

सूर्य तुला राशि मे हो, तो स्त्री-पुत्र चिंता, परदेश यात्राऐ, प्रदेश के अनेक प्रसंग;  वृश्चिक मे हो, तो प्रताप मे वृद्धि, ख्याति, विष अग्नि से पीड़ा;  धनु  मे हो, तो राज्य से प्रतिष्ठा, विद्या प्राप्ति;  मकर मे हो, तो स्त्री-पुत्र की चिंता, धन आदि की चिंता, चिंतातुर, त्रिदोष विकार, पर कार्यो से प्रेम;  कुंभ मे हो, तो  पिशुनता,  हृदय रोग, अल्प धन, कुटुम्बियों से विरोध और मीन मे हो, तो वाहन लाभ, प्रतिष्ठा मे वृद्धि, धनमान की प्राप्ति, विषम ज्वर होते है। 

 

चंद्र दशा फल - 10 वर्ष

चंद्र की दशा साधारणतया सौभाग्य सूचक रहती है। पूर्ण, उच्च, शुभ ग्रह से युत चन्द्रमा हो, तो उसकी दशा मे अनेक सम्मान, धारासभा (विधानसभा, राजयसभा, लोकसभा, विधान परिषद्) का सदस्य, चुनाव मे विजयी, विद्या धन आदि प्राप्त करने वाला होता है। यदि चन्द्रमा नीच, शत्रु राशि, पापमध्य मे हो, तो कलह, क्रूरता, क्रूर कार्यो से प्रसन्नता, शूल, सिरदर्द, धननाश, मानसिक आघात, रोग, शोक, चिंता आदि होते है।

 

यदि चन्द्रमा बलवान और अनुकूल स्थति मे हो. तो प्रसन्न हृदय, सुखी और तेज दिमाग, सूक्ष्म-ख़ुशी और सुविधा का आनंद लेने वाला होता है। यदि चन्द्रमा बलहीन और पीड़ित हो, तो ख़राब स्वास्थ्य, आलस्य, निष्क्रियता, नौकरी खोना या पदावनति, स्त्री से झगड़ा, माता को रोग या माता की मृत्यु होती है।

 

बृहत्पाराशर होरा शाश्त्र अनुसार चन्द्रमा की दशा प्रारम्भ से अंत तक यदि चंद्र उच्च, स्वराशि, केंद्र या लाभ या धर्म या पुत्र भाव मे हो, शुभग्रह से युत या दृष्ट, बलवान, धर्म या कर्म या बंधु भाव के स्वामी से युत हो, तो  समृद्धि और प्रताप, सौभाग्य, धनागम, घर मे मांगलिक उत्सव, भाग्योदय, सरकार मे उच्चपद, वाहन, वस्त्र, शिशु जन्म, पशु होते है। यदि ऐसा चंद्र धन भाव मे हो तो असाधारण विपुल धन और विलासता होती है।

यदि चन्द्रमा क्षीण, नीच हो तो उसकी दशा मे धन हानि होती है। यदि चंद्र सहज भाव मे हो, तो खुशिया आती-जाती रहती है। यदि चंद्र अशुभ ग्रहो से युत हो, तो मूर्खता, मानसिक तनाव, कर्मचारियो और माता से परेशानी, धन की हानि होती है। यदि क्षीण चंद्र अरि या रंध्र या व्यय भाव मे हो या अशुभ ग्रहो से युत हो, तो सरकार से शत्रुता पूर्ण सम्बन्ध, धन हानि  माँ को इसी तरह के दुष्प्रभाव से परेशानी होती है। यदि बलवान चंद्र अरि या रंध्र या व्यय भाव मे हो, तो क्लेश और अच्छाइया आती जाती रहती है। 

 

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर) अनुसार यदि चन्द्रमा पूर्ण बलवान हो, तो मानसिक शांति, सभी उद्यमो मे सफलता, संपत्ति का अधिग्रहण, अच्छा भोजन, पत्नी-पुत्र की प्राप्ति, वस्त्राभूषण, कृषि भूमि की प्राप्ति और ब्राह्मणो की भक्ति चंद्र दशा के प्रभाव होते है। शुक्ल पक्ष की एकम से दशमी तक चन्द्रमा मध्यम बली होता है,  इस अवधि वाले चंद्र की दशा के प्रभाव भी मध्यम होगे। शुक्ल पक्ष की एकादशी से कृष्ण पक्ष की पंचमी तक चन्द्रमा पूर्ण बलि होता है, इस अवधि वाले चंद्र की दशा के प्रभाव भी प्रबल व अच्छे  होगे। कृष्ण पक्ष की षष्ठी से अमावस्या तक चन्द्रमा निरंतर बलहीन होता जाता है, इस अवधि वाले चंद्र की दशा के प्रभाव भी कमजोर होगे।

 

