विंशोत्तरी दशा मे प्रत्यन्तर्दशा फल

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Astro Rakesh Periwal 25th Jan 2019

विंशोत्तरी दशा मे प्रत्यन्तर्दशा फल   सामान्यतया विंशोत्तरी दशा मे अन्तर्दशा तक का ही विचार करते है। आजकल समय की नोद सटीक होने से प्रत्यन्तर्दशा का विचार करने लगे है। समय मे स्वल्प अंतर भी दशा फल पाक मे बहुत अंतर ला देता है। दशा साधन - प्रत्येक ग्रह के दशा वर्षो से गृह की अंतर दशा वर्षादि का गुना करे। गुणनफल मे 120 का भाग दे, लब्धि ग्रह की प्रत्यंतर दशा होगी   ● निम्न प्रभाव सामान्य है। यदि ग्रह त्रिकोण आदि मे है या शुभ भाव का स्वामी है या शुभ भाव मे है या लाभकारी वर्ग मे है तो सामान्य प्रभावो मे से अशुभ प्रभाव नही होगे। इस प्रकार विचार करे।                                                                                                    - बृहत्पाराशर होराशास्त्र  ● प्रत्येक ग्रह की दशा मे नौ ग्रह की अंतरदशा होती है इसमे उसी ग्रह की प्रथम अन्तर्दशा होती है। इसी प्रकार अन्तर्दशा मे नौ ग्रह की प्रत्यंतर दशा होती है और उसमे भी उसी गृह की प्रथम प्रत्यंतर दशा होगी। जो दशा मे ग्रह का प्रभाव है वे ही अन्तर्दशा और प्रत्यंतर दशा मे उस ग्रह के होगे। किन्तु अन्य ग्रहो की अंतर और प्रत्यंतर दशा मे प्रभाव भिन्न-भिन्न होगे।                                                 - फलदीपिका (मंत्रेश्वर)   सूर्य की अन्तर्दशा मे समस्त ग्रहो के प्रत्यंतर दशा का फल  सूर्य      - अन्य व्यक्तियो के साथ तर्क, धनहानि, पत्नी को परेशान करना, सिरदर्द इत्यादि।  चंद्र      - उत्साह, झगडे, धन की हानि, मानसिक पीड़ा इत्यादि।  मंगल  - राजा और हथियार से खतरा, कारावास, दुश्मन और आग से कष्ट। राहु     - कफ विकार, हथियार से खतरा, सम्पत्ति की हानि, साम्राज्य का विनाश, मानसिक पीड़ा। गुरु      - विजय, धन की वृद्धि, स्वर्ण से लाभ, वस्त्र, वाहन, इत्यादि।  शनि    - धन का नुकसान, उत्तेजना, मवेशियो को कष्ट, बीमारिया।  बुध     - रिश्तेदारो से स्नेह पूर्ण सम्बन्ध, धन लाभ, अच्छा भोजन, धार्मिकपन, राजा से सम्मान।  केतु    - जीवन के लिए खतरे, धनहानि दुश्मनो से परेशानी, राजा से खतरा। शुक्र    - मध्यम धन के लाभ की कुछ उम्मीद।   चंद्र की अन्तर्दशा मे समस्त ग्रहो की प्रत्यंतर दशा का फल  चंद्र    - भूमि, धन, संपत्ति का अधिग्रहण, राज सम्मान, मिठाई की उपलब्धता।  मंगल - बुद्धि और विवेक, लोगो से सम्मान, धन की वृद्धि, रिश्तेदारो से आनंद, दुशमन से खतरा।  राहु    - कल्याण, राजा से धन, पापग्रह से युत हो तो मौत का खतरा।  गुरु    - आनंद, गरिमा और महिमा मे वृद्धि, शिक्षक से ज्ञान लाभ, राज्य व रत्न का अधिग्रहण।  शनि  - नाम और प्रसिद्धि तथा धन का नुकसान, पित्त विकार।  बुध    - पुत्र जन्म, वाहन का लाभ, सफ़ेद वस्त्र और अनाज का लाभ, शिक्षा मे सफलता।  केतु   - ब्राम्हणो से झगड़ा, मौत का डर, पुरे दौर में परेशानी, ख़ुशी का नुकसान।  शुक्र   - धन, आनंद, बेटी का जन्म, सभी की साथ सौहाद्रपूर्ण सम्बन्ध का लाभ।  सूर्य   - ख़ुशी, हर जगह विजय, अनाज और वस्त्र का लाभ।   मंगल की अन्तर्दशा मे समस्त ग्रहो की प्रत्यंतर दशा का फल मंगल   - शत्रुओ से खतरा, रक्त रोग के कारण समय पूर्व मौत का खतरा, झगडे। राहु      - धन और साम्राज्य का विनाश, दुश्मनो से झगडे, अस्वदिष्ट भोजन। गुरु      - बुद्धिमत्ता, संकट, बच्चो को दुःख, लापरवाही, अपूर्ण अभिलाषाए, झगडे। शनि    - नियोक्ता का विनाश, धन हानि, शत्रुता मे वृद्धि, चिंता, झगडे और दुःख। बुध     - बुद्धिमत्ता का नुकसान, बुखार, अनाज वस्त्र और दोश्तो का नुकसान। केतु    - बीमारियो से परेशानी,  राजा और हथियार से खतरा, आलस्य, अकाल मृत्यु का भय। शुक्र    - चाण्डालो से परेशानी, उल्टी -दस्त, अकाल मौत, दुःख। सूर्य    - भूमि और सम्पत्ति मे वृद्धि, दोस्तो से मिलान, संतुष्टि, पुरे दौर मे ख़ुशी। चंद्र     - दक्षिण दिशा से सफ़ेद वस्त्र आदि का लाभ, सभी उद्यमो मे सफलता।   राहु की अन्तर्दशा मे समस्त ग्रहो की प्रत्यंतर दशा का फल राहु      - कारावास, हथियार से प्रहार का खतरा, रोग। गुरु      - हर जगह सम्मान, सब प्रकार के वाहनो का लाभ। शनि    - कठोर कारावास, सन्धिवात से परेशानी, आनंद का नुकसान, दुश्मनो से खतरा।  बुध     - सभी उद्यमो का लाभ, पत्नी के माध्यम से असाधारण लाभ।  