ग्रहों की ताकत का आकलन कैसे करे

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Yatin S Upadhyay 09th Oct 2017

आइये आज हम एक विषय पर पुनर्चिन्तन करें की हमे कौन सा  ग्रह किस शक्ति से प्रभावित कर रहा है

 यह आलेख मेने २००७ में लिखा था  आज पुन संशोधन पश्चात् शोध आलेख के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ

 क्या एक ही ग्रह का कोण बदल जाने से उसका प्रभाव बदल जाता है

पृथ्वी के सभी जड़-चेतन , जीव-जंतु और मनुष्य ग्रहों के विकिरण , कॉस्मि‍क किरण , विद्युत-चुम्बकीय तरंग , प्रकाश , गुरुत्वाकर्षण या गति से ही प्रभावित हैं । इन सभी शक्तियों की चर्चा भौतिक विज्ञान में की गयी है। पुन: विज्ञान इस बात की भी चर्चा करता है कि सभी प्रकार की शक्तियॉ एक-दूसरे के स्वरुप में रुपांतरित की जा सकती है। ऊपर लिखित शक्तियों के चाहे जिस रुप से ग्रह हमें प्रभावित करें , वह शक्ति निश्चि‍त रुप से ग्रहों के स्थैतिक और गतिज ऊर्जा से प्रभावित हैं , क्योंकि व्यावहारिक तौर पर मैंने पाया है कि ग्रह-शक्ति का संपूर्ण आधार उसकी गति में छुपा हुआ है।

पुन: एक प्रश्न और उठता है , सभी ग्रह मिलकर किसी दिन पृथ्वीवासियों के लिए ऊर्जा या शक्ति से संबंधित एक जैसा वातावरण बनाते हैं , तो उसका प्रभाव भिन्न-भिन्न वनस्पति , जीव-जंतु , और मनुष्यों पर भिन्न-भिन्न रुप से क्यों पड़ता है ? एक ही तरह की किरणों का प्रभाव एक ही समय पृथ्वी के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न तरह से क्यों पड़ता है ? इस बात को समझने के लिए कुछ बातों पर गौर करना पड़ेगा। मई का महीना चल रहा हो , मध्य आकाश में सूर्य हो ,दोपहर का समय हो , प्रचण्ड गर्मी पड़ती है। इसी समय पृथ्वी के जिस भाग में सुबह हो रही होगी ,वहॉ सुबह के वातावरण के अनुरुप , जहॉ शाम हो रही होगी , वहॉ शाम के अनुरुप तथा जहॉ मध्य रात्रि होगी , वहॉ समस्त वातावरण आधी रात का होगा।

अभिप्राय यह है कि एक ही किरण का कोण बदल जाने से उसका प्रभाव बिल्कुल बदल जाता है। दोपहर की सूर्य की प्रचंड गर्मी , जो अभी व्याकुल कर देनेवाली है , आधीरात को स्वयंमेव राहत देनेवाली हो जाती है। प्रत्येक दो घंटे में पृथ्वी अपने अक्ष में 30 डिग्री आगे बढ़ जाती है और इसके निरंतर गतिशील होने से सभी ग्रहों के प्रभाव का कार्यक्षेत्र बदल जाता है। पृथ्वी के हर क्षण के बदलाव के कारण ग्रहों के कोण में बदलाव आता है ,जिसके फलस्वरुप हर क्षण सृजन , जन्म-मरण , आविर्भाव आदि जीवात्मा की ग्रंथियों में दर्ज हो जाती है। साथ ही सदैव बदलते ग्रहीय परिवेश के साथ हर जीवात्मा की धनात्मक-ऋणात्मक प्रतिक्रिया होती है। इस तरह एक ही ग्रहीय वातावरण का पृथ्वी के चप्पे-चप्पे में स्थित जड़-चेतन पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। 

