ग्रहों के सूत्र

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Pandit dilip 18th Jan 2019

*ज्योतिष के कुछ अचूक सूत्र* 1)जब गोचर में शनि ग्रह धनु, मकर, मीन व कन्या राशियों में गुजरता है तो भयंकर अकाल रक्त सम्बन्धी विचित्र रोग होते हैं। 2)"स्त्री की कुंडली में यदि चन्द्र वृष कन्या या सिहं राशी में स्थित हो तो स्त्री के कम पुत्र होते हैं "। 3)"जन्म लग्न में चन्द्र व शुक्र हो तो स्त्री क्रोधिनी परन्तु सुखी होती है "। 4)"किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष सोमवार ,बुध या गुरूवार को शपथ ले तो उसे प्रजा एवं राष्ट्राध्यक्ष के लिए शुभ माना जाता है"।। 5)"सप्तमेश शुभ युक्त न होकर षष्ठ ,अष्टम,या द्वादश भाव में हो और नीच या अस्त हो तो जातक के विवाह में बाधा आती है" 6)"चन्द्र से सम्बंधित चार विभिन्न योग बनते हैं जब कोई ग्रह चन्द्र से 10वें 7वें, 4थे, ओर पहले हो तो क्रमश:उत्तम,मध्यम, अधम ओर अधमाधम योग बनता है। यदि इनमें अंतिम योग बनता हो तो कुंडली के अन्य योग कमजोर और निष्फल हो जाते हैं"!! 7)जन्म कुंडली में मंगल को भूमि का मुख्य कारक माना गया है. जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव या चतुर्थेश से मंगल का संबंध बनने पर व्यक्ति अपना घर अवश्य बनाता है. जन्म कुंडली में जब एकादश का संबंध चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति एक से अधिक मकान बनाता है लेकिन यह संबंध शुभ व बली होना चाहिए. 8)))जन्म कुंडली में लग्नेश, चतुर्थेश व मंगल का संबंध बनने पर भी व्यक्ति भूमि प्राप्त करता है अथवा अपना मकान बनाता है. जन्म कुंडली में चतुर्थ व द्वादश भाव का बली संबंध बनने पर व्यक्ति घर से दूर भूमि प्राप्त करता है या विदेश में घर बनाता है। 9)जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव प्रॉपर्टी के लिए मुख्य रुप से देखा जाता है. चतुर्थ भाव से व्यक्ति की स्वयं की बनाई हुई सम्पत्ति को देखा जाता है. यदि जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव पर शुभ ग्रह का प्रभाव अधिक है तब व्यक्ति स्वयं की भूमि बनाता है. 10)कोई भी ग्रह पहले नवाँशा में होने से जातक को एक प्रगतिशील और साहसिक नेता बनाता है ऐसे ग्रह की दशा /अन्तर्दशा के समय में जातक सक्रिय होता है।। और अपने सम्वन्धित क्षेत्र में सफलता पाता है।। 11)"सूर्य चन्द्र मंगल और लगन से गर्भाधान का विचार किया जाता है वीर्य की अधिकता से पुरुष तथा रक्त की अधिकता से कन्या होती है। रक्त और रज का बरावर होने से नपुंसक का जन्म होता है"। 12)जन्म से चार वर्ष के भीतर बालक की मृत्यु का कारण माता के कुकर्मों, चार से आठ वर्ष के बीच मृत्यु पिता के पाप कर्मों और आठ से बारह वर्ष की आयु के मध्य मृत्यु स्वयं के पूर्वजन्म के पापों के कारण मानी गई है. 13)शनि वायु का कारक और लिंग में नपुंसक है. वायु का प्रभाव वैचारिक भटकाव की आशंका उत्पन्न करता है.शनि तैलार्पण शनि से उत्सर्जित हो रही वैराग्यात्मक ऊर्जा का (तेल) द्वारा शमन है. पुरुषों को अनुमति है की वे अपना कुछ बृहस्पति अंश (धन एवं ज्ञान) इस प्रक्रिया हेतु व्यय कर सकते हैं.लेकिन सनातन व्यवस्था स्त्रियों को इसकी अनुमति कदापि नहीं देती. स्त्रियों की प्रकृति पृथ्वी के समान ग्राहीय है और उन पर जन्म देने की जिम्मेदारी है. उनके लिए वैराग्य की अपेक्षा भक्ति पर जोर दिया गया है। 14)राशिचक्र के २७ नक्षत्रों के नौ भाग करके तीन-तीन नक्षत्रों का एक-एक भाग माना गया है। इनमें प्रथम 'जन्म नक्षत्र', दसवाँ 'कर्म नक्षत्र' तथा उन्नीसवाँ 'आधान नक्षत्र' माना गया है। शेष को क्रम से संपत्, विपत्, क्षेम्य, प्रत्वर, साधक, नैधन, मैत्र और परम मैत्र माना गया है। 15)किसी भी प्रकार का रिसाव राहु के अंतर्गत आता है.रिसाव किसी भी चीज का हो सकता है द्रव , शक्ति , धन , मान सम्मान या ओज का.। 