ज्योतिष एवं चिकित्सा

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Astro Rakesh Periwal 15th Mar 2019

ज्योतिष एवं चिकित्सा ज्योतिष शास्त्र भविष्य दर्शन की आध्यात्मिक विद्या है। भारतवर्ष में चिकित्साशास्त्र (आयुर्वेद) का ज्योतिष से बहुत गहरा संबंध है। होमियोपैथ की उत्पत्ति भी ज्योतिष शास्त्र के आधार पर ही हुआ है I
जन्मकुण्डली व्यक्ति के जन्म के समय ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रह नक्षत्रों का मानचित्र होती है, जिसका अध्ययन कर जन्म के समय ही यह बताया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति को उसके जीवन में कौन-कौन से रोग होंगे। चिकित्सा शास्त्र व्यक्ति को रोग होने के पश्चात रोग के प्रकार का आभास देता है। आयुर्वेद शास्त्र में अनिष्ट ग्रहों का विचार कर रोग का उपचार विभिन्न रत्नों का उपयोग और रत्नों की भस्म का प्रयोग कर किया जाता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रोगों की उत्पत्ति अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव से एवं पूर्वजन्म के अवांछित संचित कर्मो के प्रभाव से बताई गई है। अनिष्ट ग्रहों के निवारण के लिए पूजा, पाठ, मंत्र जप, यंत्र धारण, विभिन्न प्रकार के दान एवं रत्न धारण आदि साधन ज्योतिष शास्त्र में उल्लेखित है। ग्रहों के अनिष्ट प्रभाव दूर करने के लिये रत्न धारण करने की बिल्कुल सार्थक है। इसके पीछे विज्ञान का रहस्य छिपा है और पूजा विधान भी विज्ञान सम्मत है। ध्वनि तरंगों का प्रभाव और उनका वैज्ञानिक उपयोग अब हमारे लिये रहस्यमय नहीं है। इस पर पर्याप्त शोध किया जा चुका है और किया जा रहा है। आज के भौतिक और औद्योगिक युग में तरह-तरह के रोगों का विकास हुआ है। रक्तचाप, डायबिटीज, कैंसर, ह्वदय रोग, एलर्जी, अस्थमा, माईग्रेन आदि औद्योगिक युग की देन है। इसके अतिरिक्त भी कई बीमारियां हैं, जिनकी न तो चिकित्सा शास्त्रियों को जानकारी है और न उनका उपचार ही सम्भव हो सका है। ज्योतिष शास्त्र में बारह राशियां और नवग्रह अपनी प्रकृति एवं गुणों के आधार पर व्यक्ति के अंगों और बीमारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जन्मकुण्डली में छठा भाव बीमारी और अष्टम भाव मृत्यु और उसके कारणों पर प्रकाश डालते हैं। बीमारी पर उपचारार्थ व्यय भी करना होता है, उसका विचार जन्मकुण्डली के द्वादश भाव से किया जाता है। इन भावों में स्थित ग्रह और इन भावों पर दृष्टि डालने वाले ग्रह व्यक्ति को अपनी महादशा, अंतर्दशा और गोचर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। इन बीमारियों का कुण्डली से अध्ययन करके पूर्वानुमान लगाकर अनुकूल रत्न धारण करने, ग्रहशांति कराने एवं मंत्र आदि का जाप करने से बचा जा सकता है।
जन्म कुंडली मे 12 भावों से रोग विचार जन्म कुंडली के 12 भावों से रोगों की पहचान की जाती और घटनाओं का आंकलन भी किया जाता है. जन्म कुंडली के पहले भाव से लेकर बारहवें भाव तक शरीर के विभिन्न अंगों को देखा जाता है और जिस अंग में पीड़ा होती है तो उस अंग से संबंधित भाव अथवा भावेश की भूमिका रोग देने में सक्षम रहती है अथवा उस भाव से संबंधित दशा में योग बनते हैं. जन्म कुंडली के किस भाव से कौन से रोग का विचार किया जाता है, उन सभी बातों की चर्चा इस लेख के माध्यम से की जाएगी.
