हस्त चरण या पाद फल,चित्रा चरण फल,स्वाति चरण फल ,विशाखा चरण फल,अनुराधा चरण फल,ज्येष्ठा चरण फल

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Astro Rakesh Periwal 22nd Jan 2019

हस्त चरण या पाद फल

 

प्रथम चरण - इसका स्वामी मंगल है। इसमे चन्द्र, बुध, मंगल  का प्रभाव है। कन्या 160।00 से 163।20 अंश। नवमांश मेष।  यह प्रचुर ऊर्जा, अनैतिक व्यवहार, गणित, शल्य चिकित्सा, सेना का द्योतक है। जातक लाल गौर वर्ण, कृश, दो सर वाला, कपाल पर गड्डा से आसानी पहचाना जाता है।

 

जातक स्त्रियो मे प्रसिद्ध और रमन करने वाला, तीक्ष्ण, सत्य ज्ञानवान, बुद्धिमान, बहादुर, संचार मे आक्रामक, शास्त्र अध्ययन मे रुचिवान होता है। पुरुष जातक शांत घरेलू, सत्य धर्मावलम्बी, खाद्य प्रबंधक, लेखाकार, केशियर, मुनीम होता है।

➣ यह चरण स्वास्थ्य और सुख के लिए अशुभ है।  इस चरण मे कोई भी ग्रह सुरक्षित यात्रा का द्योतक नही है।

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शुक्र है। इसमे चन्द्र, बुध, शुक्र का प्रभाव है। कन्या 163।20 से 166।40 अंश। नवमांश वृषभ। यह व्यवहारिक, संसारिक, गुणवत्ता, भौतिक सम्पदा, कला, चरित्र का द्योतक है। जातक मोटे होंठ, लम्बा शरीर, लम्बी भुजा, लम्बे कठोर बाल, चौड़ा वक्ष, मोटी जाँघे वाला, विद्वान, दूसरो पर आश्रित होता है। जातक ललित कला प्रेमी परन्तु उद्यम रहित होता है। जीवन मे अनेक उतार-चढ़ाव आते है लेकिन कठिनाई रहित जीवन व्यापन कर लेता है। जातक नशेड़ी, शराबी होता है। नशे से अस्वस्थ रहता है। पुरुष जातक मे पहले चरण जैसे ही गुणदोष होते है।

तृतीय चरण - इसका स्वामी बुध है। इसमे चन्द्र, बुध, बुध का प्रभाव है। कन्या 166।40 से 170।00 अंश। नवमांश मिथुन। यह व्यापारी, व्यापार-व्यवसाय, चतुराई, बुद्धि, निपुणता, विशिष्ट बोध का द्योतक है। जातक मनोहर कांतिवान, उत्तम शरीरी, गौर वर्ण, सुवक्ता, लिपि व लेखन कला का ज्ञाता, भ्रमणशील होता है।

जातक अच्छा व्यापारी, सफल विक्रेता, उच्च शिक्षावान, बुद्धिमान, संचार मे चतुर, पढ़ाई-लिखाई मे छानबीन कर वक्त गुजारने वाला होता है। 26 से 29 वर्ष मे अपरिचित प्रेम प्रसंग और नशे की लत से कलंकित और लोक निंदा का पात्र होता है। पुरुष जातक गुस्सैल, लेखक या वकील, आभूषण और वाहन प्रिय, हवाई और रेल यात्रा का शौकीन होता है। समुद्री यात्रा नही करता है। 

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी चन्द्र है। इसमे चन्द्र, बुध, चंद्र का प्रभाव है। कन्या 170।00 से 173।20 अंश। नवमांश कर्क। यह परिवार और समाज के विवेक, भौतिक सुरक्षा, विदेशी वस्तुओ का डर, अच्छे-बुरे के प्रदर्शन का द्योतक है।  यदि गुरु शुभ हो, तो सुसन्तति होती है। जातक छोटा मुंख, कोमल हथेली, ऊँचे कंधे, तीव्र पाचन शक्ति, हाथी जैसे लम्बे पैर, बड़ा पेट, पानी से डरने वाला होता है। 

