अश्वनी नक्षत्र चरण फल,भरणी नक्षत्र चरण फल,कृतिका नक्षत्र चरण फल ,कृतिका नक्षत्र चरण फल ,मर्गशिरा

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Astro Rakesh Periwal 22nd Jan 2019

 

नक्षत्र चरण फल :  प्रत्येक नक्षत्र मे चार चरण होते है और एक चरण 3 अंश 20 कला का होता है। यह नवमांश जैसा ही है यानि इससे राशि के नौ वे भाग का फलित मिलता है। प्रत्येक चरण मे तीन ग्रह का प्रभाव होता है 1- राशि स्वामी, 2- नक्षत्र स्वामी, 3- चरण स्वामी।

 

अश्वनी नक्षत्र चरण फल:

 

प्रथम चरण :  इसमे मंगल, केतु और मंगल का प्रभाव है। मेष 00 अंश से 03 अंश 20 कला।  इसका स्वामी मंगल है। यह शारारिक क्रिया, साहस, प्रेरणा, प्रारम्भ का द्योतक है। जातक मध्यम कद, बकरे जैसा मुंह, छोटी नाक और भुजा, कर्कश आवाज, संकुचित नेत्र, कृश, धायल अथवा नष्ट अंग वाला होता है।

इसके गुणदोष - शारारिक सक्रियता, साहस, प्रोत्साहन, आवेगी बली. भावनावश  परिणाम की बिना चिंता कार्य है। जातक नृप सामान, निर्भीक, साहसी, अफवाहो के प्रति आकर्षित, मितव्ययी, वासनायुक्त, भावुक होता है।

 

द्वितीय चरण :  इसमे मंगल, केतु और शुक्र का प्रभाव है। मेष 03 अंश 20 कला से 06 अंश 40 कला। इसका स्वामी शुक्र है। यह अवबोध, अविष्कार, साकार कल्पना का द्योतक है। जातक श्याम वर्णी, चौड़े कन्धे, लम्बी नाक, लम्बी भुजा, छोटा ललाट, खिले नेत्र, मधुर वाणी, कमजोर जोड़ वाला होता है।

इसके गुणदोष - अवबोध, आविष्कारी, अश्विनीकुमार जैसी सदभावना, कल्पनाओ (भौतिक) को साकार करना है।  जातक धार्मीक, हंसमुख, धनवान होता है।

 

तृतीय चरण  :  इसमे मंगल, केतु और बुध का प्रभाव है। मेष 06|40 से 10|00 अंश। इसका स्वामी बुध है। यह विनोद, संचार, फुर्ती, व्यापकता का द्योतक है।  जातक काले बिखरे बाल, सुन्दर नेत्र व  नाक, गौर वर्ण, वाकपटु, पतले जांध व नितम्ब वाला होता है।

इसके गुणदोष - विनोद, आदान-प्रदान, विस्तीर्ण योग्यता, दिमागी फुर्ती है। जातक विद्वान, ज्ञानवान, भोजन प्रेमी, भौतिकवादी, अशांत, तर्क आधारी, साहसिक होता है।

 

चतुर्थ चरण :   इसमे मंगल, केतु और चन्द्र का प्रभाव है। मेष 10|00 से 13|20 अंश , इसका स्वामी चन्द्र है। यह चेतना, भावुकता, सहानुभूति का द्योतक है। जातक व्याकुल नेत्र, साहसी, ठिगना, नट अथवा नृत्यक, भ्रमणशील; खुरदरे नख, विरल कड़े रोम, कृश, भाई हीन होता है।

इसके गुणदोष - सामूहिक चेतना, महत्व, जानकारी, भावुकता है। जातक ईश्वर से डरने वाला, धार्मिक, पौरुषयुक्त, स्त्री संग प्रेमी, चरित्रवान, गुरुभक्त होता है।

 