ग्रह की गति , प्रकाश , गुरूत्‍वाकर्षण से लोग प्रभावित होते हैं

प्रश्न यह भी है कि जब ग्रह की गति , प्रकाश ,गुरुत्वाकर्षण या विद्युत-चुम्बकीय-शक्ति से लोग प्रभावित हैं , तो अभी तक ग्रह-शक्ति की तीव्रता की जानकारी के लिए भौतिक विज्ञान का सहारा नहीं लेकर फलित ज्योतिष में स्थानबल , दिक्बल , कालबल , नैसर्गिक बल , चेष्टाबल , दृ‍ष्टि‍बल ,आत्मकारक , योगकारक , उत्तरायण , दक्षिणायण , अंशबल , पक्षबल आदि की चर्चा में ही ज्योतिषी क्यों अपना अधिकांश समय गंवाते रहें ? आज इनसे संबंधित हर नियमों और को बारी बारी से हर कुंडलियों में जॉच की जाए , इन नियमों को कम्प्यूटरीकृत कर इसकी जॉच की जाए , मेरा दावा है , कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा। भौतिक विज्ञान में जितनें प्रकार की शक्तियों की चर्चा की गयी है , सभी को मापने के लिए इकाई , सूत्र या संयंत्र की व्यवस्था है । ग्रहों की शक्ति को मापने के लिए हमारे पास न तो सूत्र है, न इकाई और न ही संयंत्र।

विकासशील विज्ञानो का एकदूसरे से परस्‍पर सहसंबंध आवश्‍यक 

आज से हजारो वर्ष पूर्व सूर्यसिद्धांत नामक पुस्तक में ग्रहों की विभिन्न गतियों का उल्लेख है , इन गतियों के भिन्न-भिन्न नामकरण हैं किन्तु इन गतियों की उपयोगिता केवल ग्रह की आकाश में सम्यक् स्थिति को दिखाने तक ही सीमित थी। इन्हीं गतियों में विभिन्न प्रकार से ग्रह की शक्तियॉ छिपी हुई हैं , इस बात पर अभी तक लोगों का ध्यान गया ही नहीं था। किसी भी स्थान पर ये ग्रह विभिन्न गतियों से संयुक्त हो सकते हैं। अत: एक ही स्थान पर रहकर ये ग्रह भिन्न गति के कारण भिन्न फल को प्रस्तुत करते हैं , जातक को भिन्न मनोदशा देते हैं। फलित ज्योतिष में ग्रह-गतियों के विभिन्न फलों का पूरा उपयोग किया जा सकता है , जिसका उल्लेख ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में नहीं किया गया है। इसका मुख्य कारण यह हो सकता है कि उस समय भौतिक विज्ञान में उल्लि‍खित स्थैतिज या गतिज ऊर्जा , गुरुतवाकर्षण , कॉस्मि‍क किरण , विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र आदि की खोज नहीं हुई हो।

स्मरण रहे , हर विज्ञान का विकास द्रुतगति से तभी हो सकता है , जब विकासशील विज्ञान एक दूसरे से परस्पर धनात्मक सहसंबंध बनाए रखें। उन दिनों भौतिक विज्ञान का बहुआयामी विकास नहीं हो पाया था , इसलिए हमारे ऋषि या पूर्वज ग्रहों की शक्ति की खोज आकाश के विभिन्न स्थानों में उसकी स्थिति में ढूंढ़ रहे थे। उन्होने ग्रहों की शक्ति को खोज में एड़ी-चोटी का पसीना एक कर दिया था। कभी वे पातें कि ग्रहों की शक्ति भिन्न-भिन्न राशि‍यों में भिन्न-भिन्न है। कभी महसूस करते कि एक ही राशि‍ में ग्रह भिन्न-भिन्न फल दे रहें हैं। उसी राशि‍ में रहकर कभी अपनी सबसे बड़ी विशेषता तो कभी अपनी कमजोरी दर्ज कराते हैं। आज के सभी विद्वान ज्योतिषी भी अवश्य ही ऐसा महसूस करते होंगे। मैं अनेक कुंडलियों में एक ही राशि‍ में स्थित ग्रहों से उत्पन्न दो विपरीत प्रभावों को देख चुका हूं। कर्क लग्न हो , पंचम भाव में वृश्चि‍क राशि‍ का बृहस्पति हो , ऐसी स्थिति में व्यक्ति संतान सुख से परिपूर्ण , संतृप्त भी हो सकता है , तो निस्संतान और दुखी भी। इस विषय पर नवदर्शन कोंसिल ऑफ़ एस्ट्रोलॉजी  के गठन के अवसर पर चौमु जयपुर में मेने अपना वक्तव्य भी दिया था और नव्दर्शन के उपाध्यक्ष नवीन भाई सुरेन्द्र शास्त्री जी  आशीष जी वरुण जी आदि ने इस विषय को स्मारिका के आमुख में रखने का आग्रह भी किया था  पर  आज हमे पुनर्चिन्तन की आवश्यकता है i