16)बुध के निर्बल होने पर कुंडली में अच्छा शुक्र भी अपना प्रभाव खो देता है क्योंकि शुक्र को लक्ष्मी माना जाता है और विष्णु की निष्क्रियता से लक्ष्मी भी अपना फल देने में असमर्थ हो जाती हैं. 17)शनि वचनबद्धता , कार्यबद्धता और समयबद्धता का कारक ग्रह है. जिस भी व्यक्ति के जीवन में इन तीनो चीजों का अभाव होगा तो समझना चाहिए की उसकी पत्रिका में शनि की स्थिति अच्छी नहीं है। 18)नीलम को शनि रत्न माना जाता रहा है. लेकिन इस रत्न की तुरंत प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति मन में संदेह उत्पन्न करती है की क्या यह वास्तव में शनि रत्न है. क्योंकि तुरंत प्रतिक्रिया शनि का स्वभाव नहीं है. शनि एक मंदगामी ग्रह है. इसीलिये इसे शनैश्चर भी कहा गया है. जबकि तुरंत और अचानक प्रतिक्रिया राहु का स्वाभाव है. राहु नीलवर्णी माना गया है. सभी प्रकार के विषों का अधिपत्य राहु कोप्राप्त है.। इधर ज्योतिष की अपेक्षाकृत ‘लाल किताब’ भी नीलम को राहु की कारक वस्तु मानती है.। यह बात नीलम के स्वभाव से मेल खाती है. फिर नीलम रत्न का अधिपति कौन है. शनि या राहु.?????? 19)ज्योतिष में व्यवस्था है की पीड़ित ग्रहों की वस्तुएं दान की जाएं. यह ग्रहपीड़ा शांति के लिए किया जाने वाला महत्वपूर्ण उपाय है. इस उपाय में ग्रह की कारक वस्तु को मंदिर , डाकोत , अपाहिजों और गरीबों में दान किया जाता है. इससे अनिष्टकारक ग्रह के प्रकोप में कमी आ जाती है. इस उपाय में कुंडली विवेचना उपरांत ही तय किया जाता है की अमुक वस्तु कितनी बार दान करनी है. कई बार यह उपाय केवल एक बार करना होता है तो कभी कई बार दोहराना होता है. 20)"लड़कों जैसे छोटे बाल रखने वाली स्त्रियां दुखी रहती हैं.वे भले ही उच्च पदस्थ अथवा धनी हों उनके जीवन में सुख नहीं होता. खासतौर पर पति सुख या विपरीत लिंगी सुख. ऐसी स्त्रियों को पुरुषों के प्यार और सहानुभूति की तलाश में भटकते देखा जा सकता है. यदि वे विवाहित हैं तो पति से नहीं बनती और अलगाव की स्थिति बन जाती है और अधिकांश मामलों में पति से संबंध विच्छेद हो भी जाता है."। 21)"व्यक्ति तीन प्रकार से मांगलिक दोष से ग्रस्त होता है – पहला लग्न से, दूसरा जन्मस्थ चंद्र से और तीसरा जन्मस्थ शुक्र से. इनमे शुक्र वाली अवस्था सबसे उग्र और चंद्र वाली सबसे हल्की मानी जाती है. यदि व्यक्ति तीनों ही स्थितियों में मांगलिक हो तो वह प्रबल मांगलिक माना जायेगा"".।।।।। Kp 1)चोरी हुई या नहीं ? - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - ; - - - ; - ;- - दूसरे घर के उप नक्षत्र को देखें यदि उसका सम्बन्ध 7 तथा 8 से बनता हैचोरी हुई है यदि चन्द्र का सम्बन्ध किसी भी तरह केतू से हो गया तो प्रश्न कर्ता उलझन में तथा चिंता में है। क्या चोरी हुई वस्तु मिलेगी या नहीं यदि सूचक RP 2,6और 11 से सम्बन्ध बना लेते हैं तो चोरी किया गया समान मिल जाएगा।। यदि 5,8 तथा 12 से बनता है तो नहीं ।। 2)हम जिस भाव का विचार कर रहे है उस भावसे 1 3 5 7 9 11 भाव शुभ है 4 8 12 भाव बुरे है 2 6 10 वा भाव तट स्त है। 3) पितृ ऋण जब कुण्डली में बृहस्पति 2,5,9,12 भावो से बाहर हो जोकि बृहस्पति के पक्के घर है. तथा बृहस्पति स्वंय 3,6,7,8,10 भाव में और बृहस्पति के पक्के घरों (2,5,9,12) में बुध या शुक्र या शनि याराहु या केतु बैठा हो तो व्यक्ति पितृ ऋण से पीडित होता है। 24)मातृ ऋण जब कुण्डली में चन्द्रमा द्वितीय एंव चतुर्थ भाव से बाहर कहीं भी स्थित हो तथाचतुर्थ भाव में केतु हो तो व्यक्ति मातृ-ऋण से पीडित होता है. अर्थात चन्द्रमाविशेषतः3,6,8,10,11,12 भावों में स्थित हो.। 25)नमक (पिसा हुआ) ==: सूर्य!!!!!. लाल मिर्च (पिसी हुई) : =मंगल!! हल्दी (पिसी हुई ) : = वृहस्पति!!!!!जीरा (साबुत या पिसा हुआ) :=राहु-केतु !!!!!धनिया (पिसा हुआ) =बुध!!!!! काली मिर्च (साबुत या पाउडर) : = काली मिर्च (साबुत या पाउडर) : =शनि!!!!!!!अमचूर (पिसा हुआ) : =केतु!!!!!!!