वक्री गुरु

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Acharyaa Rajesh 11th Jul 2019

मित्रो आज बात करते हैं गुरु यानि बृहस्पति ग्रह की जैसा कि आप जानते हैं बृहस्पति बक्री चल रहे यह 11 अगस्त तक बक्री रहेंगे अब गुरु के वक्री होने के कारण क्या क्या हालात बनते हैं उस पर मैं एक पोस्ट कर रहा हु जिसको पढ़ कर आमजन और जो मित्र ज्योतिष सिख रहे हैं उनको लाभ मिल सके , गुरु कानून का रखवाला है,गुरु के कानून के आगे कोई कानून नही चलता है,गुरु ही प्रकृति के कानून को बनाने वाला है,कब वह सीधी चलती हवा को विपरीत कर दे यह किसी को पता नही होता है। जैसे ही गुरु विपरीत होता है हवा का उल्टा चलना माना जाता है,जमीनी जीव ऊपर आने लगते है ऊपरी जीव जमीन के अन्दर जाने लगते है। जो चलते पुर्जा कहे जाते है वे खामोश हो जाते है और जिनकी कोई औकात नही होती है वे चलते पुर्जा बन जाते है,यह गुरु की महिमा है,गुरु जो जीव की श्रेणी में है और जो जीव को जिन्दा रखने के लिये भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को अदा करता है। गुरु का वक्री होना ही गुरु का विपरीत होना कहा जा सकता है। गुरु की चाल को समझना हर किसी की बात नही कारण गुरु हमेशा पंच तत्वों की गरिमा को संचालित रखना चाहता है। हमारी एकता और अखंडता को गुरु कभी भी निरंकुश नही होने देता है वह सम्बन्धों का कारक भी है,अपनी विचार धारा से जुडे लोगों से सम्पर्क बनाता भी है और अपने विचार धारा से जुडे लोगों से सम्पर्क हटाता भी है। किसी भी निर्माण को वह ध्वस्त भी करता है,किसी निर्माण को बना भी देता है,लगने वाली ताकत चाहे किसी जीव की हो,हवा की हो या पानी की हो उसे उससे कोई लेना देना नही वह अपने अनुसार ही कार्य को करता है गुरु किसी भी उस कानून को नही मानता है जो कानून प्रकृति के विपरीत हो। जीव अगर कानून से विपरीत चलने की कोशिश भी करता है लेकिन गुरु अपनी कानूनी मर्यादा से बाहर जाते ही जीव को वापस प्रकृति के कानून की तरफ़ जाने के लिये बेबस कर देता है।एक महल बहुत ही मेहनत और कारीगरी से बनाया जाता है,हवा अपने साथ असंख्य मिट्टी और बालू के कण लेकर आती है,उन्हे उस महल को क्षय करने के लिये दिवारों से चिपकाती है,उन्हे साफ़ करने पर दिवाल का जो हिस्सा क्षय होता है उसे बाद में देर में समझा जा सकता है जब वह क्षय खुली आंखों से प्रत्यक्ष में सामने द्रश्य होने लगता है। उस दिवाल के उस भाग को जो क्षय हो चुका है निर्माण उस तरह से नही किया जा सकता है जो शुरु में किया गया था। गुरु के वक्री होने के कारण हवा जो सीधी चलने वाली थी उल्टी चलने लगती है,मनुष्य अपने कानून को बदलने लगता है,जो आहत करने वाले होते है वे ही बचाने वाले सिद्ध होने लगते है और जो बचाने वाले होते है वे ही आहत करने वाले हो जाते है। जो धरती स्थिर है वह कंपकपाने लगती है,जो हवा चलनी थी वह बंद हो जाती है,जो पत्ते लहराने चाहिये थे वे शांत हो जाते है। अचानक परिवर्तन के माहौल को देखकर गायों के बछडे रंभाने लगते है,गाय अपने बछडों की सुध भूल कर दिशाभूल हो जाती है। धरती के जीव समतल मैदान में आकर लहराने लगते है,कभी किधर भागते है कभी किधर भागते है। सोते हुये लोगों की अचानक आंख खुल जाती है वे समझ नही पाते है कि विचित्र रोने की आवाजें कहाँ से आ रही है। अचानक आवाज आती है जैसे कोई बिना टायर ट्यूब के गाडी कंकरीट की सडक पर दौडी जा रही हो,पृथ्वी के अन्दर कंपन होता है,किवाड बजने लगते है,नींद दूर हो जाती है,लोगों के अन्दर एक अनौखा सा भय अपने आप व्याप्त हो जाता है। घर के बडे बूढों का दिमाग विचलित हो जाता है,महिलायें उत्तेजना से भर जाती है,पुरुष डरने लगते है कि कोई अनहोनी बात नही हो जाये। सर्दी वाले स्थानों में गर्मी महसूस होने लगती है और गर्मी वाले स्थानों में सर्दी महसूस होने लगती है। जहाँ रेगिस्तान होता है वहाँ बरसात होने लगती है और जहाँ पैदावार के क्षेत्र होते है वहाँ सूखा पड जाता है। जो काम धीरे धीरे होने वाले होते है वे जल्दी होने लगते है जो काम जल्दी होने वाले होते है उनके अन्दर देर होने लगती है। जो धरती पर चलने वाले होते है वे वायु मार्ग से चलने लगते है और जो वायु मार्ग में चलने वाले होते है वे धरती पर चलने लगते है। जो लेख कानून के रूप में पहले बना लिये होते है वे लेख अचानक बदले जाने लगते है और जो कानून पहले बदले जा चुके होते है उन्हे दुबारा से बनाया जाने लगता है। जहाँ हिंसा की आशंका होती है वहां शांति हो जाती है और जहां शांति होती है वहां हिंसा होने लगती है। जिस स्थान पर धर्म के नाम पर लडाई होने लगे गुरु उस स्थान को इस काबिल बना देता है कि सभी अपने अपने अनुसार अपने अपने धर्म को एक ही स्थान पर देखने लगे। हिन्दू ने अयोध्या में राममंदिर में राम को देखना चाहा लेकिन मुसलमानों ने उस मंदिर में मस्जिद को बनाकर अपने खुदा को देखना चाहा,दोनो की चाहत एक ही थी कि वह ईश्वर को देखे। हिन्दू अपने राम को बडा बताना चाह रहा है तो मुसलमान अपने खुदा को बडा बताने में लगा है,एक ही प्रकृति के दो अलग अलग नामों को बडा बताने के लिये गुरु अपनी औकात को प्रकट कर रहा है। जो है उसे नही दिखा रहा है और जो नही है उसे दिखाने की कोशिश कर रहा है। मानवीय न्याय भगवान के न्याय को चुनौती दे रहा है। पूजा आस्था नमाज सभी एक ही तरह के मार्ग है,कोई पूजा करने के बाद अपने भगवान को मनाना चाहता है कोई नमाज अदा करने के बाद अपने खुदा को मनाना चाह रहा है,लेकिन दोनो का मार्ग एक ही है,वह भी उसे मना कर अपनी भलाई चाहता है और वह भी अपनी भलाई के लिये उसे मनाना चाह रहा है। मस्जिद को तोडने के रूप में मानव अपने अहम को बढा रहा है और मन्दिर को बनाने के रूप में मानव अपने अहम को और अधिक बढा रहा है। जो मूर्तियां मंदिर में लगेंगी वे भी पत्थर की तराशी हुयी होंगी और जो दिवाले मस्जिद की बनेंगी वे भी पत्थर की ही बनी होंगी। जितनी बडी दिवालें बनेंगी वे सभी अहम की दिवालें होंगी जो मूर्तियां बनेंगी वे भी सभी अहम की मूर्तियां होंगी। गुरु अहम को पूजना चाहता है,जो हवा अन्दर बाहर जा रही है उसे अहम के कारण मानव भूल रहा है,बहुत बडी गल्ती है,एक ही हवा से सभी जिन्दा है,जो हवा मुसलमान छोडता है उसे हिन्दू भी अपने ह्रदय में जीने के लिये ले जाता है और जो हवा हिन्दू छोडता है वह मुसलमान अपने ह्रदय में ले जाकर जिन्दा है। हवा किसी की गुलाम नही है,वह बरसते हुये बादलों को खींच कर रेगिस्तान को तर कर सकती है तो समुद्र में उफ़ान पैदा करने के बाद बडे से बडे शहरों को नेस्तनाबूद कर सकती है। उस हवा को बदलने में मानव लगा है। अपने शरीर के अन्दर गंदी हवा को भर कर भय को पैदा कर रहा है,इस गंदी हवा को त्यागो और अपने को अभय बनाकर एक ही रास्ते को अलग अलग रास्तों में नही बांटो।