जातक मानसिक दुविधा वाला, सामान्य बुद्धि वाला, साधारण  शिक्षित, पारिवारिक मामलो में दिलचस्प होता है।  स्त्री/पुरुष जातक आसानी से शराब के आदी हो जाते है।  जातक अज्ञात भय के कारण बहते पानी से और पानी मे डुबकी लगाने से डरता है। जातक लेखक या प्रकाशक, रसायन या जलीय पदार्थ बेचने वाला होता है।

आचर्यों ने चरण फल सूत्र रूप मे कहा है लेकिन अंतर बहुत है।

यवनाचार्य : हस्त के प्रथम चरण मे विवाद कुशल और शूरवीर, द्वितीय मे रोगी, तृतीय मे धनधान्य से भरपूर, चतुर्थ मे श्रीमान होता है।

मानसागराचार्य : हस्त प्रथम चरण मे धनवान, द्वितीय मे भोगी, तृतीय मे पुत्रवान, चतुर्थ मे राजमान होता है।

चित्रा चरण फल

प्रथम चरण- इसका स्वामी सूर्य है।  इसमे बुध, मंगल, सूर्य का प्रभाव है। कन्या 173।20 से 176।40  अंश।  नवमांश सिंह। यह आकर्षण, पराकाष्ठा, स्व खंडन, गोपनियता, गुप्त संस्कार या आध्यात्म का द्योतक है।

जातक सुकुमार, गौर वर्ण, सुनहरे बाल. लम्बी चौड़ी भुजा, चिड़चिड़ा, आक्रामक, स्वाभिमानी होता है। जातक नई वस्तु उत्पादक किन्तु उसके उत्पादन के तरीको को छिपाने वाला, आदर्शो मे सुन्दर, अमानवीय होता है।

द्वितीय चरण - इसका स्वामी बुध है। इसमे बुध, मंगल, बुध का प्रभाव है। कन्या 176।40 से 180।00   अंश। नवमांश कन्या। यह मां बनना, दोहराव, कट्टर धार्मिकता, आयोजन, निर्णय का कारक है।  जातक प्रसिद्ध, कोमल नेत्र, झुके कंधे, भूख प्यास नही लगे ऐसा साहसी, मंत्र विद्या का ज्ञाता, विद्वान लेखक होता है।

जातक चतुर, अनुशासित, व्यावहारिक, प्रत्येक कार्य को गंभीरता से करने वाला, बहुत नाजुक, खुश मिजाज, वचन का पक्का, जल्दी-जल्दी चलने वाला होता है।

तृतीय चरण - इसका स्वामी शुक्र है।  इसमे बुध, मंगल, शुक्र का प्रभाव है। तुला 180।00 से 183।20 अंश। नवमांश तुला। यह सम्बन्ध, स्व तल्लीनता, स्थिर, समाज प्रबंध कुशलता, दिखावट, चकाचोंध का द्योतक  है।  जातक गौर वर्ण, लम्बा मुंख. धन रक्षक, रहस्यमयी बाते छिपाने मे प्रवीण, नये व्यापार मे कुशल , विख्यात होता है।

जातक विपरीत लिंग के लिए अत्यंत वासना युक्त, पत्नी प्रेमी, यात्रा शौकीन, यात्राओ से धनार्जनी, शल्य चिकित्सक, शिष्टाचारी, सुयोग्य साथियो वाला, सही नियमो के अनुसार रहने वाला होता है।

 

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी मंगल है। इसमे  बुध, मंगल, मंगल का प्रभाव है। तुला 183।20 से 186।40 अंश। नवमांश वृश्चिक। यह जादू, रहस्य, गोपनीयता, लालसा, भौतिकवाद का द्योतक है। जातक गोल सजल नेत्र, बैठी कमर, विस्मृत हृदयी,  कृश शरीरी, धनी भोंहे वाला, विचारो मे मग्न होता है।

 

