यज्ञोपवीत संस्कार

Share

Astrologer Praveen Upadhyay 30th Jul 2020

*🙏ॐ श्री गणेशाय नमः🙏*

सनातन धर्म के अनुसार जन्म से मृत्यु पर्यन्त षोडश संस्कारो का उल्लेख मिलता है जिसमे यज्ञोपवीत (उपनयन संस्कार) की विशेष महत्ता है।

यज्ञोपवीत की सम्पूर्ण विधि ओर महत्व के बारे मे विस्तृत जानकारी .....

*यज्ञोपवीत (जनेऊ) के संबंध में ज्ञातव्य बातें* ✍️

यज्ञोपवीत उदात्त भावना संबंधी अंश से व्याप्त एक ऐसा सूत्र है जो हमारे जीवन को श्रुति स्मृत्यनुमोदित मार्ग पर चलाते हुए सम्पूर्ण उत्तरदायित्वों एवं कर्तव्यों का निर्वहन करते रहने के लिए हमें ईश्वर द्वारा सौंपा गया है। इसलिए शास्त्रकारों ने प्रत्येक यज्ञोपवीतधारी को यथासंभव सुतकातकर अपने हाथ के परिमाण से इसका निर्माण करने का विधान निर्धारित किया है। *महर्षि कात्यायन द्वारा प्रतिपादित निर्माण विधि* संध्यावंदन आदि नित्य कर्म करके एसे सुत से यज्ञोपवीत निर्माण करना चाहिए जो ब्राह्मण द्वारा,ब्राह्मण कन्या द्वारा अथवा सधवा ब्राह्मणी द्वारा कातकर तैयार किया गया हो। इस सूत को *भू:* का उच्चारण कर 96 अंगुल सहित चारो अंगुलियो के मूल पर लपेटे और उतारकर  एक पलाश (खाकरे) के पत्ते पर रख देवे। अब *भुवः* शब्द का उच्चारण करते हुए उसी क्रिया को दोहराए और *स्व:* शब्द का उच्चारण करते हुए तीसरी बार क्रिया दोहराते हुए हाथ में लपेटकर "96 अंगुली" के परिमाण में अन्य दो तार तैयार कर पलाश पर रखे। अनंतर *"आपो हिष्टा....",शं नो देवी:..." तत्सवितु:..."*  आदि तीन मंत्रो द्वारा उन तीन तारों को जल में अच्छी तरह भिगोकर बाएं हाथ मे लेकर तीन बार जोर से आघात करें,फिर तीन व्याहृतियों से उसे एक बट देकर एक रूप बना ले! अब इन्हीं मंत्रो से उसे त्रिगुणित करे और पुनः बटकर एक रूप बना ले पुनः उसे त्रिगुणित करके "प्रणव" से उसमें ब्रह्मग्रंथि लगाएं। इसके 9 तंतुओं में (1) ओंकार (2) अग्नि (3) अनंत (4) चंद्र  (5)पितृगण (6) प्रजापति (7) वायु (8) यम (9) विश्वदेव , इन 9 देवताओं     का क्रमशः आवाहन एवं स्थापन करे साथ ही ग्रंथि देवता "ब्रह्मा","विष्णु", "महेश" का आवाहन प्रतिष्ठा करे एवं *"उद्वयं तमसस्परि.."* मंत्र द्वारा सूत्र को सूर्य के सम्मुख करके निम्न मंत्र द्वारा धारण करे-

*मंत्र* *
ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजम पुरस्तात।* *आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

* *यज्ञोपवीत कटि तक ही क्यों ?*

महर्षियों और शास्त्रकारों ने इस आधार पर यज्ञोपवीत का परिमाण निर्धारित किया है कि धारण करने पर वह पुरुष के बाएं कंधे के ऊपर से आता हुआ नाभि को स्पर्श कर कटि तक ही पहुँचे,इससे न तो ऊपर रहे और न ही नीचे। *"अत्यधिक छोटा यज्ञोपवीत आयु का  तथा अधिक बड़ा यज्ञोपवीत तप का विनाशक होता है,अधिक मोटा यज्ञोपवीत यशनाशक और पतला यज्ञोपवीत धन की हानि करता है।
"* "पृष्ठदेशे च नाभ्याञ्च घृतं यद्विन्दते कटिम। तद्धार्यूमुपवितं स्यान्नतिलंबम न चोच्छिरतं आयुहरत्यतिक्रस्वमतिदीर्घम तपोहरम। यशोहरत्यति स्थूलमतीसूक्ष्मम धनापहम।।"

*यज्ञोपवीत का परिमाण 96 अंगुल ही क्यों ?

