विभिन्न घटनाओं को सूक्ष्मताओं से सटीक जानने के लिए नियम

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Ravinder Pareek 16th Aug 2020

सूक्ष्मता से विभिन्न घटनाओं के बारे मे नियमों को समझने की – आगे जीवन की मुख्य घटनाओं और उनसे सम्बन्धित केपी के नियमों का उल्लेख कर रहा हू –
1. आयु-विचार यदि लग्न का न.उप बाधक और मारक भावों का कार्येष हो तो बाधक और मारक भावों के कार्येषों की दशांतर्दशा में जीवन को खतरा हो सकता है और यदि ये कार्येष लग्न या अष्टम भाव के सामूहिक शासक हों तो इनकी दशांतर्दशा बहुत हानिकारक / नाजुक होती है । यदि लग्न का न.उप (सबलॉर्ड) निम्न भावों का स्वामी हो तो – 6,8, या 12 – 33 वर्ष की छोटी आयु 1,5,9, या 10 – 66 वर्ष से अधिक – दीर्घायु 6,8 या 12 और 1,5,9, या 10 – मध्यायु ( 66 वर्ष पर्यत) मारक और मारकेश की अपेक्षा बाधक और बाधकेश जीवन के लिये अधिक हानि कारक होते हैं। मारक भाव – 2,7,12 हैं क्योंकि ये आयु-भावों क्रमश: 3,8,1 से द्वादश स्थान हैं। बाधक भाव – चर राशि के लग्न के लिये बाधक भाव ग्यारहवां , स्थिर राशि की लग्न के लिये बाधक भाव नौवां और द्विस्वभाव राशि के लग्न के लिये सातवां भाव बाधक होता है । जैसे कर्क लग्न का जन्म है तो चूंकि कर्क चर राशि है अतः ग्यारहवां भाव बाधक होगा । बाधक स्थान का अधिपति ग्रह बाधकेश कहलाता है । बाधक स्थान में स्थि ग्रह और उन ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह हानिकारक होते हैं । बाधक स्थान मारक स्थान से अधिक हानिकारक होता है इसलिये बाधक का विचार प्राथमिकता से करना चाहिये और फिर मारक भावो का । एक बात और कि केपी में सही भावों का चुनाव अत्यावश्यक है
यहां यह बताना चाहता हूँ कि हम किसी जातक की कुंडली द्वारा भी उसके रिश्तेदारों की आयु का आंकलन कर सकते हैं । उदाहरण के तौर पर – यदि पुत्र की कुंडली में पिता की आयु/मृत्यु का विचार करना हो तो उस कुंडली के नौवें भाव को पिता का लग्न मानकर विचार करना चाहिये । अर्थात पुत्र की कुंडली में नौवे स्थान से सम्बन्धित मारक और बाधक की गणना करनी चाहिये पिता की आयु ज्ञात करने के लिये ।
2. विवाह एवं तलाक विवाह पर सीमित शब्दों में कहूंगा । विवाह के लिये मुख्य भाव 7 है और सहायक भाव 2 और 11 हैं ।
प्रेम सम्बंध का मुख्य भाव 5 है । यदि भाव-5 का उपाधिपति 2 या 11 भाव का सबल कार्येष हो या इन भावों से किसी भी प्रकार से जुड़ा हो तो प्रेम सम्बंध दर्शाता है । यदि यह न.उप. राहु या केतु से जुड़ा हो तो प्रेमी दूसरी जाति / धर्म / समाज का होता है। इसी प्रकार यदि भाव-7 का न.उप. भाव-5 या 11 का सबल कार्येष हो; या फिर वह किसी प्रकार से 5 या 11 से जुड़ा हो तो व्यक्ति का विवाह अपने प्रेमी से होता है, अर्थात प्रेम विवाह होता है । यदि यह न.उप किसी प्रकार से राहु या केतु से जुड़ा हो तो प्रेम-विवाह अंतर्जातीय होता है। जब भाव-7 का न.उप 2, 7 या 11 भाव का कार्येष होता है तो 2,7,11 के कार्येषों की दशांतर्दशा में विवाह होता है ।
यदि भाव-7 का उपाधिपति 1,6 या 10 का कार्येष है या इन भावों से जुड़ा हुआ है तो यह अच्छे वैवाहिक जीवन का संकेत नहीं है बल्कि एक तरह से यह वैवाहिक जीवन की अनुपस्थिति दर्शाता है । इसी प्रकार से भाव-2 और 11 के उपाधिपति के कार्येषत्व पर भी विचार करना आवश्यक है।
3. विदेश गमन भाव-4 जातक के घर का होता है और उससे बारहवां यानि भाव-3 घर से दूरी दर्शाता है । इसी प्रकार भाव-9 विदेश यात्रा या लम्बी यात्राओं का और भाव-12 किसी अज्ञात स्थान पर पूरी तरह से अपरिचित वातावरण में जीवन को दर्शाता है । इस प्रकार 3,9,12 भाव विदेश यात्रा के लिये देखे जाते हैं । भाव-12 मुख्य है । यदि भाव-12 का उपाधिपति 3,9 या 12 का सबल कार्येष हो या इन भावों से सम्बन्ध रखता हो तो विदेश यात्रा की पुष्टि होती है और यह यात्रा 3,9 और 12 भाव के कार्येषों की दशांतर्दशा में होती है ।