जातक शोध करने वाला, शोध से अचानक लाभ प्राप्त करने वाला, सृजन करने वाला होता है।  दाम्पत्य जीवन मे अड़चने आती है।  28 वर्ष के बाद धीरे-धीरे वैवाहिक जीवन सुखी होता है।आचार्यो ने चरण फल सूत्र रूप में कहा है लेकिन अंतर बहुत है। 

 

यवनाचार्य :  पहले चरण मे चोर, दूसरे मे चित्रकार, कलाकार, तीसरे मे पर स्त्री गामी, चौथे में पीड़ित होता है।

 

मानसागराचार्य : चित्रा के पहले चरण मे सर्व कार्य कुशल, दूसरे चरण मे पराक्रमी तथा माता-पिता व गुरु भक्त, तीसरे चरण मे धन भोगने वाला, चौथे चरण मे धनेश्वर होता है।

 

स्वाति चरण फल  

प्रथम चरण  इसका स्वामी गुरु है। इसमे शुक्र, राहु, गुरु का प्रभाव है। राशि तुला 186।40 से 190।00 अंश। नवमांश धनु। यह संचार, खुले विचार, लेखन का द्योतक है। जातक गौर वर्ण, अश्व मुखी, सुन्दर पंक्तिबद्ध दन्त, बड़े उन्नत नेत्र, लम्बे हाथ पैर वाला, क्रश, यशश्वी होता है।

जातक पूर्ण मेघावी, वाद और विवाद दोनो को सिद्ध करने वाला, असाधारण, व्यवहार मे छल-कपटी, असाधारण अध्यापक, लेखक, प्रवक्ता, रंगमंच कलाकार, पिता से कटु, लघु यात्रा प्रिय, विपरीत लिंग को प्रभावित करने वाला, संतति मे विलम्ब, सुखी दाम्पत्य जीवन होता है।

 

द्वितीय चरण  इसका स्वामी शनि है। इसमे शुक्र, राहु, शनि का प्रभाव है। राशि तुला 190।00 से 193।20 अंश। नवमांश मकर। यह भौतिकता, नाजुकता, विकास, स्थिरता, वाणिज्य का द्योतक है। जातक पतले दुर्बल कन्धे व भुजा वाला, टेड़े दांत , मृग सामान नेत्र , छोटी नाक, दुःखी, सदव्यवहारी होता है।

इस चरण मे जातक अन्य चरणो के सामान आध्यात्मिक उन्नति के लिए धीमी गति वाला नही होता है। इसके जीवन की प्रमुखता वित्त विकास और स्थिरता होती है। जातक प्रगतिवान, विकासवान, व्यवसायिक, धोखेबाजो से सतर्क, साधारण दाम्पत्य जीवन वाला होता है।

 

तृतीय चरण  इसका स्वामी शनि है। इसमे शुक्र, राहु, शनि का प्रभाव है। राशि तुला 193।20 से 196।40 अंश। नवमांश कुम्भ। यह वृद्धि, सृजन, सहयोग, ज्ञान, लक्ष्य का द्योतक है। जातक गंभीरता युक्त नेत्र, मध्य मे चपटी नाक, घने रूखे केश, स्थिर आत्मा, मित्र प्रिय, सरल  ह्रदयी होता है। 

यह स्वाति नक्षत्र मे सबसे अच्छा चरण है। इसमे आर्थिक और आध्यात्मिक दोनो उन्नति होती है। जातक सीखने की इच्छा के कारण सभी संकायो का ज्ञानी, मस्तिष्क और बुद्धि से पूर्ण विकसित, 42 वर्ष पश्चात जीवन अति उत्तम होता है। इनका प्यार, दाम्पत्य जीवन सुखी होता है। 

 