प्रथम भाव – 1st House In जन्म कुंडली के पहले भाव से सिर दर्द, मानसिक रोग, नजला तथा दिमागी कमजोरी का विचार किया जाता है. इस भाव से व्यक्ति के समस्त स्वास्थ्य का पता लगता है कि वह मानसिक अथवा शारीरिक रुप से स्वस्थ रहेगा अथवा नहीं.
दूसरा भाव – 2nd House जन्म कुंडली के दूसरे भाव को मारक भाव भी कहा जाता है. इस भाव से नेत्र रोग, कानों के रोग, मुँह के रोग, नासा रोग, दाँतों के रोग, गले की खराबी आदि का विश्लेषण किया जाता है.

तीसरा भाव – 3rd House जन्म कुंडली के तीसरे भाव से कण्ठ की खराबी, गण्डमाला, श्वास, खाँसी, दमा, फेफड़े के रोग, हाथ में होने वाले विकार जैसे लूलापन आदि देखा जाता है.
चौथा भाव – 4th House इस भाव से छाती, हृदय एवं पसलियों के रोगों का विचार किया जाता है. मानसिक विकारों अथवा पागलपन आदि का विचार भी इस भाव से किया जाता है.
पांचवाँ भाव – 5th House इस भाव से मन्दाग्नि, अरुचि, पित्त रोग, जिगर, तिल्ली तथा गुर्दे के रोगों का विचार किया जाता है. इस भाव से नाभि से ऊपपर का पेट देखा जाता है तो पेट से जुड़े रोग भी यहाँ से देखे जाते हैं.
छठा भाव – 6th House इस भाव से नाभि के नीचे का हिस्सा देखा जाता है तो इस स्थान से जुड़े रोगों को इस भाव से देखा जाएगा. कमर को भी इस भाव से देखा जाता है तो कमर से जुड़े रोग भी यहाँ से देखेगें. इस भाव से किडनी से संबंधित रोग भी देखे जाते है. अपेन्डिक्स, आँतों की बीमारी, हर्निया आदि का विचार किया जाता है.
सातवाँ भाव – 7th House इस भाव से प्रमेह, मधुमेह, प्रदर, उपदंश, पथरी, (मतान्तर से मधुमेह तथा पथरी को छठे भाव से भी देखा जाता है) गर्भाशय के रोग, बस्ति में होने वाले रोगों का विचार किया जाता है.
आठवाँ भाव – 8th House जन्म कुंडली के आठवें भाव को गुप्त स्थान भी माना जाता है इसलिए इस भाव से गुप्त रोग अर्थात जनेन्द्रिय से जुड़े रोग हो सकते हैं. वीर्य-विकार, अर्श, भगंदर, उपदंश, संसर्गजन्य रोग, वृषण रोग तथा मूत्रकृच्छ का विचार किया जाता है.

नवम भाव – 9th House कुंडली के नवम भाव से स्त्रियों के मासिक धर्म संबंधी रोग देखे जाते हैं. यकृत दोष, रक्त विकार, वायु विकार, कूल्हे का दर्द तथा मज्जा रोगों का विचार किया जाता है.