4. शिक्षा भाव-4 से सामान्य शिक्षा, परीक्षा की तैयारी, शैक्षिक योग्यता , विद्यालय या महाविद्यालय में नियमित हाजिरी आदि का विचार करते हैं ।
भाव-9 गहन अध्ययन , उच्च शिक्षा और अनुसंधान का भाव है ।
भाव-11 सफलता, इच्छापूर्ति का भाव है । गुरु और बुध शिक्षा के मुख्य का कारक ग्रह हैं। यदि भाव-4 का उपाधिपति बुध या गुरु हो; या वह 4,9 या 11 का सबल कार्येष हो या इन भावों से जुड़ा हो या फिर वह गुरू या बुध से जुड़ा हो ( विशेष तौर पर यदि इस उपाधिपति का नक्षत्राधिपति गुरु या बुध से सम्बंधित हो ) तो जातक 4,9 और 11 के कार्येषों की दशांतर्दशा में शैक्षिक योग्यता प्राप्त करता है। छठा भाव प्रतियोगी परीक्षा का है और सातवां भाव जातक के प्रतियोगी का । सातवें का व्यय ही छठा भाव है, अर्थात प्रतियोगी को हानि और जातक को लाभ ।
जातक की पढाई 3,5,और 8 भावों ( क्रमशः 4,6,9 से बारहवे ) के कार्येषों की दशांतर्दशा में पूरी होती है या आगे के लिये स्थगित हो जाती है। मतलब जब सही दशा आयेगी तो वह फिर आगे की पढाई शुरु करेगा।
5. नौकरी यदि भाव-10 ( व्यवसाय/ पेशा ) या
भाव-6 ( नौकरी ) का उपाधिपति
भाव-10 (नौकरी या व्यवसाय ),
भाव-2 ( संग्रहित/ संचित धन, स्वयं अर्जित धन ) या भाव-6 ( सेवारत, नौकरी पर दिन-प्रतिदिन की हाजिरी, दूसरों से धन की प्राप्ति ) का सबल कार्येष हो या 2,6 या 10 से जुड़ा हो तो जातक 2,6, और 10 के कार्येषों की दशांतर्दशा में नौकरी या व्यवसाय करेगा ।
यदि भाव-2 या भाव-11 का न.उप. भाव-2,6, या 11 का सबल कार्येष हो; या इन भावों से सम्बंध बनाये तो जातक 2, 6 और 11 भाव के कार्येषों की दशांतर्दशा में धन अर्जित करेगा। 6. व्यापारी / उद्योगपति यदि भाव-7 ( व्यापार, उद्योग ) का न.उप. 2,10 या 11 का सबल कार्येष हो या इन भावों से सम्बंध बनाता हो तो 2,10,11 भावों के सम्मिलित कार्येषों की दशंतर्दशा में जातक व्यापार या उद्योगधंधे में सफलता हासिल करेगा और धन कमायेगा । यदि भाव-10 का न.उप 2,7 या 11 का सबल कार्येष हो या इन भावों से जुड़ा हो तो जातक को 2,7,11 के कार्येषों की दशांतर्दशा में स्वतंत्र व्यापार / उद्योग में सफलता मिलती है । यदि 2 या 11 का उपाधिपति 2,6, या 11 का कार्येष हो या इनसे सम्बंधित हो तो 2,6,11 के कार्येषों की दशांतर्दशा में जातक धन-सम्पत्ति अर्जित करता है । परंतु यदि 2 या 11 का उपाधिपति केवल 8,12 या 5 का कार्येष हो तो जातक को भाव 8 और 12 के कार्येषों की दशांतर्दशा में धन-हानि उठानी पड़ती है । क्योंकि 8,12, और 5 सातवें भाव के क्रमश: 2,6,11 भाव होते हैं और सातवां भाव यानि जातक को हानि और दूसरे को लाभ । यदि भाव-7 ( व्यापार, साझेदारी, उद्योग ) का उपाधिपति 8 या 12 का सबल कार्येष हो तो जातक को 8 और 12 भाव के कार्येषों की दशांतर्दशा में व्यापार व्यवसाय आदि में धन की हानि झेलना पड़ती है। अब जातक कौन सा व्यवसाय , उद्योग-धंधा या नौकरी करेगा यह तो बारीक अध्ययन से पता लगाना होगा और उसके लिये आपको ग्रहों की दृष्टि , राशियों और ग्रहों के स्वभाव, आदि कई बातों पर एक साथ विचार करना होगा । इसी प्रकार बीमारी कौन सी होगी, शरीर के किस अंग को प्रभावित करेगी आदि बातों के लिये भी हर राशि और ग्रह के स्वभाव प्रकृति आदि की जानकारी होना आवश्यक है । आगे इस सम्बंध में कुछ बातें बताई जा रही हैं – पुरुष राशियां – सभी विषम (1,3,5,7,9,11) राशियां