चतुर्थ चरण  इसका स्वामी गुरु है। इसमे शुक्र, राहु, गुरु का प्रभाव है। राशि तुला 196।40 से 200।00 अंश। नवमांश मीन। यह लचीलापन, परिस्थिति अनुसार प्रवीणता, धैर्य, निरंतरता का द्योतक है। जातक गौर वर्ण, बड़े नेत्र, सुन्दर नाक, कोमल चिकने नख, सु वंशी नीतिज्ञ, विविध विषयो का ज्ञाता, शास्त्रज्ञ होता है। इस चरण मे जातक बुद्धिमान लेकिन भावुक, कर्ज से परेशान, अन्य चरणों की अपेक्षा इस चरण मे जातक अधिक परिश्रमी होता है। इसकी तरफ विपरीत लिंग वाले शीघ्र आकर्षित होते है परतु उनमे विरोधभास होता है।आचार्यो ने चरण फल सूत्र रूप में कहा है, लेकिन अंतर बहुत है।

यवनाचार्य :  स्वाति के पहले चरण मे तस्कर, दूसरे मे अल्पायु, तीसरे मे धार्मिक चौथे में राजा होता है। 

मानसागराचार्य : प्रथम चरण में निर्धन, द्वितीय मे गूंगा (मूक) तृतीय मे कर्मज्ञ, चतुर्थ मे पर स्त्री गामी होता है। 

 

विशाखा चरण फल

प्रथम चरण - इसका स्वामी मंगल है। इसमे शुक्र, गुरु, मंगल का प्रभाव है। तुला 200।00 से 203।20 अंश। नवमांश मेष।  यह ऊर्जा, सामाजिक महत्वाकांक्षा, वायदा या वचन बद्धता का द्योतक है।  जातक खूबसूरत, पतला या छोटा ललाट, बुद्धिमान, ज्ञानवान, लोभी साहसी व मनस्वी होता है।

इस पाद में उत्पन्न व्यक्ति काम वासना युक्त, प्रणयपूर्ण, सामाजिक महत्वाकांक्षा के लिए कर्मठ, प्रेम मे किसी भी सीमा तक जाने को आतुर, ऊर्जावान किन्तु क्रोधी होता है।

 

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शुक्र है। इसमे शुक्र, गुरु, शुक्र का प्रभाव है। तुला 203।20 से 206।40 अंश। नवमांश वृषभ। यह टिकाऊपन, सहनशक्ति, भौतिकता का द्योतक है। जातक ऊँचे कंधे व गाल, विषम शरीर, लम्बी घनी भोंहे, सुडोल वक्ष, बड़ा माथा, स्पष्ट वक्ता, शांत होता है।

इस पाद मे उत्पन्न व्यक्ति बुद्धिमान, व्यापार मे सफल, गुप्त रीति से शत्रुओ को पराजित करने वाला, अमीर, शोध करने वाला होता है।  यह पाद स्वास्थ के लिए नेष्ट है जातक को 16, 28, 60 वर्ष मे गम्भीर रोग होते है।

 

तृतीय चरण - इसका स्वामी बुध है। इसमे शुक्र, गुरु, बुध  का प्रभाव है। तुला 206।40 से 210।00 अंश। नवमांश मिथुन। यह संचार, धर्म, खुली विचारधारा, विवाद, दर्शन, खुली स्वार्थपरता, चिंता ग्रस्तता, छल का द्योतक है।  जातक स्वाभविक नेत्र वाला, प्रसन्नचित्त, गौर वर्ण, सम सुन्दर शरीर, कला मे दक्ष, नम्र, मज़ाकी  स्वभाव वाला, वैश्या को रखने वाला या वैश्यगामी होता है।

इस पाद मे जातक विचारवान, पढ़ाई-लिखाई मे रुचिवान, कुशल संचारक, तेजबुद्धि, सफल ब्यवसाय वाला, चतुर, विनोदी होता  है। भाग्योदय 32 वर्ष बाद होता है। ईश्वर कृपा से सफल होता है।

 

चतुर्थ चरण- इसका स्वामी चंद्र है। इसमे मंगल, गुरु, चन्द्र का प्रभाव है। वृश्चिक 210।00 से 213।20  अंश। नवमांश कर्क। यह भावना, परिवर्तन, विश्वास, अस्थिरता, इंतकाम का द्योतक है।  जातक छोटे होंठ, ऊँची नाक, स्थूल अधर, गौर वर्ण, सुन्दर ललाट, दृढ़ अंग, मेढक के समान पेट वाला होता है।