चंद्र मेष राशि मे हो, तो स्त्री सुख, विदेश से प्रीति, कलह, सिर रोग; वृषभ मे हो, तो धन और वाहन लाभ, स्त्री से सुख, माता की मृत्यु, पिता को कष्ट; मिथुन मे हो, तो देशांतर गमन, संपत्ति लाभ; कर्क मे हो, तो गुप्त रोग, योन रोग, धन धान्य मे वृद्धि, कला प्रेम; सिंह मे हो, तो बुद्धिमान, सम्मान, प्रतिष्ठा, धन लाभ; कन्या राशि मे हो, तो विदेश गमन, महिला प्रेम, स्त्री प्राप्ति, काव्य प्रेम, धनागम होता है। 

चंद्र तुला राशि मे हो, तो विरोध, चिंता, अपमान, व्यापार से धन लाभ, मर्म स्थान मे रोग; वृश्चिक मे हो, तो मानसिक चिंता, रोग, साधारण धनलाभ या धनहानि, धर्म हानि; धनु राशि मे हो, तो धन नाश, आर्थिक हानि, वाहन लाभ;  मकर राशि मे हो, तो स्त्री-पुत्र-धन प्राप्ति, उन्माद या वायु रोग से कष्ट; कुम्भ मे हो, तो व्यसन, ऋण, नाभि के ऊपर और नीचे पीड़ा, नेत्र-दन्त रोग और मीन राशि मे चंद्र हो, तो अर्थागम, धन संग्रह, पुत्र लाभ और शत्रु  नाश आदि होता है।

 

मंगल दशा फल - 7 वर्ष 

मंगल की दशा धन योग बनाती है, परन्तु यह शुभकार्यो की अपेक्षा क्रूरकार्यो से ही धनागम योग बनाती है। इसकी दशा मे गृह-भूमि सम्बन्धी मामले, शस्त्र-चोर भय, शस्त्र-शत्रु तथा झगडे विवाद से अर्थ लाभ होता है।

 

 यदि मंगल उच्च या स्वग्रही या मूलत्रिकोणगत या केन्द्रगत या त्रिकोणस्थ हो, तो उसकी दशा मे यश लाभ, स्त्री-पुत्र का सुख, साहस, धन लाभ, गृह-भूमि की प्राप्ति, कृषि से लाभ, मानसिक शांति, आय के अनेक स्त्रोत होते है। यदि मंगल वक्री, अस्त, नीच, का हो तो पित्त प्रकोप, रुधिर रोग, पक्षाघात, मूर्च्छा रोग होते रहते है। पत्नी से कलह, भाइयो से वैमनस्य, अधिकारियो से उग्र मतभेद, नई-नई चिन्ता होती है।

 

यदि मंगल बलवान और अनुकूल स्थिति मे हो, तो भाइयो से या भाइयो के द्वारा लाभ, सेना मे प्रवेश या पदोन्नति,  भूमि लाभ, अच्छा स्वास्थ्य, आशावादी, साहसी, दृढ़, पारा मिलटरी या पुलिस मे सेवारत होता है। यदि मंगल बलहीन और पीड़ित हो, तो गिरना, घाव, रक्तल्पता, दण्डित, झगड़ालू, कटुभाषी, शत्रु बनाने वाला, नफ़रत करने वाला, मुकदमेबाज होता है।

 

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार मंगल की दशा मे यदि मंगल उच्च, मूलत्रिकोण, स्वगृही, केंद्र या धन या  लाभ  भाव मे बलवान हो या शुभ नवांश मे या शुभ ग्रह से युत या दृष्ट हो, तो राज्य की प्राप्ति (उच्च प्रशासनिक पद या सरकार मे सुदृढ़ राजनैतिक स्थति, धन व कृषि भूमि का अर्जन, सरकार द्वारा मान्यता) विदेशो से धन, वस्त्राभूषण, वाहन होते है।  भाइयो से सुख व मधुर सम्बन्ध होते है। यदि बलवान मंगल केंद्र या सहज (तृतीय) भाव में हो, तो वीरता से धनार्जन, शत्रु पराजय, पत्नी और बच्चो से ख़ुशी होती है। हलाकि दशा के अंत में कुछ प्रतिकूल प्रभावो की सम्भावना रहती है। यदि मंगल नीच, बलहीन या अशुभ भाव या अशुभ ग्रहो से युत या दृष्ट हो, तो धननाश, संकट और उपरोक्त प्रभाव प्रतिकूल होते है।      

 

फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार आग और झगडे आदि से धनाजर्न, मिथ्या प्रशासन से धन लाभ, धोखाधड़ी और क्रूर कार्य, हमेशा पित्त विकारो से ग्रस्त, ताप, रक्त अशुद्धता, निम्न वर्ग की महिलाओ के साथ साजिश, अपनी पत्नी, बच्चो, रिश्तेदारो और बुजर्गो से झगड़ा और इसके कारण दुःख, दूसरो के भाग्य का आनंद जैसे प्रभाव अनुभव मे मंगल की दशा मे आते है। 

 