भरणी नक्षत्र चरण फल

प्रथम चरण - इसका स्वामी सूर्य है। इसमे मंगल, शुक्र सूर्य का प्रभाव है। राशि मेष 13।20 से 16।40 अंश।  नवमांश - सिंह।  सृजन, स्वकेन्द्रित,  संकल्प, दृढ़ निश्चय इसके गुणधर्म है।

जातक सिंह के सामान आँखे, मोटी नाक, छोड़ा ललाट, घनी भोंहे, घने  पतले रोम, आगे का फैला शरीर होता है।

इसकी शिक्षा अच्छी होती है, यह ज्योतिषी, न्यायाधीश, आध्यात्म अध्यापक, नर्सरी टीचर आदि  हो सकता है। जातक  अहंकारी, कठोर प्रकृति वाला, शत्रुओ से रक्षा करने वाला, विशाल, चोरी की प्रवृत्ति वाला होता है।

 

द्वितीय चरण - इसका स्वामी बुध है। इसमे मंगल, शुक्र, बुध का प्रभाव है।  राशि मेष 16।40 से 20।00  अंश। नवमांश  कन्या।   सेवा, संगठन कार्य प्रबंध, धैर्य, निस्वार्थता, परोपकार की भावना इसके गुणधर्म है।

जातक श्याम वर्ण, मृग सामान नेत्र, पतली कमर, कठोर पैर के पंजे, मोटा-लटकता पेट, मोटी भुजा व कंधे, डरपोक, बकवादी, सुयोग्य नृत्यक, डांस टीचर होता है।

जातक विपरीत लिंग का आशिक़, चतुर, मूर्तिकला का ज्ञानी, धर्मिक होता है।  इस पाद मे प्रेम विवाह की सम्भावना  रहती है।

 

तृतीय चरण -  इसका स्वामी शुक्र है। इसमे मगल, शुक्र, शुक्र का प्रभाव है।  राशि मेष 20।00 से 23।20 अंश।  नवमांश  तुला। समय मे सहमत होना या एक ही समय मे अनेक कार्य होना, अवधि विहीन प्रेम और रति, विपरीत लिंग का अत्यधिक आकर्षण, अभिलाषा की पूर्ति इसके गुणधर्म है।

जातक कड़े रोम वाला, चंचल, धवल नेत्र, रति निरत, कुलटा स्त्री का पति, हत्यारा, विशाल शरीर वाला होता है।जातक घमंडी, योगीन्द्र, पंडित, सामान्य स्वभावी, स्वयं का उद्योग करने वाला, अत्यधिक कामुक और कामातुर,  वाचाल होता है। 

✽  इस चरण मे  मगल, + शुक्र, + शुक्र  का प्रभाव वश यौन आकर्षण, यौनाचार, यौनक्रीड़ा, यौनकर्म, रति   इत्यादि की बहुलता होती है।

 

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी मंगल है। इसमे मंगल, शुक्र, मंगल का प्रभाव है। राशि मेष 23।20 से 26।40 अंश। नवमांश  वृश्चिक। अत्यधिक ऊर्जा, रूकावट इसके गुणधर्म है।

जातक वानर मुखी, भूरे केश, गुप्तरोग रोगी, हिंसक, असत्यवादी, धातादिक योग, मित्र से सदव्यवहारी होता है। यह विस्फोटक ऊर्जावान होता है, यदि ऊर्जा का प्रवाह ठीक हो, तो जातक अन्वेषक या अविष्कारक, स्त्री रोग विशेषज्ञ,  छायाकार, पैथालॉजिस्ट, जासूस होता है।

जातक कुसत्संगी, क्रूर, अहंकारी, दुर्दम, झूठा, स्वेच्छाचारी, वाचाल, कुछ अच्छी आदते वाला होता है।

 

आचार्यो ने चरण फल सूत्रो मे बताया है परतु फलित मे बहुत अंतर है। 

मानसागराचार्य  : भरणी के पहले चरण मे चोर, दूसरे चरण मे काल भाषा हीन, तीसरे चरण मे योगीन्द्र, चौथे चरण मे निर्धन होता है। 