इस पाद मे उत्पन्न व्यक्ति अत्यंत भावुक, बाहरी वातावरण के प्रति संवेदनशील, तीव्र ईर्षालु, इन्तकामी होता है।  इस पाद मे आर्थिक विकास नही होता किन्तु भाग्य से अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेता है।

 

आचर्यों ने चरण फल सूत्र रूप में कहा है परन्तु अंतर बहुत है।  

यवनाचार्य : विशाखा के प्रथम चरण मे नीतिकुशल, द्वितीय मे शास्त्रविद, तृतीय मे वाद विवाद कुशल या वकील चतुर्थ मे दीर्घायु होता है।

मानसागराचार्य : पहले चरण मे माता-पिता का भक्त, दूसरे चरण मे राजमान्य, तीसरे चरण मे भाग्यवान, चौथे मे धनवान होता है।

 

अनुराधा चरण फल

 

प्रथम चरण - इसका स्वामी सूर्य है। इसमे मंगल, शनि, सूर्य का प्रभाव है। वृश्चिक 213।20 से 216।40 अंश।  नवमांश सिंह।  यह अंतरंग प्रत्यक्षीकरण, गर्व, वृत्ति उन्मुखता का द्योतक है।  जातक लम्बी भुजा, चौड़ा वक्ष, लाल उग्र नेत्र,  अल्प केश, बलवान का वध करने वाला, साहसी कर्म करने वाला होता है।

 

जातक व्यावसायिक योग्यता के लिए आतुर, लगातार सीखने और नीचे की पंक्ति मे सुधार के लिए अर्जित ज्ञान का उपयोग करने वाला, अनुशासित, प्रायोगिक होता है।

 

ये आमतौर पर परिवार या पेशे का विकल्प चुनने में अटक जाते है, लेकिन मजबूती और बेहतर कॅरियर तथा संतति और स्वयं के वित्तीय सुरक्षा के लिए परिवार को छोड़ देते है।

 

द्वितीय चरण - इसका स्वामी बुध है। इसमे मंगल, शनि, बुध का प्रभाव है। वृश्चिक 216।40 से 220।00 अंश। नवमांश कन्या। यह बुद्धि, सीखना, अनुशासन, आयोजन, पूर्ति करना, श्रेणी बद्धता, विवेक, निर्णय का द्योतक है।  जातक गौर वर्ण, दृढ़ कंधे व भुजा, कोमल होंठ वाला, धन के लिए प्रयन्तशील, स्पष्ट भाषी, बुद्धिमान, अविवाहित माँ की संतान होता है।

 

जातक उच्च श्रेणी का विद्वान, ज्ञान का भौतिक जगत मे सदुपयोग करने वाला, गंभीर रुकावटो का सामना कर सफल होने वाला, भौतिक ज्ञान मे उन्नत्ति करने वाला, वृद्धावस्था मे सलाहकार, संचार कुशल होता है।

 

तृतीय चरण - इसका स्वामी शुक्र है।  इसमे मंगल, शनि, शुक्र का प्रभाव है। वृश्चिक 220।00 से 223।20 अंश।  नवमांश तुला। जातक श्याम वर्ण, असित (मटमैले) नेत्र, दूसरे की स्त्री के साथ विश्वास घाती, भ्रमण शील, धैर्यवान, नट, साहसी होता है।

 

जातक सामाजिक, बहु मित्र वाला, अच्छा ज्योतिषी होता है।  जातक का खोजी दिमाग पूरी तरह ज्योतिष की ओर निर्देशित होता है।  वह अच्छा ज्योतिषी या अंक ज्योतिषी बन जाता है।

 

कुछ प्रतिकूल मामलो मे देखा गया है कि जातक जीवन पथ से भटक जाता है और पारिवारिक जीवन मे बुरी तरह असफल होता है।  शोध मे गंतव्य तक नही पहुँच पता है। कोई-कोई जातक राजद्रोही भी होता है।