स्त्री राशियां – सभी सम (2,4,6,8,10,12) राशियां चर राशियां – 1,4,7,10 स्थिर राशियां – 2,5,8,11 द्विस्वभाव राशियां – 3,6,9,12 पूर्व दिशा की राशियां – 1,5,9 दक्षिण दिशा की राशियां – 2,6, 10 पश्चिम दिशा की राशियां – 3,7,11 उत्तर दिशा की राशियां – 4,8,12 अग्नि तत्व की राशियां – 1,5,9 पृथ्वी तत्व की राशियां – 2,6,10 वायु तत्व की राशियां – 3,7,11 जल तत्व की राशियां – 4,8,12 पूर्ण फलदायक राशियां – 4,8,12 अर्ध–फलदायक राशियां – 2,7,9,10 बांझ राशियां – 1,3,5,6,11 छोटे कद की राशियां – 1,2,11,12 मध्यम कद राशियां – 3,4,9,10 लम्बे कद की राशियां – 5,6,7,8 दुर्घटना की सुचालक राशियां – 1,3,7,9,10 टिप्पणी – उपर दिये अंकों में अंक 1 को मेष, 2 को वृषभ … 12 को मीन राशि समझें । राशियों से सम्बंधित शरीर के कुछ मुख्य अंग – मेष – सिर, माथा, दिमाग, चेहरे की हड्डियां वृष – गर्दन, गला, गले की हड्डी मिथुन – तंत्रिका तंत्र , हाथ, भुजायें ,कंधे, और इनकी हड्डियां, श्वसन कर्क – छाती, सीना, दिल, पेट, पाचन तंत्र सिंह – रीढ़, कमर, लीवर ( यकृत ) , पेंक्रियास ( अग्नाशय ) कन्या – पेट का निचला हिस्सा, आंते, तंत्रिका तंत्र आदि तुला – कमर का क्षेत्र, त्वचा, किडनी ( गुरदा ) , कमर की हड्डी आदि वृश्चिक – श्रोणीय हड्डी, गुदा, पेशाब-सम्बंधी, जनन सम्बंधी तत्व आदि धनु – कूला ( नितम्ब) , जांघ, नसें मकर – घुटना, हड्डी, जोड़, घुटने की टोपी ( नीकेप) कुम्भ – पैर, टखना, धमनियां, रक्तसंचार आदि मीन – तलुआ/पैर , अंगूठा और इनकी हड्डी ग्रहों का कारकत्व – 1.सूर्य सम्बन्धित – प्रशासन – सूर्य, और चन्द्र से देखा जाता है । रक्त – इसका प्रतिनिधित्व सूर्य, चन्द्र और मंगल सम्मिलित रूप से करते हैं। दृष्टि – सूर्य चन्द्र और भाव 2 और 12 से देखते हैं। पिता – सूर्य और नौवें भाव से । पुत्र संतान – सूर्य, गुरु और दशम । अनुसन्धान – सूर्य और बुध । 2.चन्द्र सम्बन्धित – सीना – चंद्र और चतुर्थ भाव से भावनात्मक शांति – चंद्र और भाव-5 मानसिक शांति – चंद्र और भाव – 4 सार्वजनिक सम्बंध – चंद्र माता – चंद्र और चतुर्थ भाव 3.मंगल सम्बन्धित दुर्घटना, रक्त मज्जा, जनन सम्बन्धी, पेशीय तंत्र, साहस – मंगल द्वारा देखे जाते हैं। छोटे भाई – बहन – मंगल और तृतीय भाव से । गर्दन – मंगल, शुक्र और दूसरे भाव से जनन सम्बन्धी – मंगल, शुक्र और अष्टम भाव से 4.बुध सम्बंधित – एकाग्रता , योग्यता, विष्लेषण क्षमता, त्वचा – बुध ( शुक्र त्वचा का गौड़ कारक है ) से । भुजायें – बुध, भाव 3 और 11 से । आत्म-विश्वास/साहस – बुध पाचन – बुध, गुरु, सूर्य और भाव-6 से भाषण – बुध, केतु और भाव-2 से । श्वसन कार्यप्रणाली और लेखन – बुध और भाव-3 । 5. गुरु सम्बन्धित – गिलटी (ग्लैंड्स), पति, धन, यकृत, बुद्धिमत्ता, दयालुता, – गुरु ग्रह से देखते हैं अर्थात गुरु इनका मुख्य कारक ग्रह है। धमनी / रक्त वाहिका – गुरु और नवम भाव से । श्रवण-शक्ति – गुरु, 3 और 11 भाव से । 6. शुक्र सम्बन्धित – नसयुक्त तंत्र, शिरायें , सुख, भोग, आनन्द, भोग-विलास – शुक्र से । किडनी (गुर्दे) – शुक्र और भाव-6 से । पत्नी – का मुख्य कारक ग्रह शुक्र है । 7. शनि से सम्बन्धित – जोड़, घुटने – शनि और दशम भाव से । दीर्घायु – शनि और भाव 8 एवं 12 से । मजदूर / कामगार – शनि । 8.राहु सम्बन्धित – आंत सम्बन्धी बीमारी – राहु एवं केतु से देखें । जहर, दवाएं – राहु से । फेरबदल – राहु से । 9. केतु सम्बन्धित – विद्रोहजनक हालात / जलने सम्बन्धी – केतु । आध्यात्मिकता – केतु, 5, और 9 भाव से । शल्य चिकित्सा – केतु और मंगल से । दुख/आपदा/विपत्ति – केतु । (Author: रविन्द्र पारीक)