यवनाचार्य : भरणी के पहले चरण मे त्यागी, दूसरे चरण मे धनी व सुखी, तीसरे चरण मे क्रूर कर्म करने वाला, चौथे चरण मे दरिद्र होता है।

 

कृतिका नक्षत्र चरण फल ।

 

प्रथम चरण - इसका स्वामी गुरु है। इसमे मंगल, सूर्य, गुरु, का प्रभाव है।  राशि मेष 26।40 से 30।00 अंश। नवमांश धनु। यह परोपकार, निस्वार्थ, महानता, उदारता, इच्छाशक्ति, ताकत, सेना अनुशरण, शुभ लक्षणो का द्योतक है। 

जातक लम्बा, क्रश, चौड़ा  ललाट,  लम्बे कान, अश्व मुखी, धूमने-फिरने वाला, ज्ञानी, निर्मम, बहुरुपिया होता है। जातक बुद्धिमान, अनुशासित, रोगी किन्तु दीर्घायु, अनेक प्रकार से संतोषी, अनेक उपाधिया प्राप्त होता है।

 

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शनि। इसमे शुक्र, सूर्य, शनि का प्रभाव है।  राशि वृषभ 30।00 से 33।20 अंश।   नवमांश मकर। यह सदाचार,  नीति, भौतिकता, मातृपक्ष का द्योतक है।

जातक श्यामवर्णी, विषम नेत्र, क्रूरदृष्टि, नीच, प्रकृति विरुद्ध, वैर-विरोध करने वाला होता है।  जातक की मृत्यु मघा के अंत मे या रेवती नक्षत्र मे होती है।

जातक आध्यत्मिक व्यक्ति से नफरत करने वाला, धार्मिक साहित्य का विरोधी, दूसरो को धार्मिक ग्रंथो का विरोध करने के लिए प्रेरित करने वाला, यदाकदा यशस्वी होता है।

 

तृतीय चरण - इसका स्वामी  शनि है। इसमे शुक्र, सूर्य, शनि का प्रभाव है। राशि वृषभ 33।20 से 36।40 अंश। नवमांश कुम्भ।  यह मानवता, भविष्यवाद, प्राचीन सत्ता, कर्तव्य, ज्ञान का द्योतक है।

जातक गंभीर नेत्र वाला, टेड़े सर व मुख वाला, आत्मा से द्रवित,  अल्पबुद्धि, प्रतिकूल कर्मी,  असत्य और अधिक बोलने वाला  होता है। जातक वीर, अभिमानी, शीघ्र गर्म होने वाला, वेश्यागामी, तुच्छ जीवन  वाला होता है।

 

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी गुरु है।  इसमे शुक्र, सूर्य, गुरु, का प्रभाव है।  राशि वृषभ 36।40 से 40।00 अंश। नवमांश मीन।  यह शीलता, सूक्ष्म ग्राह्यता, परोपकारिता, रचना का द्योतक है।

जातक कोमल अंग, सुन्दर शरीर व नाक, बड़े नेत्र, यज्ञ व धर्म कार्यो में रुचिवान, स्थिर, शुभ लक्षण वाला, पालन-पौषण करने वाला, चोरी की आदत वाला, नम्र किन्तु घमंडी, चिंतित, व्याकुल, कष्टमय, रोगी, मानसिक मुसीबतो से त्रस्त रहता है।

 

आचार्यों ने चरण फल सूत्र रूप मे कहा है किन्तु फलादेश मे अंतर बहुत है। 

यवनाचार्य :  प्रथम चरण मे तेजश्वी, दूसरे मे शास्त्र विज्ञानी, तीसरे मे शूर, चौथे मे दीर्घायु  व पुत्रवान होता है। 