गर्म मसाला (पिसा हुआ) : =राहु!!!!!!!! मेथी : =मंगल 26)राहू ससुराल है जेल में बंद निर्दोष कैदी भी राहू है |राहू सफाई है |रास्ते का पत्थर राहू है |हस्पताल का पोस्ट मार्टम विभाग राहू है। 27)बृहस्पति और राहू जुड़ी कुछ बातें बृहस्पति के साथ राहू सदैव जुड़ा है। आकाश तत्त्व को ईथर भी कहा गया है। यह ईथर भी आत्मतत्व की तरह ही अभौतिक है। जो भी चीज भौतिक है उसके प्रमाणिक कण में जो इलेक्ट्रॉन, प्रोट्रोन न्यूट्रोन की व्यवस्था के पीछे जो अदृश्य शक्ति है वो राहू है।जाहीर है जो अभौतिक है उसमें राहू प्रभाव नहीं है। लेकिन राहू में वो प्रवीनता है जिससे उस अभौतिक के समानान्तर रूप में संलग्न हो कर उसे भौतिक होने का बोध करा देता है। गुरु का आकाश राहू नीला रंग बना देता है प्रतीति के स्तर पर । गुरु को इस प्रकार आच्छादित कर देने की राहू की चंडालिक प्रवृति इस अभौतिक स्तर की तर्ज पर व्यावहारिक रूप में भी बुरी कही गयी है। हालांकि व्यावहारिक स्तर पर इस युति के कई अच्छे मायने भी है।बृहस्पति का आकाश तत्ब व्यापक है - इसकी व्यापकता इहलोक से परलोक तक है । इन दोनों के बीच जो दरवाजा या अंतर है वो राहू है।. 28)शुक्र जो होये कुंडली में सूर्य से आगे, जातक जाये समृद्धि में पिता से आगे। .29)शुक्र तथा शनि आमने-सामने हो दोनों में से कोई एक अथवा दोनों लग्न के या सप्तम के स्वामी हो या चंद्रेश हो तो व्यक्ति समलैंगिक होता है । अगर ये दोनों लग्न और सप्तम में आमने-सामने तो अवश्य ही ऐसा होता है । 30)ज्योतिष में सभी 27 नक्षत्रों को त्रिगुण स्वभावानुसार वर्गीकृत किया गया है. यह गुण हैं सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण. सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति को सतोगुणी, बुध एवं शुक्र को रजोगुणी और मंगल, शनि, राहु, केतू को तमोगुणी माना गया है. एकादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, सूर्य- संक्रान्ति, शनिवार, मंगलवार, गुरुवार, व्रत तथा श्राद्ध के दिन बाल एवं नाखून नहीं काटने चाहिए, ना ही दाढ़ी बनवानी चाहिए।


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*वसंत नवरात्र 13 अप्रैल से 21 अप्रैल 2021 तक* चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल दिन मंगलवार प्रातः 5:30 से 10:15 तक। अभिजीत मुहूर्त 11:56 से दोपहर 12: 47 तक होगा। 13 अप्रैल से नव संवत्सर भारतीय नववर्ष की शुरुआत भी होगी। क्रमश: नवरात्र 13 अप्रैल प्रतिपदा ,शैलपुत्री। 14 अप्रैल द्वितीया, ब्रह्मचारिणी। 15 अप्रैल तृतीया, चंद्रघंटा। 16 अप्रैल चतुर्थी ,कुष्मांडा। 17 अप्रैल पंचमी, स्कंदमाता। 18 अप्रैल षष्ठी, कात्यायनी। 19 अप्रैल सप्तमी, कालरात्रि। 20 अप्रैल अष्टमी, महागौरी। 21 अप्रैल नवमी, सिद्धिदात्री मां का पूजन होता है। ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री के अनुसार दुर्गा सप्तशती नारायण अवतार श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में मार्कंडेय पुराण से ली गई है। इसमें 700 श्लोक व 13 अध्यायों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक क्रियाओं का इसके पाठ में बहुत उपयोग होता है। दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य ने बताया है कि शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य है। दुर्गासप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मवशिष्ठ विश्वामित्र ने शापित किया है। शापोद्धार के बिना पाठ का फल नहीं मिलता दुर्गा सप्तशती के 6 अंगों सहित पाठ करना चाहिए कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती का रहस्य बताया गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती की चरित्र का क्रमानुसार पाठ करने से शत्रु नाश और लक्ष्मी की प्राप्ति व सर्वदा विजय होती है।

यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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