वृश्चि‍क राशि‍ के पंचम भाव का बृहस्पति चाहे जिस द्रेष्काण , नवमांश , षड्वर्ग या अष्टकवर्ग में हो , जितने भी अच्छे अंक प्राप्त कर लें , यदि वह मंगल के सापेक्ष अधिक गतिशील नहीं हुआ , तो जातक धनात्मक परिणाम कदापि नहीं प्राप्त कर सकता। अत: ग्रह की शक्ति किसी विशेष स्थान में नहीं , वरन् उसके राशि‍श की तुलना में बढ़ी हुई गति के कारण होती है। ग्रह के बलाबल निर्धारण के लिए परंपरा से दिक्बल को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। राजयोग प्रकरण की समीक्षा में उद्धृत कुंडली में मंगल दिक्बली था , किन्तु जातक युवावस्था में ही टी बी का मरीज था। मैंने पाया कि उसके जन्मकाल में मंगल समरुपगामी था , जो अतिशीघ्री राशि‍श के भाव में स्थित था। इस कारण मंगल ऋणात्मक था और युवावस्था में ही यानि मंगल के काल में ही जातक की सारी परिस्थितियॉ और प्रवृत्तियॉ ऋणात्मक थी। फलित ज्योतिष में अब तक ग्रहों की स्थिति को ही सर्वाधिक महत्व दिया गया है , उसकी हैसियत या शक्ति को समझने की चेष्टा हीं की गयी है। धनभाव में स्थित वृष का बृहस्पति करोड़पति और भिखारी दोनों को जन्म दे सकता है। इस कारण बृहस्पति और शुक्र दोनों में अंतिर्नहित शक्ति को भिन्न तरीके से समझने की बात होनी चाहिए। थाने में बैठे सभी लोगों को थानेदार समझ लिया जाए तो अनर्थ ही हो जाएगा , क्योंकि भले ही वहॉ अधिक समय थानेदार की उपस्थिति रहती हो, परंतु कभी वहॉ एस पी , डी एस पी और कभी सफेदपोश अपराधी भी बैठे हो सकते हैं।

अभी तक ग्रहों के बलाबल को समझने के लिए विभिन्न विद्वानों की ओर से जितने तरह के सुझाव ज्योतिष के ग्रंथों में दिए गए हैं , वे पर्याप्त नहीं हैं। परंपरागत सभी नियमों की जानकारी , जो शक्ति निर्धारण के लिए बनायी गयी है , में सर्वश्रेष्ठ कौन सा है , निकालना मुश्कि‍ल है ,जिसपर भरोसा कर तथा जिसका प्रयोग कर भविष्यवाणी को सटीक बनाकर जनसामान्य के सामने पेश किया जा सके। ऐसी अनेक कुंडलियॉ मेरी निगाहों से होकर भी गुजरी हैं , जहॉ ग्रह को शक्तिशाली सिद्ध करने के लिए प्राय: सभी नियम काम कर रहे हैं , फिर भी ग्रह का फल कमजोर है। इसका कारण यह है कि उपरोक्त सभी नियमों में से एक भी ग्रह-शक्ति के मूलस्रोत से संबंधित नहीं हैं। इसी कारण फलित ज्योतिष अनिश्चि‍त वातावरण के दौर से गुजर रहा है।

 यतिन एस उपाध्याय

 

 

संशोधन ०९  अक्टबर २०१७


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आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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