मंगल मेष राशि मे हो, तो उसकी दशा मे धन लाभ, ख्याति, अग्नि पीड़ा, गृह-भूमि प्राप्ति; वृषभ मे हो, तो रोग, अन्य से धन लाभ, परोपकारी; मिथुन मे हो, तो विदेश वासी, कुटिल, खर्चीला, पित्त और वायु विकार, कर्ण रोग; कर्क में हो, तो धनयुक्त, स्त्री-पुत्र से दूर निवास, क्लेश; सिंह मे हो, तो शासन से लाभ, राज्य से धनागम, शस्त्राग्नि पीड़ा, धन व्यय और कन्या मे हो, तो पुत्र, भूमि, धन-धान्य से भरपूर होता है। 

तुला राशि मे मंगल हो, तो स्त्री हीन, उत्सव हीन, अधिक झंझट, क्लेश; वृश्चिक मे हो, तो धन-धान्य से परिपूर्ण, अग्नि व शस्त्र से पीड़ा; धनु मे हो, तो विजय लाभ, धनागम, राजमान; मकर मे हो, तो अधिकार प्राप्त, स्वर्ण-रत्न लाभ, कार्यसिद्धि; कुम्भ मे हो तो आचार हीन, दरिद्र, रोग, चिंताए और मीन राशि मे हो, तो ऋण, विसूचिका रोग, चिंता, हानि, खुजली आदि रोग होते है।

 

राहु दशा फल - 18 वर्ष 

राहु की दशा सामान्यतया कष्ट दायक मानते है। कुछ मत तो 18 वर्षो मे छठा, आठवा वर्ष अनिष्टकारी मानते है।उच्च का राहु हो, तो धन-संपत्ति का लाभ, विजय, उच्चपद आदि की प्राप्ति होती है। लघु पाराशरी अनुसार राहु-केतु छाया ग्रह होने से भाव अनुसार व अन्य ग्रह से युति अनुसार फल देते है। लघु पाराशरी अनुसार ही राहु-केतु केंद्र या त्रिकोण मे हो या केंद्र, त्रिकोण के स्वामियो से युत हो, तो  योगकारक होने से अपनी दशा, अन्तर्दशा मे अत्यंत शुभ फल देते है।   

 

यदि राहु अनुकूल हो, तो सत्तारूढ़ शक्तियो की प्राप्ति या झूठ के सहारे शासकीय पक्षो मे वृद्धि, चालाक, बेईमानी से धन लाभ ज्यादा अर्जित करना, रहवास बदलना होता है। यदि राहु प्रतिकूल हो, तो अनेक प्रकार की हानिया, सर्पदंश, दिमागी विघटन, भ्रम, दृष्टिभ्रम, अस्थमा और एक्जिमा आदि होते है। यह शिक्षा और तरक्की के लिये सबसे ख़राब दशा है जिसमे व्यवधान आते है या शिक्षा खंडित होती है।  

 

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार राहु की उच्च राशि वृषभ और केतु की उच्च राशि वृश्चिक, राहु-केतु की  मूलत्रिकोण राशि मिथुन व धनु, राहु-केतु की स्वराशि कुम्भ व वृश्चिक, (कुछ महर्षि अनुसार कन्या और मीन) होती है। यदि राहु उच्च, मूलत्रिकोण या स्वगृही (कुम्भ या कन्या) हो, तो धनार्जन व कृषि उपज से महा ख़ुशी, मित्रो और सरकार  की सहायता से वाहन की प्राप्ति, नये भवन (घर) का निर्माण, पुत्र जन्म, धार्मिक झुकाव, विदेशी सरकार से मान्यता, धनार्जन, वस्त्राभूषण आदि होते है। राहु शुभ ग्रह से दृष्ट, युत, या शुभ राशि या तनु या बंधु या युवती या कर्म  या लाभ या सहज भाव मे हो, तो उसकी दशा मे सरकार के उपकार से सभी प्रकार के आराम, विदेशी सरकार या सम्प्रभु और घर के सौहार्द्र के माध्यम से संपत्ति की प्राप्ति होती है। 

यदि राहु रन्ध्र या व्यय भाव मे हो, तो राहु दशा मे विपत्ति और परेशानिया होती है। यदि राहु अशुभ ग्रह या मारक ग्रह या नीच राशि मे हो, तो राहु की दशा मे प्रतिष्ठा की हानि, आवासीय घर का विनास, मानसिक संताप, पत्नी और बच्चो को कष्ट, दुर्भाग्यवश ख़राब भोजन आदि फल होते है। राहु की दशा के प्रारम्भ मे धनहानि, स्वदेश मे  कुछ आर्थिक लाभ व राहत और दशा के अंत मे परेशानी व चिंताए होती है।

 