 

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी मंगल है।  इसमे मंगल, शनि, मंगल का प्रभाव है। वृश्चिक 223।20 से  226।40 अंश। नवमांश वृश्चिक। यह संघर्ष, उत्तेजना, कामातुर, गोपनीयता, संस्कारिता का द्योतक है।  जातक गंभीर लाल  नेत्र, चपटी नाक, सुदृढ़ अंग, अच्छी पाचन शक्ति वाला, बड़ा पेट, उग्र कर्म करने वाला होता है।

 

जातक चरम पंथी अर्थात चरम सीमा तक कार्य करने वाला, ये अपने लक्ष्यो के साथ पारिवारिक जीवन के साथ पाने मे असफल होते है। इनमे अत्यधिक ऊर्जा होती है जिससे गुमराह होकर अंत मे कुछ भी नही पाते है। इन्हे सख्त जीवन साथी और अच्छे दोस्त या ज्येष्ठ भ्राता की आवश्यकता होती है।

 

आचार्यो ने चरण फल सूत्र रूप में कहा है परन्तु अंतर बहुत है।

 

यवनाचार्य - अनुराधा के पहले चरण मे तीखे स्वाभाव वाला, दूसरे मे धार्मिक, तीसरे मे दीर्घायु, चौथे मे चरित्र हीन होता है।

 

मानसागराचार्य - अनुराधा के पहले पाद मे यशस्वी, दूसरे में आगमो का ज्ञाता, तीसरे मे महन्ततिक, चौथे मे कुलमण्डन होता है।

 

ज्येष्ठा चरण फल

 

प्रथम चरण - इसका स्वामी गुरु है।  इसमे मंगल, बुध, गुरु का प्रभाव है।  वृश्चिक 226।40 से 230।00 अंश। नवमांश धनु। यह वित्त, परिवार, अत्यावश्यक आर्थिक परिस्थिति का द्योतक है।  जातक ऊँची सुन्दर नाक, अल्प केश, पतली भौंहे, धूर्त, सुबुद्धि, गंभीर साहसी, निपुण होता है।  जातक ठिठोलिया, परिहास जनक, कामातुर, स्त्री की तरफ आकर्षित होने वाला, धार्मिक पुस्तको के विचार मे मग्न, सबका चहेता होता है।

 

जातक 

 

बुद्धिमान, उच्च शिक्षा प्राप्तक, बुद्धि से सफल होता है।  आर्थिक स्थिति डांवाडोल रहने से रातो की नींद हराम होती है।  खतरो से खेलना आदत होती है।  मतभेद से पैतृक सम्पदा प्राप्त होती है।

 

पुरुष जातक कृष्ण वर्णी, कमजोर हाथ पैर वाला, ईर्ष्यालु, प्रतिकारी होता है।  7, 8, 27, 28 वर्ष में गंभीर रोग या मशीनी दुर्घटना में टांग नष्ट हो सकती है। दुखद पारिवारिक जीवन, अल्प मित्र वाला, पत्नी से प्रभावित होता है।

 

द्वितीय चरण - इसका स्वामी शनि है।  इसमे मंगल, बुध, गुरु का प्रभाव है।  वृश्चिक 230।00 से 233।20 अंश। नवमांश मकर। यह जबाब दारिया, ललकारना, स्वार्थता, रक्षा, भौतिकवाद का कारक है। जातक विदीर्ण मुख, स्थिर अंग, चौड़े दांत, चौड़ा सर, जुड़े अंग वाला, छोटा पेट, बड़े नेत्र, यौन दुर्बल या नपुसंक होता है।

 

जातक पूर्णतया प्रयोगिक, स्वार्थी, अनुशासित, छोटी उम्र मे परिपक्व और जबाबदार, लक्ष्य पाने हेतु कर्मठ, स्वरोजगारी, अपना भाग्य स्वयं बनाने वाला होता है।