*1* गायत्री मंत्र के 24 अक्षर एवं 4 वेद को गुणा करने पर प्राप्त - 96 *2* वैदिक मंत्रों की संख्या के अनुपात में-  कर्मकांड से संबंधित ऋचाएं - 80000 उपासना कांड से संबंधित ऋचायें-16000 कुल योग - 96000 *3* तिथि,वार,गुण आदि के आधार पर-  3 गुण,15 तिथि,7 वार,27 नक्षत्र,25 तत्व,4 वेद,3 काल एवं 12 मास का योग करने पर 96 प्राप्त होता है।

*यज्ञोपवीत में 3 सूत्र और वह त्रिवृत्त क्यों ?*

अध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक सभी क्षेत्रों में विशेष महत्व रखती है। ब्रह्मा,विष्णु,महेश -  त्रिदेव भूत,वर्तमान,भविष्य - 3 काल सत्व,रज एवं तम - 3 गुण ग्रीष्म,वर्षा एवं शीत - 3 ऋतु पृथ्वी,अंतरिक्ष,भूलोक - 3 लोक इसी त्रिगुणात्मक भाव को आधार बना कर यज्ञोपवीत का त्रिगुणात्मक तंतुओं से निर्माण और उसका त्रिवृत्तकरण किया गया है। "3 सूत्रों में मानवतत्व,देवतत्व एवं गुरुतत्व निहित है।" *9 तंतुओं के 9 देवता* उपयुक्त 9 देवताओं एवं ब्रह्मा,विष्णु,महेश के प्रतिस्थापन से मानव अपने हृदय मे देवताओ के गुणों- ब्रह्मलाभ, तेजस्विता,धैर्य,स्नेह,प्रजापालन, शुचित्व,प्राणत्व आदि गुणों को धारण करते हुए अनुभव करता है कि मैने इन गुणों से परिपूर्ण और देवताओं से अधिष्ठित उपवीत को धारण कर लिया है। अब में तेजस्वी,धृतिमान एवं शुद्ध हूं। इससे मानसिक कुवृत्तियों का परिमार्जन होगा तथा मन सहित इंद्रिया विपथगामी ना होकर सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रवृत्त होगी।

*ब्रह्मग्रंथि की आवश्यकता क्यों ?*

ब्रह्मग्रंथि लगाने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य प्रतिक्षण ध्यान रखे कि यह समस्त विश्व ब्रह्मा से प्रादुर्भूत हुआ है और इसीमें मानव कल्याण संनिहित है। यज्ञोपवीत के मूल में प्रणव मंत्र के साथ लगाई जाने वाली ग्रंथि उसे प्रणव के "अ+ऊ+म" इन तीनों वर्णो,सत्व,रज एवं तम इन तीनो ।गुणों तथा ब्रह्मा,विष्णु, महेश रूपी ब्रह्मांड नियामक त्रिविध शक्तियों के सामीप्य का ध्यान दिलाती रहती है। इसलिए इसे ब्रह्मग्रंथि कहा गया है। समाज मे मनुष्य को ब्रह्म के साथ अपनी कुल परंपरा को भी ध्यान में रखना होता है,अतः ब्रह्मग्रंथि के ऊपर अपने अपने कुल,गोत्र एवं प्रवर आदि के भेद से 1,3 या 5 गांठ लगाए जाने का शास्त्रीय विधान है। ये ग्रंथियां मनुष्य को अपनी कुल परम्परा से चली आ रही शास्त्र मर्यादा की रक्षा करते हुए उन पुण्यात्माओं (पितरों) का स्मरण करवाती है जिनका वह उत्तराधिकारी है। और उनकी तपस्या ओर सत्कर्मो से उसे उस कूल में जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

*"द्विज सदैव ध्यान रखे कि  उसमे भी "ब्रह्म" का अंश है और अंत मे उसी में लय होना है।"*      

 🙏🙏नर्मदे हर🙏🙏
✍️
एस्ट्रोलॉजर प्रवीण उपाध्याय
प्रोफेशनल वैदिक एस्ट्रोलॉजर


Like (0)

Comments

Post

Latest Posts

*वसंत नवरात्र 13 अप्रैल से 21 अप्रैल 2021 तक* चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल दिन मंगलवार प्रातः 5:30 से 10:15 तक। अभिजीत मुहूर्त 11:56 से दोपहर 12: 47 तक होगा। 13 अप्रैल से नव संवत्सर भारतीय नववर्ष की शुरुआत भी होगी। क्रमश: नवरात्र 13 अप्रैल प्रतिपदा ,शैलपुत्री। 14 अप्रैल द्वितीया, ब्रह्मचारिणी। 15 अप्रैल तृतीया, चंद्रघंटा। 16 अप्रैल चतुर्थी ,कुष्मांडा। 17 अप्रैल पंचमी, स्कंदमाता। 18 अप्रैल षष्ठी, कात्यायनी। 19 अप्रैल सप्तमी, कालरात्रि। 20 अप्रैल अष्टमी, महागौरी। 21 अप्रैल नवमी, सिद्धिदात्री मां का पूजन होता है। ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री के अनुसार दुर्गा सप्तशती नारायण अवतार श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में मार्कंडेय पुराण से ली गई है। इसमें 700 श्लोक व 13 अध्यायों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक क्रियाओं का इसके पाठ में बहुत उपयोग होता है। दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य ने बताया है कि शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य है। दुर्गासप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मवशिष्ठ विश्वामित्र ने शापित किया है। शापोद्धार के बिना पाठ का फल नहीं मिलता दुर्गा सप्तशती के 6 अंगों सहित पाठ करना चाहिए कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती का रहस्य बताया गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती की चरित्र का क्रमानुसार पाठ करने से शत्रु नाश और लक्ष्मी की प्राप्ति व सर्वदा विजय होती है।

यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

Top