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर) अनुसार राहु की दशा मे राजा, चोर, अग्नि, शस्त्र, जहर का खतरा, बच्चो  से मानसिक तनाव, भाइयो की हानि, नीचजाति के लोगो से अपमान, बेइज्जती, सभी उद्यमो मे हानि और असफलता, पदावनति होती है। यदि राहु शुभ ग्रह से युत या शुभ स्थान (भाव) मे हो, तो राजा की तरह वैभवशाली, उद्यमो में सफल, सुखी जीवन, अतुल सम्पदा, विश्व प्रसिद्ध होता है। यदि राहु कन्या, मीन, वृश्चिक में हो तो अपने दशा काल मे ख़ुशी, प्रतिष्ठा, जमीन का स्वामित्व वाहन, सेवक देता है परन्तु यह सब दशा समाप्त होने पर नष्ट हो जाता है। प्रभाव जैसे शत्रु से खतरा, चोरी, राजा का क्रोध, शस्त्र आघात का भय, गर्मी के रोग, पारिवारिक कलंक, अग्नि भय, गंभीर अपराधो के कारण मूल स्थान से निर्वासन फल भी होते है। 

◾मन्त्रेश्वर ने उपरोक्त फल ग्रहो के सामान्य क्रम अनुसार बताये है। विंशोत्तरी ग्रह क्रम अनुसार राहु दशा काल मे स्वभाव मे दुष्ट बनना, गंभीर रोग से पीड़ित होना, जातक की पत्नी और संतान का नष्ट होना, विष का भय या खतरा, शत्रु से कष्ट या परेशानी, नेत्र और हृदय रोग, मित्र, कृषि कर्मी, राजा से वैर अनुभव मे आते है। 

 

मेष राशि मे राहु हो, तो उसकी दशा मे अर्थलाभ, साधारण सफलता, घरेलू झगडे, भाइयो से विरोध; वृषभ मे हो, तो राज्य से लाभ, कष्ट, अधिकार प्राप्ति, सहिष्णुता, सफलता; मिथुन मे हो. तो दशा प्रारम्भ मे कष्ट, मध्य मे सुख; कर्क मे हो, तो अर्थलाभ, पुत्रलाभ, कार्य प्रारम्भ करना, धन संचित करना; सिंह मे हो, तो प्रेम, ईर्ष्या, रोग, सम्मान, कार्यो मे सफलता और कन्या राशि मे हो, तो मध्यम वर्ग के लोगो से लाभ, व्यापार से लाभ, नीच कार्यो से प्रेम, संतोष होता है। 

तुला राशि मे राहु हो, तो झंझट, अचानक कष्ट, बंधु-बांधवो से क्लेश, धन लाभ, यश और प्रतिष्ठा मे वृद्धि; वृश्चिक मे हो, तो नीच कार्यो में रत, शत्रुओ से हानि, आर्थिक कष्ट; धनु मे हो, तो यश लाभ, धारा सभाओ मे प्रतिष्ठा, उच्चपद की प्राप्ति; मकर मे हो, तो सिर रोग, वात रोग आर्थिक संकट; कुम्भ मे हो तो धन लाभ, व्यापार मे साधारण लाभ, विजय और मीन राशि मे राहु हो, तो विरोध, झगड़ा, रोग, अल्पलाभ आदि फल होते है। 

 

गुरु दशा फल - 16  वर्ष

गुरु की दशा जीवन में श्रेष्ट ही रहती है।  गुरु दशा काल मे ज्ञान लाभ, धन-अस्त्र-वाहन लाभ, परीक्षा-साक्षात्कार मे सफलता, राजयकार्य मे लाभ, देवार्चना मे सलग्नता, भोग, समाज मे सम्मान, राज्य से पुरस्कार, अधिकारियो से संपर्क, धार्मिक यज्ञादि कर्म आदि फल होते है। यदि गुरु नीच, अस्त, वक्री हो, तो कण्ठरोग, गुल्मरोग, पिल्हारोग, असफलता आदि फल होते है। 

 

यदि गुरु बलवान, शुभ भाव और योग कारक हो, तो अध्ययन के प्रति झुकाव, ज्ञान मे वृद्धि होती है।  यदि गुरु की दशा आयु की मध्य अवस्था  मे आती है, तो धनागम, पुत्र की प्राप्ति,  तीर्थ यात्रा, शुभ उत्सव होते  है। यदि गुरु की दशा आयु की अंतिम अवस्था मे आती है, तो बेहतर आय और वित्त होता है। यदि गुरु प्रतिकूल या पीड़ित हो, तो अधुरी शिक्षा, असफलता, प्रतिष्ठा गिरने से दुर्गति, ख़राब स्वास्थ्य, दरिद्रता, बुरे कर्म, निराशा, पुत्र या पोते को पीड़ा होती है।  

 

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार गुरु महा शुभ और देवताओ का शिक्षक यदि उच्च, स्वगृही, मूलत्रिकोण, कर्म  या पुत्र या धर्म भाव या स्वनवांश या उच्च नवांश मे हो, तो अपने दशा काल मे साम्राज्य अभिग्रहण, अत्यंत सुविधा, शासन से मान्यता, वस्त्राभूषण और वाहन प्राप्ति, देव-ब्राह्मण की भक्ति, पत्नी और संतान से ख़ुशी, धार्मिक बलिदान (यज्ञ, चढ़ावा) के प्रदर्शन मे सफलता होती है। 