मानसागराचार्य : प्रथम पाद मे शुभ लक्षणो से युक्त, द्वितीय मे यशस्वी, तृतीय मे पुत्रवान, चतुर्थ मे वीर होता है।

 

कृतिका नक्षत्र चरण फल ।

प्रथम चरण - इसका स्वामी मंगल है।  इसमे शुक्र, चंद्र, मंगल का प्रभाव है। राशि वृषभ 40।00 से     43।20 तक।  नवमांश मेष।  यह शरीरिक सुख, आध्यात्म,  भोग का द्योतक है। 

जातक छोटा उदर वाला, मेढे के सामान नेत्र, पिंगल वर्ण, क्रोधी, दूसरो के धन को हड़पने वाला होता है। 

जातक वासना युक्त, लालची, कटुभाषी, देखने में सुन्दर तीखे नाक-नक़्शे वाला होता है।

 

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शुक्र है।  इसमे शुक्र, चंद्र, शुक्र का प्रभाव है। राशि वृषभ 43।20 से 46।40 तक।  नवमांश  वृषभ।  यह विषम स्थति, भौतिकवाद,  क्रांति का द्योतक है।

जातक बड़ी आँखोवाला, भैसा जैसा मुंह वाला, ऊँची नाक, घने केश,  वृहद कंधे व भुजा तथा कमर, गौरवर्णी, भद्र आदतो वाला, सुवक्ता, रोगी जैसा किन्तु जितेन्द्रिय होता है। 

 

तृतीय चरण - इसका स्वामी बुध है।  इसमे शुक्र, चंद्र, बुध का प्रभाव है। राशि वृषभ 46।40 से 50।00 तक।  नवमांश मिथुन।  यह वाणिज्य, रचना, लचीलापन, नम्यता,  कर्कशता, सम्पत्ति का द्योतक है।

जातक स्थिर, सुन्दर नेत्र,  कोमल शरीर,  मोहक वाणी, माधुर्य और हास्य रस मे रत, निपुण,  बातूनी होता है।

जातक ठोस भक्त, प्रशंसा के योग्य, दानी, अंकगणित निपुण, धार्मिक और प्रसन्न होता है।

 

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी चन्द्र है।  इसमे शुक्र, चंद्र, चन्द्र का प्रभाव है। राशि वृषभ 50।00 से 53।20 तक।  नवमांश कर्क।  यह भौतिक सुरक्षा, मातृपक्ष, स्वामित्व का द्योतक है।

जातक मृत पुत्र वाला, युवतियो मे रत, लम्बी नाक, विशाल नेत्र, बड़े अंग, बड़े पैर, स्वजनो का द्वेषी होता है।

जातक धनवान, दूसरो का मन समझने मे सशक्त,  भविष्यवक्ता, बुद्धिमान, सन्तुलित जीवन वाला होता है। 

 

आचर्यों ने चरण फल सूत्ररूप में कहा है लेकिन उसमे बहुत अंतर है। 

यवनाचार्य :  पहले चरण मे सौभाग्य, दूसरे चरण मे पीड़ा, तीसरे मे डरपोकपन, चौथे मे सत्यवादी होता है। 

मानसागराचार्य : प्रथम चरण मे शुभ लक्षणवाला, द्वितीय मे विद्वान, तृतीय मे सौभाग्यशाली, चतुर्थ मे कुलभूषण होता है।

 

मर्गशिरा नक्षत्र चरण फल ।

 

प्रथम चरण - इसका स्वामी सूर्य है।  इसमे शुक्र, मंगल, सूर्य का प्रभाव है।  राशि वृषभ 53।20 से 56।40 अंश।  नवमांश सिंह।  यह स्थायीकरण, स्वयोजना, रचना का द्योतक है।  

जातक व्याघ्र के सामान नेत्र, सुन्दर दांत, चौड़ी नाक, भूरे बाल, कड़े नख, अहंकारी, अल्पकर्मी बातूनी होता है। 