दशम भाव – 10th House जन्म कुंडली के दशम भाव से गठिया, कम्पवात, चर्म रोग, घुटने का दर्द तथा अन्य वायु विकारों का आंकलन किया जाता है

. एकादश भाव – 11th House कुंडली के एकादश भाव से पैर में चोट, पैर की हड्डी टूटना, पिंडलियों में दर्द, शीत विकार तथा रक्त विकार देखे जाते हैं. बारहवाँ भाव – 12th House कुंडली के इस भाव से असहिष्णुता अर्थात एलर्जी, कमजोरी, नेत्र विकार, पोलियो, शरीर में रोगों के प्रति प्रतिरोध की क्षमता की कमी का विचार किया जाता है. जन्म कुंडली में राशि व उनसे होने वाले रोग मेष – Aries : सेलेब्रिटीज और हाई क्लास के लोगों को उनकी जीवनशैली के कारण अत्यधिक मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। आमतौर पर इस राशि के लोग स्वस्थ रहते हैं क्योंकि उनका स्वामी ग्रह मंगल होता है, जो रोगों से लड़ने में सहायक सिद्ध होता है। मगर फिर भी इन्हें सिर से संबंधित कष्टों के होने का डर रह सकता है। जैसे सिरदर्द, लकवा, मिर्गी, अनिद्रा। इन्हें चोट और दुर्घटना से भी संभलकर रहने की जरूरत होती है। वृषभ – Taurus : वृषभ इस राशि के लोग आराम पसंद होते हैं। अपनी जीवनशैली के कारण इन्हें स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना होता है। वृद्धवस्था में इन्हें अधिक परेशानी होती है। जीवनशैली संतुलित रखकर यह रोग को अपके काफी हद तक दूर रह सकते हैं। इस राशि के लोगों के गले, वॉकल कॉर्ड और थॉयराइड ग्लैंड्स पर वृषभ का स्वामित्व होता है। मेडिकल एस्ट्रोलॉजी के अनुसार, उनके गले में परेशानी होने के साथ ही थॉयराइड, टॉन्सिल, पायरिया, लकवा, जीभ एवं हड्डियों के रोग की आशंका रहती है। हालांकि, ग्रह अच्छे बैठे हों, तो वे शानदार गायक बनते हैं।
मिथुन – Gemini : ये लोग बातें करते हुए हाथों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। इनके इशारों की अपनी लैंग्वेज होती है।राशि के लोग ज्यादातर कलात्मक क्षेत्र से जुड़े होते हैं, जिनमें मन-मस्तिष्क के बेहतर तालमेल की जरूरत होती है। जब कभी इनके ऊपर अशुभ ग्रह का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है तो इनके कमजोर पाचन तंत्र को भी वह प्रभावित करता है और इससे संबंधित रोग की आशंका रहती है। इन्हें सिरदर्द व रक्तचाप संबंधी बीमारियों का भी सामना करना पड़ सकता है। जीभ और श्वास संबंधी रोग की भी आशंका रहती है। इन्हें नर्वस सिस्टम से संबंधित परेशानी होने का खतरा अधिक होता है, जिसमें उन्हें सांस लेने में परेशानी और घबराहट की समस्या हो सकती है।
कर्क – Cancer : इन्हें अपने भोजन का खास ध्यान रखने की आवश्यकता होती है। इन्हें चटपटा भोजन काफी पसंद होता है जिससे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। यह काफी कल्पनाशील प्रकृति के भी होते हैं। इन्हें हृदय, फेफड़ों, स्तन और रक्त संबंधी समस्याओं के प्रति सजग रहने की जरूरत होती है। छाती, स्तन और पेट पर इस राशि का अधिकार होता है। इन्हें अपच की परेशानी होती है और खान-पान संबंधी अन्य परेशानियां भी हो सकती हैं, जो पेट से जुड़ी हुई हों।
सिंह – Leo : शेर जैसे दिल वाले इस राशि के लोगों को दिल की परेशानी सिंह राशि के जातक स्वभाव से काफी संवेदनशील होते हैं। इसलिए अपने मन के मुताबिक चीजें न होने की वजह से इन्हें मानसिक रोग होने की आशंका रहती है। इसके अलावा इस राशि के लोगों को रीढ़ की हड्डी से जुड़ी बीमारी या चोट लगने का भी खतरा रहता है। इस राशि के लोगों को दिन में एक दो बार तो उल्टा खड़ा होना चाहिए, ताकि उनके खून का दौड़ाव सही हो सके और वे रीढ़ की हड्डी को फिर से सही रख सकें।