 

तृतीय चरण - इसका स्वामी शनि है।  इसमे मंगल, बुध, गुरु का प्रभाव है।  वृश्चिक 233।20 से 236।40 अंश। नवमांश कुम्भ। यह मानवता, सेवा, पागलपन, झक्कीपन के यौन दौरे या यौन विकृता का द्योतक है। जातक नासिका के चौड़े अग्र भाग  वाला, काले अंग, विभाजित घने बाल वाला, परितक्य बुद्धि वाला, काल और विपत्ति युक्त होता है। जातक व्यावसायिक विकास की ओर अग्रसर, अच्छा नागरिक, जरुरत मंदो विशेषकर वृद्धो का मददगार होता है।

 

चतुर्थ चरण - इसका स्वामी गुरु है।  इसमे मंगल, बुध, गुरु का प्रभाव है। वृश्चिक 236।40 से 240।00 अंश। नवमांश मीन। यह भावना, प्रचुरता या स्वतंत्रता, भौतिकता का द्योतक है। जातक गौर वर्ण, मृग सामान नेत्र, सुन्दर पुष्ट देह वाला, भूरे केश, दृढ़, शांतचित्त, गुरुजनो द्वारा सम्मानित होता है।

 

जातक अत्यंत भावुक, आर्थिक विकासवान, इछाओ की पूर्ति करने वाला होता है। ये प्रेम प्रसंगो और यौन क्रियाओ मे युवावस्था से ही सलग्न हो जाते है।  ये मनमौजी अपने प्रेमी या प्रेमिका को येन-केन प्रकारेण प्राप्त करने वाले होते है यदि अविभावक विवाह के लिए मना करते है, तो घर से भाग जाते है।

 

आचार्यो ने चरण फल सूत्र रूप में कहा है परन्तु अंतर बहुत है। 

 

यवनाचार्य - ज्येष्ठा के प्रथम चरण मे क्रूर, द्वितीय मे भोगवान, तृतीय मे विद्वान, चतुर्थ मे पुत्रवान होता है। 

 

मानसागराचार्य - ज्येष्ठा के पहले चरण मे धन-धन्योपार्जक दूसरे मे विद्वान, तीसरे मे राजमान्य, चौथे मे यशस्वी होता है।


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*वसंत नवरात्र 13 अप्रैल से 21 अप्रैल 2021 तक* चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल दिन मंगलवार प्रातः 5:30 से 10:15 तक। अभिजीत मुहूर्त 11:56 से दोपहर 12: 47 तक होगा। 13 अप्रैल से नव संवत्सर भारतीय नववर्ष की शुरुआत भी होगी। क्रमश: नवरात्र 13 अप्रैल प्रतिपदा ,शैलपुत्री। 14 अप्रैल द्वितीया, ब्रह्मचारिणी। 15 अप्रैल तृतीया, चंद्रघंटा। 16 अप्रैल चतुर्थी ,कुष्मांडा। 17 अप्रैल पंचमी, स्कंदमाता। 18 अप्रैल षष्ठी, कात्यायनी। 19 अप्रैल सप्तमी, कालरात्रि। 20 अप्रैल अष्टमी, महागौरी। 21 अप्रैल नवमी, सिद्धिदात्री मां का पूजन होता है। ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री के अनुसार दुर्गा सप्तशती नारायण अवतार श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में मार्कंडेय पुराण से ली गई है। इसमें 700 श्लोक व 13 अध्यायों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक क्रियाओं का इसके पाठ में बहुत उपयोग होता है। दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य ने बताया है कि शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य है। दुर्गासप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मवशिष्ठ विश्वामित्र ने शापित किया है। शापोद्धार के बिना पाठ का फल नहीं मिलता दुर्गा सप्तशती के 6 अंगों सहित पाठ करना चाहिए कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती का रहस्य बताया गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती की चरित्र का क्रमानुसार पाठ करने से शत्रु नाश और लक्ष्मी की प्राप्ति व सर्वदा विजय होती है।

यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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