ज्योतिष में रत्न परामर्श

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Deepika Maheshwari 22nd Jul 2019

सबसे पहले एक बात जान लें कि निम्न परिस्थितियों में बिना जन्म कुण्डली विश्लेषण के ये रत्न पहनना घातक हो सकता है। 1 विवाह हेतु पुखराज या डॉयमंड। 2 व्यवसाय में सफलता हेतु पन्ना। 3 भूमि प्राप्ति या भूमि के कार्य में सफलता हेतु मूंगा। 4 आय वृद्धि हेतु एकादशेश का रत्न। 5 शत्रु विजय हेतु षष्टेश का रत्न। 6 विदेश यात्रा हेतु द्वादशेष का रत्न। 7 दशानाथ या अंतरदशानाथ का रत्न। 8 नाम राशि या चंद्र राशि का रत्न,राहु,केतु ,शनि के रत्न आदि बिना जन्म कुण्डली विश्लेशण के पहनना नुकसान दायक ही नहीं अपितु घातक भी सिद्ध हो सकता है। कौनसा रत्न किस लिये और कब पहनना है इससे अधिक जरूरी है कि कौनसा रत्न कब और क्यों नही पहनना। आइये इस को थोड़ा समझते है । भारतीय ज्योतिष शास्त्र में केंद्र ओर त्रिकोण के अधिपति ग्रहों को शुभ ग्रह माना गया है। जिसमे भी त्रिकोणेश (1,5,9) को केंद्रश (1,4,7,10) की अपेक्षा अधिक शुभ माना गया है सूर्य और चंद्रमा के अतिरिक्त सभी ग्रहों को दो राशियों का आधिपत्य प्राप्त है। यदि कोई ग्रह क्रेंद और त्रिकोण के एकसाथ अधिपति है तो हम उस ग्रह का रत्न धारण कर सकते। जैसे कर्क और सिंह लग्न में मंगल ,या वृष और तुला लग्न में शनि या मकर और कुम्भ लग्न में शुक्र। भारतीय ज्योतिषशास्त्र में लग्नेश को किसी भी कुण्डली में सबसे माहत्त्वपूर्ण ग्रह माना गया है। क्यों की लग्नेश केन्द्रेश और त्रिकोणेश दोनों है। अतः लग्नेश सदा शुभ अतः कभी भी लग्नेश का रत्न धारण किया जा सकता है। 3,6,8,12 के स्वामी ग्रहों के रत्न कभी भी धारण नहीं करने चाहिए क्योकि इन भावों के परिणाम हमेशा ही अशुभ होते है । अब यदि 2, 3 ,6 ,8, 12 के अधिपति केंद्र या त्रिकोण के भी अधिपति हो तो ? यदि केंद्र के अधिपति 2 ,3 ,6 ,8 ,12 के अधिपति हों तो भी भी उसका रत्न धारण नहीं करना चाहिए । क्यों कि सूत्र है केन्द्राधिपति दोष के कारण शुभ ग्रह अपनी शुभता और अशुभ ग्रह अपनी अशुभता छोड़ देते है ।लेकिन दूसरी राशि जो कि 2 ,3 ,6 ,8 ,12 भावो में है उनके परिणाम स्थिर रहते है यदि त्रिकोण के अधिपति 2 और 12 भावों के भी स्वामी है तो हम रत्न धारण कर सकते है। क्योकि 2 ,और 12 भावों के स्वामी ग्रह अपना फल अपनी दूसरी राशि पर स्थगित कर देते हैं और अपनी दूसरी राशि त्रिकोण में स्थित के आधार पर परिणाम देते है। लेकिन यदि त्रिकोण के स्वामी 3 ,6, 8 भावों के भी अधिपति हों तो किन्ही विशेष परिस्तिथियों में हीें रत्न धारण करना चाहिए। क्यों की कोई भी ग्रह दो राशियों का स्वामी है तो दोनों के परिणाम एक साथ देता है। रत्न हमेशा शुभ भावों की दशा - अंतरदशा के समय पहनने पर विशेष लाभ देते है !! विशेष शनि ,राहु ,केतु के रत्न किन्हीं विशेष परिस्थितियों में ही पहने जा सकते है।अतः इनके रत्न बिना पूर्ण जनकारी के न पहने। रत्न हमेशा गहन कुण्डली विश्लेशण के पश्चात् यदि आवश्यकता हो तभी धारण करें। क्यों की रत्नों के प्रभाव शीघ्र और तीव्र होते है। रत्न धारण करने से पूर्व भली भांति अपनी कुण्डली का विश्लेषण किसी अनुभवी और विद्वान् ज्योतिषी से अवश्य कराये। रत्न का चयन ग्रहों का षडबल, सोलह वर्ग कुंडलियो में ग्रह की स्थिति, रत्न के शुभ और अशुभ प्रभाव क्या और किस क्षेत्र में होंगे ? सभी कुछ गहनता से जांचकर ही रत्न धारण करें। गलत रत्न का चुनाव आपके ही नहीं आपके परिवार के सदस्यों के लिये भी घातक हो सकता है क्यों कि हमारी जन्म पत्रिका के शुभ - अशुभ प्रभाव हमारे परिवार के सदस्यों पर भी होते हैं। कुछ आसान, आवश्यक तथा सही समय पर किये गए सही उपाय , कुछ जन्म पत्रिका के अनुसार सकारात्मक ग्रहो का सहयोग और कुछ सही मार्ग का चयन और सही दिशा में किया गया परिश्रम सुखी और खुशियों से भरा जीवन दे सकता है।


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यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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