जातक शिक्षित, मेघावी, होशियार, भावुक, अन्वेषक, आवेगी, सृजनात्मक होता है।  पुरुष संतति की दुविधा होती है, कन्या संतति होती है।  दाम्पत्य जीवन साधारण होता है।

 

द्वितीय चरण - इसका स्वामी बुध है।  इसमे शुक्र, मंगल, बुध का प्रभाव है। राशि वृषभ 56।40  से 60।00 अंश। नवमांश कन्या।  यह परिकलन, गणना, भेदभाव, फर्क, व्यंग का द्योतक है।

जातक सम्मानीय, अल्प साहसी, डरपोक, दुबला-पतला, जुआरी, कुंठाग्रस्त, धन संचयी दुःख से प्रलाप करने   वाला होता है। 

इस चरणोत्पन्न जातक प्रायोगिक, सामाजिक, गणितज्ञ, मनोरंजक, गायन और संगीत में रुचिवान अच्छा सैनिक होता है।  यदि यह चरण पाप प्रभाव मे हो, तो जातक अपमिश्रण करने वाला होता है। परिवार मे छोटे-मोटे विरोधाभास होते रहते है। इसके साथ धोखा हो सकता है।

 

तृतीय चरण- इसका स्वामी शुक्र है।  इसमे बुध, मंगल, शुक्र का प्रभाव है। राशि मिथुन 60।00 से 63।20 अंश।  नवमांश तुला।  यह दिमागी दौड़, सामाजिकता का द्योतक है।

जातक लम्बे धने रोम, बड़े ऊँचे कंधे व भुजा, ऊँची नाक, मयूर समान नेत्र, दूर्वा (घास) के सामान अस्तिया, श्याम वर्ण, पतले हस्त वाला होता है। टांगे लम्बी और पतली होती है।

जातक ज्यादा सोच-विचार करने वाला, सामाजिक रोमांटिक (प्रणय प्रेमी, कल्पना जीवी) उच्च जन संपर्क अधिकारी होता है।  इनके एक से अधिक स्त्रियो से प्रेम प्रसंग होते है।

 

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी मंगल है।  इसमे बुध, मंगल, मंगल का प्रभाव है। राशि मिथुन 63।20 से   66।40 अंश।  नवमांश वृश्चिक।  यह विद्ववता पूर्ण बहस, शक या अविश्वास,  आध्यात्मिक उन्नति का द्योतक है।

जातक घट के सामान सिर वाला, नासिका के मध्य मे चोट लगना, धार्मिक, वाचाल, क्रियाशील, हिंसक, सेनापति होता है।

जातक अच्छा अन्वेषक, अत्यधिक सन्देह करने वाला, आवेगी होता है।  इन्हे अच्छे परामर्शदाता की महत्वपूर्ण निर्णय लेने मे आवश्यकता होती है।  यदि ये अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करे तो ज्योतिषी, निवेशक, रचनात्मक लेखक, पादरी या पुरोहित हो सकते है।

 

आचर्यो ने चरण फल सूत्र रूप में कहा है लेकिन उसमे अन्तर बहुत है। 

यवनाचार्य : मृगशीर्ष प्रथम चरण मे राजा, द्वितीय मे तस्कर, तृतीय मे भोगी, चतुर्थ मे धन-धान्य युक्त होता है।

मानसागराचार्य : पहले मे धनधान्यापार्जक, दूसरे मे पर स्त्री गामी, तीसरे मे भाग्यवान, चौथे मे निर्धन होता है।

 

⃝ इसके प्रथम और द्वितीय चरण वृषभ मे आते है अतएव जातक की संतान सुन्दर, मेघावी, सृजनात्मक, प्रचुर भौतिकता लाने वाली होती है।

⃝ इसके तृतीय और चतुर्थ चरण मिथुन मे आते है अतएव लेखन, जनवक्ता, प्रभावपूर्ण भाषण, जिज्ञासावृत्ति, अक्ल खोज प्रकट करते है।