कन्या – Virgo : इस राशि के लोगों को कब्ज की परेशानी हो सकती है। हड्डी, मांसपेशियों, फेफड़ो, पाचन तंत्र और आंत से संबंधित बीमारियां होने की आशंका होती है। इन्हें अपने खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इनका शरीर लगातार गैर-जरूरी चीजों को बाहर करने में ही लगा रहता है।
तुला – Libra : इस राशि के जातक संतुलन बनाना अच्छी तरह जानते हैं। जीवन में संतुलन बनाने के लिए तुला इतने जुनूनी हो सकते हैं कि वे भीतर के संतुलन को खो सकते हैं। उन्हें त्वचा और पीठ के दर्द की परेशानी हो सकती है। राशि के जातकों को आंत से लेकर जांघ तक शरीर के विभिन्न हिस्सों से संबंधित रोगों के होने की आशंका रहती है। इसके अलावा यह अस्थमा, एलर्जी, फ्लू जैसी परेशानियों का भी सामना कर सकते हैं।
वृश्चिक – Scorpius : इस राशि के लोग अंतरंग संबंधों को लेकर काफी सक्रिय होते हैं। लिहाजा इनके प्रजनन अंग और यौन बीमारियों के होने की आशंका अधिक होती है। इस राशि के जातकों को यूटीआई, यीस्ट इंफेक्शन, और बैक्टीरियल इंफेक्शन से ग्रस्त होने , पाचन संबंधी रोगों के होने की आशंका रहती है। जिस वजह से कुछ लोग अपने अवसाद को मिटाने के लिए संयमित खानपान नहीं कर पाते हैं, जिसका सीधा असर इनके वजन पर पड़ता है। आमतौर पर इन्हें अनिद्रा, प्रजनन, मूत्र, रक्त संबंधी रोगों के प्रति सचेत रहना चाहिए।
धनु – Sagittarius : इन्हें पार्टी करना और घूमना काफी पसंद होता है। वे हमेशा बाहर जाते हैं धनु राशि के लोग जीवन में बड़ी से बड़ी परेशानियों का हंसकर सामना करने में यकीन करते हैं। और नई जगहों की तलाश में हमेशा लगे रहते हैं। इन्हें कूल्हों, जांघों और लिवर से संबंधित परेशानी हो सकती है।
मकर – Capricornus : मकर इनकी राशि में सूर्य कमजोर रहने के चलते जीवन में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। इन्हें लगता है कि सारी दुनिया का बोझ इन्हीं के कंधों पर है और ये उसी तरह काम करते हैं।मगर, उनकी इसी आदत के चलते हृदय रोग, जोड़ों, घुटनों या पैरों की हड्डी टूटने या गंभीर चोट आने का खतरा भी रहता है। इस राशि के लोगों की त्वचा भी काफी संवेदनशील होती है।
कुंभ – Aquarius : इस राशि के लोगों को किसी भी तरह के संक्रमण होने का खतरा अधिक रहता है। जिस वजह से आमतौर पर इन्हें रक्त, गले संबंधी इन्फेक्शन से परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इस राशि के लोगों को श्वास, टखने, पैर, कान और नर्वस सिस्टम संबंधी रोग होने की आशंका रहती है।
मीन – Pisces : इस राशि के लोग नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करने वाले होते हैं, जिससे उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित हो सकती है। ये लोग ड्रग्स, शराब या अन्य किसी नशे के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं। इन लोगों को पैरों और लसीका तंत्र से संबंधित परेशानी हो सकती है। रक्त और आंख संबंधी रोगों के प्रति सचेत रहने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा इनके फेफड़े कमजोर होने के चलते अस्थमा, एलर्जी या फ्लू की शिकायत भी रह सकती है। बदलते मौसम में इन्हें अपना खास ध्यान रखने की जरूरत होती है। जन्म कुंडली में ग्रहो से संबंधित होने वाले रोग व उपाय चिकित्सा ज्योतिष में हर ग्रह शरीर के किसी ना किसी अंग से संबंधित होता है. कुंडली में जब संबंधित ग्रह की दशा होती है और गोचर भी प्रतिकूल चल रहा होता है तब उस ग्रह से संबंधित शारीरिक समस्याओं व्यक्ति को होकर गुजरना पड़ सकता है. आइए ग्रह और उनसे संबंधित शरीर के अंग व होने वाले रोगों के बारे में