केतु    - बुद्धि का नुकसान, तनाव, बाधा, झगडे, दुश्मनो से खतरा, उत्तेजना।   शुक्र    - योगिनी और राजा से खतरा, वाहनो का नुकसान, अस्वादिष्ट भोजन, पत्नी की हानि।  सूर्य    - बुखार, बच्चो को कष्ट, दुशमनो से खतरा, लापरवाही, समयपूर्व मौत का भय।  चंद्र    - उत्तेजना, चिंता, भय, प्रतिष्ठा मे नुकसान, पिता को परेशान करना।  मंगल - भंगदर, सेप्टिक फोड़ा, कटने से रक्त का प्रदुषण, धनहानि, उत्तेजना।   राहु की अन्तर्दशा मे समस्त ग्रहो की प्रत्यंतर दशा का फल गुरु    - स्वर्ण का अधिग्रहण, धन की वृद्धि, आदि।   शनि  - भूमि, वाहन, अनाज मे वृद्धि आदि।  बुध   - शैक्षणिक क्षेत्र मे सफलता, कपडे और रत्न का अधिग्रहण, दोस्तों की यात्रा।  केतु   - पानी और चोरो का खतरा।  शुक्र  - कई प्रकार का शिक्षण, गहने, सोना कपडे का लाभ, कल्याण और समृद्धि।  सूर्य  - राजा, दोस्तो और माता-पिता से सम्मान, सब जगह से सम्मान।  चंद्र  -  कोई परेशानी नहीं, सभी उद्यमो मे सफलता, धन और वाहन लाभ।  मंगल - हथियार से खतरे, दुश्मनो से परेशानी, गुर्दे का दर्द, पेट मे जलन, अपमान।  राहु   - चांडाल आदि से विरोध और उनके द्वारा धन हानि और परेशानी।    शनि की अन्तर्दशा मे समस्त ग्रहो की प्रत्यंतर दशा का फल शनि    - शारीरिक संकट, झगड़े,  नौकरो अथवा सवेको से खतरा।  बुध    - बुद्धिमत्ता की हानि, भोजन की उपलब्धता का तनाव, झगडे, तनाव, खतरे।  केतु    - दुश्मन के शिविर मे कैद, चिंता, भूख, चमक या नूर का नुकसान।  शुक्र   - महत्वाकांक्षाओ की पूर्ति, परिवार कल्याण, उद्यमो मे सफलता और लाभ, धन लाभ।  सूर्य   - राजा द्वारा अधिकारो का सम्मान, परिवार मे झगड़ा, बुखार।  चंद्र    - जासूसी का विकास, अनेक आओरतो से सम्बन्ध, बड़े उद्यमो का उदघाटन चमक का नुकसान।  मंगल - बहादुरी का नुकसान, बेटे को परेशानी, आग और दुश्मनो से खतरा,पित्त और वायु का प्रकोप।  राहु    - धन जमीन कपडे का नुकसान, विदेशी भूमि पर जाने का डर।  गुरु    - औरतो द्वारा नुकसान को रोकने में असमर्थता, झगडे, उत्तेजना।    बुध की अन्तर्दशा मे समस्त ग्रहो की प्रत्यंतर दशा का फल बुध    - बुद्धिमत्ता मे वृद्धि , शिक्षा, धन, वस्त्र आदि का लाभ।  केतु    - मोटा भोजन, पेट की परेशानिया, पित्त और रक्त विकार, नेत्र रोग।  शुक्र    - उत्तर दिशा से लाभ, मवेशियो की कमी, सरकार से प्राधिकरण का अधिग्रहण।  सूर्य    - शान मे हानि, बीमारियो द्वारा परेशानी, दिल में परेशानी या रोग।  चंद्र    - विवाह, धन और संपत्ति का लाभ, पुरे दौर मे आनंद। मंगल - धार्मिक भावनाऐ, शस्त्र धात, शतु भय, धन मे वृद्धि, लाल वस्त्रो से लाभ। राहु    - झगडे, पत्नी या अन्य स्त्री और राजा से खतरे।  गुरु    - राज्य अधिग्रहण, राजा द्वारा अधिकार पदत्त, राज सम्मान, शिक्षा, विद्वतता।  शनि  - पित्त और वायु से परेशानी, शारीरिक चोट, धन हानि।   केतु की अन्तर्दशा मे समस्त ग्रहो की प्रत्यंतर दशा का फल केतु - अचानक, आपदा, विदेशी भूमि पर गमन, धन की हानि।  शुक्र - गैर हिन्दू राजा द्वारा धन नाश, आँखो की परेशानी, मवेशियो का नुकसान। सूर्य - दोस्तों के साथ विरोध, तर्कों का आदान-प्रदान, मोत का डर, हार।  चंद्र - पेचिस रोग, अनाज की हानि, शारीरिक संकट, ग़लतफ़हमी।  मंगल - हथियार से चोंट, आग से खतरा, नौकरो से कष्ट।  राहु - महिलाओ और शत्रु से खतरा, नौकरो से कष्ट।  गुरु - दोस्त, धन, परिधानो का नुकसान, हर जगह परेशानी, धर मे अपमान। शनि - मवेशी और दोस्त की मौत, बहुत कम लाभ, शारीरिक कष्ट। बुध - समझ का नुकसान, शिक्षा मे विफलता, उत्तेजना, खतरे, उद्यमो मे विफलता।   शुक्र  की अन्तर्दशा मे समस्त ग्रहो की प्रत्यंतर दशा का फल शुक्र - सफ़ेद वस्त्र, रत्न जैसे मोती आदि की प्राप्ति, सुन्दर युवती की संगती। सूर्य - सन्धिवात यानि जोड़ो का दर्द, बुखार, सिरदर्द, शत्रु और राजा से खतरा, अल्प धन लाभ।  चंद्र - बेटी का जन्म, वस्त्रो का लाभ, राजा से अधिकारो की प्राप्ति।  मंगल - रक्त और पित्त की परेशानी, झगडे, कई प्रकार की परेशानी। राहु - पत्नी से झगड़ा, राजा और शत्रु से परेशानी, खतरे। शनि - गधे, ऊंट, बकरी, टिल के बीज, लोहा, अनाज आदि की प्ताप्ति, शारीरिक दर्द।  बुध - संपत्ति का लाभ, राजा से अधिकार, ज्ञान, दूसराे द्वारा वितरित धन लाभ।  केतु - समयपूर्व मौत, कबि-कभी दान लाभ, मातृभूमि से दूर जाना।