⃝ स्त्री जातक गलत विचारो को व्यक्त करने में भी नही हिचकिचाति है इस कारण मित्र भी शत्रु बन जाते है।

 

आर्द्रा चरण फल 

प्रथम चरण - इसका स्वामी गुरु है।  इसमे बुध, राहु, गुरु का प्रभाव है। राशि मिथुन 66।40 से 70।00  अंश।  नवमांश धनु।  यह खोज-बीन, भौतिकवाद, प्रसन्नता का द्योतक है। 

जातक रक्त वर्ण, समशरीर, सुन्दर नाक, लम्बा चेहरा, घनी तीखी भौहे वाला होता है।  वाणी प्रभावी व चातुर्यपूर्ण होती है। जातक के मन मे हमेशा संक्षोभ होता है जिससे दुविधा के कारण कुछ निश्चित नही कर पता है अतः इस तूफान के निवारण के लिए ध्यान करना चाहिए। 

 

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शनि है।  इसमे बुध, राहु, शनि का प्रभाव है। राशि मिथुन 70।00 से 73।20 अंश।  नवमांश मकर।  यह भौतिकवाद, निराशा, कष्ट का द्योतक है।

जातक की भौंहे सुन्दर, बदन इकहरा, हल्का कृष्ण वर्ण, छोटा चहेरा, दीर्घ वक्ष, यौन वासना युक्त होता है। यह चरण अत्यधिक भ्रष्टाचार का द्योतक है।  आर्द्रा नक्षत्र की ऋणात्मक विशेषता इस चरण मे सबसे ज्यादा होती है  परन्तु जातक व्यवहारिक और भौतिक होता है। बुध और शनि शुभ स्थान में हो, तो भौतिकता कड़ी मेहनत के 32 वर्ष की उम्र पश्चात प्राप्त होती है।

 

तृतीय चरण - इसका स्वामी शनि है।  इसमे बुध, राहु, शनि का प्रभाव है। राशि मिथुन 73।20 से 76।40 अंश।  नवमांश कुम्भ। यह विज्ञान, शोध, प्रोत्साहन, मानसिक गतिविधि का द्योतक है जातक बड़ा मुंह, बड़ा वक्ष, मोटी कमर, लम्बी भुजा वाला, स्थूल सर वाला, कपटी, दुष्ट, उभरी शिराएं वाला, आँखो से मन की बात जानना कठिन होता है। जातक सामाजिक कार्यकर्त्ता, व्यक्तियो का शरीरिक रूप से मददगार, कर्मठ, तेज दिमाग वाला होता है।

 

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी गुरु है।  इसमे बुध, राहु, गुरु  का प्रभाव है।  राशि मिथुन 76।40 से 80।00 अंश।  नवमांश मीन।  यह संवेदना, अनुकम्पा, शांति का द्योतक है। 

जातक मादक नयन, वाचाल, चौड़ा ललाट, बलिष्ठ शरीर, गुलाबी होंठ, पीले दांत, जुआरी, दुष्ट व निरर्थक प्रलापी होता है।  जातक भावुक, हास्यास्पद, दानी, बिना हिचकिचाहट के दूसरो धन से

 

 मददगार, स्थिर दिमाग, लाभदायक गतिविधियो मे सलग्न रहता है।

आचार्यो ने चरण फल सूत्र रूप मे कहा है परन्तु फलित मे अंतर बहुत है। 

यवनाचार्य : आर्द्रा के प्रथम चरण मे खर्चीला, द्वितीय मे दरिद्री, तृतीय मे अल्पायु, चतुर्थ मे तस्कर होता है। 

मानसागराचार्य : आर्द्रा के पहले पाद मे कटुभाषी, दूसरे मे धनवान, तीसरे मे भाग्यवान चौथे मे धन-धन्य भोगी होता है।


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यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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