यदि गुरु नीच, अस्त, अशुभ ग्रहो से युत या अरि या रंध्र भाव मे हो, तो उसकी दशा मे रहवास परिसर का नाश, तनाव, संतान को पीड़ा, पशु हानि, तीर्थ हानि होती है। दशा प्रारम्भ मे कुछ प्रतिकूल प्रभाव देती है बाद मे अनुकूल प्रभाव अर्थ लाभ, सरकार से मान्यता और पुरस्कार आदि फल होते है। 

 

फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार गुरु की दशा मे धर्मिक मामलो मे भागीदारी, शिशु जन्म या शिशु से ख़ुशी, राजा द्वारा सम्मान, प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा प्रशंसा, हाथी-घोड़े व अन्य वाहन की प्राप्ति, इच्छाओ की पूर्ति, पत्नी और बच्चो से स्नेहपूर्ण आत्मीय सम्बन्ध, मित्रो से मिलन आदि फल अनुभव मे आते है।

 

मेष राशि मे गुरु हो, तो उसकी दशा मे अफसरी अर्थात अधिकार पद, विद्या, स्त्री, पुत्र, धन, सम्मान आदि का लाभ; वृषभ राशि मे हो, तो रोग, विदेश मे निवास, धनहानि; मिथुन मे हो, तो क्लेश, विरोध, धननाश; कर्क मे हो, तो राज्य से लाभ, ऐश्वर्यलाभ, ख्यातिलाभ, मित्रता, उचपद, सेवावृत्ति; सिंह मे हो, तो राजा से मान, स्त्री-पुत्र-बंधु लाभ, हर्ष, धन-धान्य पूर्ण; कन्या मे हो, तो स्त्री के आश्रय से धनलाभ, शासन मे योगदान, भ्रमण या देशाटन, विवाद, कलह आदि फल होते है। 

तुला राशि मे गुरु हो, तो फोड़ा-फुंशी, विवेक हीनता, अपमान, शत्रुता; वृश्चिक मे हो, तो पुत्रलाभ, निरोगता, धनलाभ, पूर्ण ऋण अदा होना; धनु राशि मे हो, तो मंत्री, धारासभा सदस्य (लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा)  उच्च पदासीन, अल्पलाभ; मकर मे हो, तो आर्थिक कष्ट, गुह्य स्थानो मे रोग; कुम्भ मे हो, तो राज्य से सम्मान, धारासभा सदस्य, विद्यालाभ, साधारण धनागम तथा साधारण आर्थिक सुख और मीन राशि मे हो, तो विद्या, धन, स्त्री-पुत्र अदि से संपन्न, प्रसन्नता, सुख आदि फल होते है। 

 

शनि दशा फल 19 वर्ष 

राजनैतिक कार्यो मे शनि की दशा सहायक होती है। बलवान शनि की दशा मे जातक को धन, जन, सवारी, भ्रमण, प्रताप, कीर्ति, रोग, क्रय-विक्रय से लाभ, भाग्योदय आदि फल होते है। नीच, अस्त या वक्री शनि की दशा मे आलस्य, निद्रा, त्रिदोष के रोग, व्यभिचार, स्त्री प्रसंग से विरक्ति, चर्म रोग, अनैतिकता, बेईमानी आदि होते है।

 

यदि शनि अनुकूल है, तो अपने सख्त प्रायसो और कठिन मेहनत से सेवा मे उन्नति करता है, शनि द्वारा संकेतित चीजो से लाभ प्राप्त करता है और विरासत पाता है। किन्तु शनि प्रतिकूल हो, तो कुपोषण आदि के कारण रोग ग्रस्त, गरीबी, मुकदमा, झगड़ा, वृद्धो से अनबन, परिवार या निकट सम्बन्ध मे मृत्यु, प्रगति की राह मे रूकावट और बाधा, जीवन मे चारो ओर संकट होता है। 

 

 बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार शनि जो सब ग्रहो मे सबसे कमजोर और निचला माना जाता है यदि उच्च, स्वगृही, मूलत्रिकोण, मित्र राशि, स्वनवांश या उच्च नवांश या सहज या लाभ भाव  मे हो, तो शनि दशा काल मे शासन से मान्यता, समृद्धि और महिमा, नाम और प्रसिद्धि, शिक्षा के क्षेत्र मे सफलता, आभूषण और वाहनादि का अर्जन, धन लाभ, सम्पत्ति की प्राप्ति, सरकार से समर्थन, सेना अध्यक्ष जैसा उच्च पद, देवी लक्ष्मी की उदारता, राज्य की प्राप्ति, शिशु जन्म होता है।

यदि शनि अरि  या रंध्र या व्यय भाव मे हो, नीच या अस्त हो, तो उसकी दशा मे जहर से दुष्प्रभाव, शस्त्राघात, पिता से विछोह, पत्नी और बच्चो को कष्ट, सरकार की नाराजी से आपदा, जेल इत्यादि होते है।  यदि शनि शुभ ग्रह से युत या दृष्ट, केंद्र या त्रिकोण, धनु या मीन मे हो, तो राज्य, वाहन, वस्त्र का अर्जन (अधिग्रहण) होता है ।   

 

फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार शनि की दशा मे पत्नी और बच्चो को रूमेटिस्म या गाउट रोग की पीड़ा, कृषि मे नुकसान, ख़राब बात, दुष्ट महिलाओ के साथ सम्भोग, नौकरो द्वारा नौकरी छोड़ना, धन का नाश होना फल जातक को अनुभव मे आते है। 

 

मेष मे शनि हो, तो  दशा मे स्वतंत्रता, मर्म स्थान मे रोग, चर्म रोग, प्रवास, बंधु-बांधव से वियोग; वृषभ मे हो, तो निरुद्यम, वायु पीड़ा, कलह, वमन, आंत के रोग, राज्य से सम्मान, विजय लाभ; मिथुन मे हो, तो कष्ट, ऋण, चिंता, परतंत्रता; कर्क मे हो, तो नेत्र-कर्ण रोग, बंधु वियोग, विपत्ति, दरिद्रता; सिंह मे हो, तो रोग, आर्थिक कष्ट; कन्या राशी मे हो, तो गृह निर्मण, भूमि लाभ, सुखी होना आदि फल होते है। 

तुला राशि मे हो, तो धन-धान्य का लाभ, विलास, भोगोपभोग की वस्तुओ की प्राप्ति, विजय; वृश्चिक मे हो, तो भ्रमण, कृपणता, साधारण आर्थिक कष्ट, नीच का संग; धनु मे हो, तो राजा के समान, जनता मे ख्याति, आनन्द, प्रसन्ता, यश लाभ; मकर मे हो, तो आर्थिक संकट, विश्वासघात, बुरे व्यक्तियो का साथ; कुम्भ मे हो, तो पुत्र-धन और स्त्री का लाभ, विजय और मीन मे हो, तो अधिकार प्राप्ति, सुख, सम्मान, उन्नति आदि फल होते है।

 

बुध दशा फल - 17 वर्ष 

बुध की दशा मे व्यापर मे वृद्धि, व्यवसाय मे विस्तारीकरण, गृह मे उत्सव, शुभ समाचारो की प्राप्ति, दुत्कारी मे वृद्घि, आजीविका की प्राप्ति, धार्मिक कृत्य होते है। बुध उच्च, स्वगृही, बलवान हो, तो विद्या, विज्ञान, व्यापार-व्यवसाय, शिल्पकर्म मे उन्नति, धन लाभ, स्त्री पुत्र को सुख होता है। यदि बुध नीच, अस्त, वक्री हो अथवा त्रिक 6, 8 12  भाव मे हो, तो त्रिदोष (वात-पित्त-कफ) विकार, संचित पूंजी का नाश, हानि होते है।

 

यदि बुघ बलवान और अनुकूल हो, तो अध्ययन और लेखन आदि मे समर्पित, सक्रीय, वाणिज्य या राजनीति या कूटनीति मे संलग्न, व्यापार और दूसरो से लेनदेन मे लाभ, मित्रो की संगती का आनंद, तनाव रहित शांत वातावरण मे रहने वाला होता है। यदि बुध बलहीन और पीड़ित हो, तो तंत्रिका (स्नायु) रोग से पीड़ित, यकृत रोग, मित्रो और रिश्तेदारो से हानि, अपनो के कारण दूसरे बईमान, मानहानि, नापसन्दी  होती है। 

 

बृहत्पराशर होरा शास्त्र अनुसार यदि बुध उच्च, स्वगृही, मित्र राशि या लाभ या पुत्र या धर्म भाव मे हो तो बुध दशा मे धन संचय, प्रतिष्ठा मे वृद्धि, ज्ञान वृद्धि, सरकार से हितकारिता, घर मे मांगलिक कार्य (उत्सव) पत्नी और बच्चो से ख़ुशी, अच्छा स्वास्थ्य, मिष्ठानो की उपलब्धता, व्यापार मे लाभ इत्यादि होते है। यदि बुध पर धर्मेश और कर्मेश की दृष्टि हो, तो उपरोक्त फायदेमंद परिणाम पूर्ण अनुभव मे आते है और पूरे दशा काल मे हर प्रकार की सुविधा रहती है। 

यदि बुध अशुभ ग्रहो से दृष्ट हो, तो सरकार द्वारा सजा, भाइयो से वैर, विदेश यात्रा, दूसरो पर निर्भरता, संभवतया मूत्र कष्ट होते है। यदि बुध अरि या रंध्र या व्यय भाव मे हो, तो स्वास्थ्य हानि, कामुक गतिविधियो मे आसक्ति होने से धन हानि, संधिशोथ, पीलिया  रोग की संभावना, चोरी का खतरा और सरकार से अपमान इत्यादि होते है।  बुध की दशा के प्रारम्भ मे संपत्ति मे वृद्धि, शैक्षणिक क्षेत्र मे सुधार, शिशु जन्म और ख़ुशी, मध्य दशा मे सरकार से मान्यता और अंतिम दशा काल रंजीदा (शोकाकुल) होती है।       

 

फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार दोस्तो से मिलन, ख़ुशी, विद्वानो से प्रशंसा, प्रसिद्धि की प्राप्ति, गुरु से लाभ, भाषण मे विशिष्टता या वाक्पटुता , दूसरो की सहायता, पत्नी बच्चो रिश्तेदारो को सुख बुध की दशा मे होते है।

 

बुध मेष राशि मे हो, तो धन हानि, छल कपट युक्त व्यवहार के लिए प्रवृत्ति; वृषभ मे हो, तो धनागम, यश लाभ, स्त्री-पुत्र की चिंता, विष से कष्ट: मिथुन मे हो, तो अल्प लाभ, कष्ट, माता को सुख;  कर्क मे हो, तो धनार्जन, काव्य सृजन, विदेश गमन, योग्य प्रतिभा की जागृति; सिंह मे हो, तो ज्ञान, यश, धननाश; कन्या राशि मे हो, तो ग्रंथो की रचना, प्रतिभा का विकास, धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

बुध तुला राशि मे हो, तो स्त्री से कलह या पीड़ा, दान या भेट देना, धार्मिक कृत्य; वृश्चिक मे हो, तो कामपीड़ा व अधिक अनाचार, व्यय; धनु मे हो, तो केंद्र या राज्य मे मंत्री, शासन की प्राप्ति, नेतागिरी, नेतृत्व; मकर मे हो, तो नीचो से मित्रता, अल्प लाभ, धन

 

हानि; कुम्भ मे हो, तो बंधुओ को कष्ट, रोग, दरिद्रता, दुर्बलता और मीन मे हो, तो दमा-खांसी से कष्ट, क्षय रोग, विष-अग्नि-शस्त्र से पीड़ा, नाना प्रकार की झंझटें, व्याधि आदि फल होते है।

 

केतु दशा फल - 7 वर्ष 

राहु की दशा की अपेक्षा केतु की दशा शुभ होती है फिर भी जातक इस दशा मे अपने कार्यो पर पछताता रहता है। योजनाओ मे असफलता, शारारिक कष्ट, मित्रो से बिगाड़, राजयकार्य मे बाधा, व्यर्थ का व्यय, धन हानि, व्याधि आदि फल होते है। शुभ दृष्टि हो, तो केतु की दशा मे अर्थ प्राप्ति, शान्ति, उन्नति आदि फल होते है।

 

यदि केतु अनुकूल हो, तो दर्शन ग्रंथो का अध्ययन और पूजा मे सलग्न, दवाइयो से अत्यधिक आमदनी, धरेलू आराम और विलासता, सौभाग्य और रोगो से मुक्ति होती है। यदि केतु प्रतिकूल हो, तो शरीर मे तीव्र दर्द, दिमागी पीड़ा, दुर्घटना, धाव, बुखार, नीच लोगो की संगती और उनसे बुरे परिणाम होते है।  

 

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार यदि केतु केन्द्र, त्रिकोण, लाभ भाव, शुभ ग्रह की राशि या स्वराशि मे हो, तो राजा से मधुर सम्बन्ध, देश या गांव प्रमुख बनने की इच्छा, वाहन सुख, बच्चो से ख़ुशी, विदेशो से लाभ, पत्नी से सुख, पशु धन की प्राप्ति होती है।  यदि केतु सहज या अरि या लाभ भाव मे हो, तो राज्य अधिग्रहण, मित्रो से मधुर सम्बन्ध होते है। केतु की दशा प्रारम्भ मे राज योग, मध्य मे भयानकता और दशा अंत मे बीमारियो और दूर देश की यात्राओ से कष्ट होता है। यदि केतु धन या रंध्र या व्यय मे हो, या अशुभ ग्रह से दृष्ट हो, तो जेल, भाइयो और रहवास  का नाश, तनाव, भृत्य लोगो की संगति होती है।

 

फलदीपिका  (मंत्रेश्वर) अनुसार केतु की दशा मे स्त्रियो से दुःख और भ्रम, अमीरो से कष्ट, सम्पत्ति का नाश होता है। व्यक्ति दूसरो के साथ अन्याय करेगा, देश या मूल स्थान से निर्वासित होगा। दांतो मे परेशानी, पैरो मे दर्द और कट्टरपंथी परेशानिया होती है।

 

केतु यदि मेष राशि मे हो, तो धन लाभ, यश, स्वास्थ्य; वृषभ मे हो, तो कष्ट, हानि, पीड़ा, चिंता, अल्पलाभ; मिथुन मे हो, तो कीर्ति, बंधुओ से विरोध, रोग, पीड़ा; कर्क मे हो, तो सुख, कल्याण, मित्रता, स्त्री-पुत्र लाभ; सिंह मे हो, तो अल्प सुख, धन लाभ और कन्या राशि मे हो, तो निरोग, प्रसिद्ध, सत्कार्य प्रेम आदि फल होते है।