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*वसंत नवरात्र 13 अप्रैल से 21 अप्रैल 2021 तक* चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल दिन मंगलवार प्रातः 5:30 से 10:15 तक। अभिजीत मुहूर्त 11:56 से दोपहर 12: 47 तक होगा। 13 अप्रैल से नव संवत्सर भारतीय नववर्ष की शुरुआत भी होगी। क्रमश: नवरात्र 13 अप्रैल प्रतिपदा ,शैलपुत्री। 14 अप्रैल द्वितीया, ब्रह्मचारिणी। 15 अप्रैल तृतीया, चंद्रघंटा। 16 अप्रैल चतुर्थी ,कुष्मांडा। 17 अप्रैल पंचमी, स्कंदमाता। 18 अप्रैल षष्ठी, कात्यायनी। 19 अप्रैल सप्तमी, कालरात्रि। 20 अप्रैल अष्टमी, महागौरी। 21 अप्रैल नवमी, सिद्धिदात्री मां का पूजन होता है। ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री के अनुसार दुर्गा सप्तशती नारायण अवतार श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में मार्कंडेय पुराण से ली गई है। इसमें 700 श्लोक व 13 अध्यायों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक क्रियाओं का इसके पाठ में बहुत उपयोग होता है। दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य ने बताया है कि शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य है। दुर्गासप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मवशिष्ठ विश्वामित्र ने शापित किया है। शापोद्धार के बिना पाठ का फल नहीं मिलता दुर्गा सप्तशती के 6 अंगों सहित पाठ करना चाहिए कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती का रहस्य बताया गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती की चरित्र का क्रमानुसार पाठ करने से शत्रु नाश और लक्ष्मी की प्राप्ति व सर्वदा विजय होती है।

यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

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आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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