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Suman Sharma

very nice article


बहुत अच्छा लेख


बहुत गूढ़ ज्ञान औऱ विलक्षण प्रखर विद्वता


Wonderful discovery of theology


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*वसंत नवरात्र 13 अप्रैल से 21 अप्रैल 2021 तक* चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल दिन मंगलवार प्रातः 5:30 से 10:15 तक। अभिजीत मुहूर्त 11:56 से दोपहर 12: 47 तक होगा। 13 अप्रैल से नव संवत्सर भारतीय नववर्ष की शुरुआत भी होगी। क्रमश: नवरात्र 13 अप्रैल प्रतिपदा ,शैलपुत्री। 14 अप्रैल द्वितीया, ब्रह्मचारिणी। 15 अप्रैल तृतीया, चंद्रघंटा। 16 अप्रैल चतुर्थी ,कुष्मांडा। 17 अप्रैल पंचमी, स्कंदमाता। 18 अप्रैल षष्ठी, कात्यायनी। 19 अप्रैल सप्तमी, कालरात्रि। 20 अप्रैल अष्टमी, महागौरी। 21 अप्रैल नवमी, सिद्धिदात्री मां का पूजन होता है। ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री के अनुसार दुर्गा सप्तशती नारायण अवतार श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में मार्कंडेय पुराण से ली गई है। इसमें 700 श्लोक व 13 अध्यायों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक क्रियाओं का इसके पाठ में बहुत उपयोग होता है। दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य ने बताया है कि शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य है। दुर्गासप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मवशिष्ठ विश्वामित्र ने शापित किया है। शापोद्धार के बिना पाठ का फल नहीं मिलता दुर्गा सप्तशती के 6 अंगों सहित पाठ करना चाहिए कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती का रहस्य बताया गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती की चरित्र का क्रमानुसार पाठ करने से शत्रु नाश और लक्ष्मी की प्राप्ति व सर्वदा विजय होती है।

यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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