यदि केतु तुला राशि मे हो, तो व्यसनों मे  रूचि, कार्य हानि, अल्प लाभ; वृश्चिक मे हो, तो धन-सम्मान- स्त्री-पुत्र लाभ, कफ, बंधन जन्य (कारावास) कष्ट; धनु मे हो तो सिर मे रोग, नेत्र पीड़ा, भय; मकर मे हो, तो आर्थिक संकट, पीड़ा, चिंता, बंधु-बांधवो का वियोग और मीन राशि मे हो तो साधारण लाभ, अकस्मात धन प्राप्ति, लोक मे ख्यति, विद्या लाभ कीर्ति लाभ आदि फल होते है। 

 

शुक्र दशा फल  - 20 वर्ष    

शुक्र की दशा मे भोग विलास की इछाओ की पूर्ति, रत्न, आभूषण, सम्मान, नवीन कार्य, मदन पीड़ा, वाहन सुख, आकस्मिक द्रव्य लाभ, ललित कला से सम्मान होते है। निर्बल शुक्र की दशा मे चित्त संताप, कलह, विरोध, धन हानि, गुप्तांगो के रोग आदि होते है।

 

शुक्र की दशा मे कलात्मक वस्तु और आनंद की प्राप्ति, दूसरो के साथ सामंजस्य पूर्ण तरीके लाभ मे पारस्परिक रूप से सहसञ्चालन, प्रेम मे पड़ना, विवाह  होना, पत्नी से प्रेम और स्नेह मे वृद्धि, कन्या जन्म, कुछ महिला या शुभचिंतको के पक्ष के कारण उन्नति होती है।  

 

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र अनुसार यदि शुक्र उच्च, स्वराशि, केंद्र या त्रिकोण मे हो तो उसकी दशा मे वस्त्राभूषण, वाहन, जमीन, पशु, प्रतिदिन मिष्ठान की उपलब्धता, संप्रभु से मान्यता, नाट्य संगीत के विलासता पूर्ण उत्सव,  देवी लक्ष्मी की उदारता (आशीर्वाद) होती है। यदि शुक्र मूल त्रिकोण मे हो, तो निश्चित ही राज्य व धर की प्राप्ति, पुत्र या पोते का जन्म, परिवार मे विवाह का जश्न, मित्रो से मिलन, उच्च पद, खोई संपत्ति, राज्य, जमीन-जायदाद वापस प्राप्त होती है। 

यदि शुक्र अरि या रंध्र या व्यय भाव मे हो, तो भाइयो से रिश्तेदारी मे कटुता, पत्नी को कष्ट, व्यापार मे घाटा, पशुओ का नष्ट होना रिश्तेदारी मे अलगाव होता है। यदि शुक्र धर्मेश या कर्मेश होकर बंधु स्थान मे स्थित हो, तो उसकी दशा काल मे देश या गावं का शासन प्रमुख, पवित्र कर्म करने वाला, जलाशय और मंदिर निर्माण कराने वाला, अनाज दान करने वाला, हर रोज मिष्ठान प्राप्त वाला, कठोर परिश्रमी, नामी और प्रसिद्ध, पत्नी बच्चो से सुखी होता है। यदि शुक्र धन या युवती  स्थान का स्वामी हो, तो उसकी दशा मे दर्द, कष्ट होता है।

 

फलदीपिका (मंत्रेश्वर) अनुसार अपने मनोरंजन और ख़ुशी अनुसार साम्रग्री और सुविधा, श्रेष्ट वाहन, गाय, रत्न, आभूषण, खजाना की प्राप्ति, युवती के साथ सम्भोग (आनंद) बौद्धिक गतिविधिया, समुद्री यात्राएं, राजा द्वारा सम्मान और घर मे शुभ कार्य का उत्सव शुक्र की दशा मे होते है।     

 

मेष राशि मे शुक्र हो, तो उसकी दशा मे चंचलता, विदेश भ्रमण, उद्वेग प्रेम, धन हानि; वृषभ मे हो,

 

 तो विद्या लाभ, कन्या रत्न की प्राप्ति, धन; मिथुन मे हो, तो काव्य प्रेम, प्रसन्नता, धन लाभ, प्रदेश गमन, व्यवसाय मे उन्नति; कर्क मे हो, तो उद्यम से धन लाभ, आभूषण लाभ, स्त्रियो से विशेष प्रेम; सिंह मे हो, तो साधारण आर्थिक कष्ट, स्त्रियो से धन लाभ, पुत्र हानि, पशुओ से लाभ और कन्या राशि मे हो, तो आर्थिक कष्ट, दुखी, प्रदेश गमन, स्त्री पुत्र से विरोध होता है। 

कन्या राशि मे शुक्र हो, तो ख्याति लाभ, भ्रमण, अपमान; वृश्चिक मे हो, तो प्रताप, क्लेश, धन लाभ, सुख, चिंता; धनु राशि मे हो, तो काव्य प्रेम, प्रतिभा का विकास; मकर राशि मे हो, तो चिंता, कष्ट, वात रोग; कुम्भ राशि हो, तो व्यसन, कष्ट, धन हानि, दुर्घटना और मीन राशि मे हो, तो राजा से धन लाभ, व्यापार मे लाभ, कारोबार मे वृद्धि, नेतागिरी आदि फल होते है।


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