भूतलिपिः

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Ravinder Pareek 09th Oct 2020

भूतलिपिः शारदातिलके यथा - इस भूतलिपि में नववर्ग तथा ४२ अक्षर होते हैं - इसका विवरण इस प्रकार है - पाँच ह्रस्व ( अ इ उ ऋ लृ) यह प्रथम वर्ग, पञ्च सन्धि वर्ण (ए ऐ ओं औ) चार द्वितीयवर्ग, (ह य र व ल ) य ह तृतीय वर्ग (ङ क ख घ ग) यह चतुर्थ वर्ग इसी प्रकार (ञ च छ झ ज) यह पञ्चम वर्ग ण (ट ठ ढ ण) यह षष्ठ वर्ग (न त थ ध द) यह सप्तम वर्ग, (म प फ भ ब) यह अष्टमवर्ग वान्त (श) श्वेत (ष) इन्द्र (स) यह नवमवर्ग है ।

विनियोग - अस्य भूतलिपेः दक्षिणमूर्ति ऋषिः गायत्रीच्छन्दः वर्णेश्वरीदेवता आत्मनोअभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।

भूतालिपि -  अं इं उं ऋं लृं एं ऐं ओं औं हं यं रं वं लं ङं कं खं घं गं ञं चं छं झं जं णं टं ठं डं नं तं थं धं धं दं मं पं फं भं बं शं षं सं ।

षडङ्गन्यास -  १. हं यं रं वं लं हृदयाय नमः,
२. ङं कं खं घं गं शिरसे स्वाहा
३. ञं चं छं झं जं शिखायै वषट्,
४. णं टं ठं ढं डं कवचाय हुम्
५. नं तं थं धं दं नेत्रत्रयात् वौषट्
६. मं पं फं भं बं अस्त्राय फट् ।

वर्णन्यास -    ॐ अं नमः गुदे,    ॐ इं नमः लिङ्गे
ॐ उं नमः नाभौ        ॐ ऋं नमः हृदि,        ॐ लृं नमः कण्ठे
ॐ एं नमः भ्रूमघ्ये,        ॐ ऐं नमः ललाटे        ॐ ओं नमः शिरसि,
ॐ औं नमः ब्रह्मरन्ध्रे,        ॐ हं नमः ऊर्ध्वमुखे,        ॐ यं नमः पूर्वमुखे,
ॐ रं नमः दक्षिणमुखे,    ॐ वं नमः उत्तरमुखे,        ॐ लं नमः पश्चितामुखे,
ॐ ङं नमः हस्त्राग्रे        ॐ कं नमः दक्षहस्तमूले,    ॐ खं नमः दक्षकूपरे,
ॐ घं नमः हस्ताङ्‌लिसन्धी,        ॐ गं नमः दक्षमणिबन्धे,
ॐ ञं नमः वामहस्ताग्रे,        ॐ चं नमः वामहस्तमूले
ॐ छं नमः दक्षकूर्परे            ॐ झं नमः वामहस्ताङ्‌गुलि सन्धौ,
ॐ जं नमः वाममणिबन्धे        ॐ णं नमः दक्षपादाग्रे,
ॐ टं नमः दक्षपादमूले        ॐ ठं नमः दक्षिणजानौ 
ॐ ढं नमः दक्षपादाङ्‌गुलिसन्धौ,    ॐ डं नमः दक्षिणपादगुल्फे,
ॐ नं नमः वामपादाग्रे,        ॐ तं नमः वामपादागुल्फे,
ॐ थं नमः वामजानौ,            ॐ धं नमः वामपादाङ्‌गुलिसन्धौ,
ॐ दं नमः वामगुल्फे,            ॐ मं नमः उदरे
ॐ पं नमः दक्षिणपार्श्वे        ॐ फं नमः वामपार्श्वे,
ॐ भं नमः नाभौं            ॐ बं नमः पृष्ठे,
ॐ शं नमः गुह्ये,    ॐ षं नमः हृदि,    ॐ सं नमः भ्रूमध्ये’ ।

ध्यान - अक्षस्रजं हरिणपोतमुदग्रटंकं,
विद्यां करैरविरतं दधतीं त्रिनेत्राम् ।
अर्धेन्दुमौलिमरुणामरविन्दरामां
वर्णेश्वरीं प्रणमस्तनभारनम्राम् ॥

इस भूतलिपि की एक लाख का संख्या में जप करना चाहिए । तत्पश्चात तिलों की १० हजार आहुतियाँ देने से भूतलिपि सिद्ध हो जाती है । भूतलिपि को सिद्ध कर लेने पर बनाये गये सारे यन्त्र अपना प्रभाव पूर्णरुप से दिखलाते हैं । इसलिये यन्त्र निर्माणकर्त्ता विद्वानोम को यन्त्र सिद्धि हेतु सर्वप्रथम भूतलिपि की उपासना करनी चाहिए । इसकी सिद्धि के बिना बनाये गये कोई भी यन्त्र अपना चमत्कार या प्रभाव का फल नहीं प्रगट करते ॥१५॥


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