जानने का प्रयत्न करते हैं. सूर्य | Sun Planet सूर्य को हड्डी का मुख्य कारक माना गया है. इसके अधिकार क्षेत्र में पेट, दांई आँख, हृदय, त्वचा, सिर तथा व्यक्ति का शारीरिक गठन आता है. जब जन्म कुंडली में सूर्य की दशा चलती है तब इन्हीं सभी क्षेत्रों से संबंधित शारीरिक कष्ट व्यक्ति को प्राप्त होते हैं. यदि जन्म कुंडली में सूर्य निर्बली है तभी इससे संबंधित बीमारियाँ होने की संभावना बनती है अन्यथा नहीं. इसके अतिरिक्त व्यक्ति को तेज बुखार, कोढ़, दिमागी परेशानियाँ व पुराने रोग होने की संभावनाएँ सूर्य की दशा/अन्तर्दशा में होने की संभावना बनती है. चंद्रमा | Moon Planet चंद्रमा को मुख्य रुप से मन का कारक ग्रह माना गया है. यह ह्रदय, फेफड़े, बांई आँख, छाती, दिमाग, रक्त, शरीर के तरल पदार्थ, भोजन नली, आंतो, गुरदे व लसीका वाहिनी का भी कारक माना गया है. इनसे संबंधित बीमारियों के अतिरिक्त गर्भाशय के रोग हो सकते हैं. नींद कम आने की बीमारी हो सकती है. बुद्धि मंद भी चंद्रमा के पीड़ित होने पर हो सकती है. दमा, अतिसार, खून आदि की कमी चंद्रमा के अधिकार में आती है. जल से होने वाले रोगों की संभावना बनती है. बहुमूत्र, उल्टी, महिलाओ में माहवारी आदि की गड़बड़ भी चंद्रमा के कमजोर होने पर हो सकती हैं. अपेन्डिक्स, स्तनीय ग्रंथियों के रोग, कफ तथा सर्दी से जुड़े रोग हो सकते हैं. अंडवृद्धि भी चंद्रमा के कमजोर होने पर होती है. मंगल | Mars Planet मंगल के अधिकार में रक्त, मज्जा, ऊर्जा, गर्दन, रगें, गुप्तांग, गर्दन, लाल रक्त कोशिकाएँ, गुदा, स्त्री अंग तथा शारीरिक शक्ति आती है. मंगल यदि कुंडली में पीड़ित हो तब इन्हीं से संबंधित रोग मंगल की दशा में हो सकते हैं. इसके अतिरिक्त सिर के रोग, विषाक्तता


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*वसंत नवरात्र 13 अप्रैल से 21 अप्रैल 2021 तक* चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल दिन मंगलवार प्रातः 5:30 से 10:15 तक। अभिजीत मुहूर्त 11:56 से दोपहर 12: 47 तक होगा। 13 अप्रैल से नव संवत्सर भारतीय नववर्ष की शुरुआत भी होगी। क्रमश: नवरात्र 13 अप्रैल प्रतिपदा ,शैलपुत्री। 14 अप्रैल द्वितीया, ब्रह्मचारिणी। 15 अप्रैल तृतीया, चंद्रघंटा। 16 अप्रैल चतुर्थी ,कुष्मांडा। 17 अप्रैल पंचमी, स्कंदमाता। 18 अप्रैल षष्ठी, कात्यायनी। 19 अप्रैल सप्तमी, कालरात्रि। 20 अप्रैल अष्टमी, महागौरी। 21 अप्रैल नवमी, सिद्धिदात्री मां का पूजन होता है। ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री के अनुसार दुर्गा सप्तशती नारायण अवतार श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में मार्कंडेय पुराण से ली गई है। इसमें 700 श्लोक व 13 अध्यायों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक क्रियाओं का इसके पाठ में बहुत उपयोग होता है। दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य ने बताया है कि शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य है। दुर्गासप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मवशिष्ठ विश्वामित्र ने शापित किया है। शापोद्धार के बिना पाठ का फल नहीं मिलता दुर्गा सप्तशती के 6 अंगों सहित पाठ करना चाहिए कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती का रहस्य बताया गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती की चरित्र का क्रमानुसार पाठ करने से शत्रु नाश और लक्ष्मी की प्राप्ति व सर्वदा विजय होती है।

यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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