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*वसंत नवरात्र 13 अप्रैल से 21 अप्रैल 2021 तक* चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल दिन मंगलवार प्रातः 5:30 से 10:15 तक। अभिजीत मुहूर्त 11:56 से दोपहर 12: 47 तक होगा। 13 अप्रैल से नव संवत्सर भारतीय नववर्ष की शुरुआत भी होगी। क्रमश: नवरात्र 13 अप्रैल प्रतिपदा ,शैलपुत्री। 14 अप्रैल द्वितीया, ब्रह्मचारिणी। 15 अप्रैल तृतीया, चंद्रघंटा। 16 अप्रैल चतुर्थी ,कुष्मांडा। 17 अप्रैल पंचमी, स्कंदमाता। 18 अप्रैल षष्ठी, कात्यायनी। 19 अप्रैल सप्तमी, कालरात्रि। 20 अप्रैल अष्टमी, महागौरी। 21 अप्रैल नवमी, सिद्धिदात्री मां का पूजन होता है। ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री के अनुसार दुर्गा सप्तशती नारायण अवतार श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में मार्कंडेय पुराण से ली गई है। इसमें 700 श्लोक व 13 अध्यायों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक क्रियाओं का इसके पाठ में बहुत उपयोग होता है। दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य ने बताया है कि शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य है। दुर्गासप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मवशिष्ठ विश्वामित्र ने शापित किया है। शापोद्धार के बिना पाठ का फल नहीं मिलता दुर्गा सप्तशती के 6 अंगों सहित पाठ करना चाहिए कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती का रहस्य बताया गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती की चरित्र का क्रमानुसार पाठ करने से शत्रु नाश और लक्ष्मी की प्राप्ति व सर्वदा विजय होती है।

यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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