ज्योतिष की आज की पोस्ट उन मित्रों के लिए है जो ज्योतिष सिख रहे हैं.

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Acharyaa Rajesh 24th Mar 2017

 

मां काली ज्योतिष की आज की पोस्ट उन मित्रों के लिए है जो ज्योतिष सिख रहे हैं. ज्योतिष के अनुसार इंसानों को जन्म के समय और ग्रहों की स्थिति के अनुसार 12 राशियों में विभाजित किया गया है। हर राशि के व्यक्ति का स्वभाव और आदतें दूसरी राशि के लोगों से एकदम अलग होती हैं। किसी भी इंसान को समझने के लिए ज्योतिष सटीक विद्या है।

राशि चक्र की यह पहली राशि है, इस राशि का चिन्ह ”मेढा’ या भेडा है, इस राशि का विस्तार चक्र राशि चक्र के प्रथम 30 अंश तक (कुल 30 अंश) है। राशि चक्र का यह प्रथम बिन्दु प्रतिवर्ष लगभग 50 सेकेण्ड की गति से पीछे खिसकता जाता है। इस बिन्दु की इस बक्र गति ने ज्योतिषीय गणना में दो प्रकार की पद्धतियों को जन्म दिया है। भारतीय ज्योतिषी इस बिन्दु को स्थिर मानकर अपनी गणना करते हैं। इसे निरयण पद्धति कहा जाता है। और पश्चिम के ज्योतिषी इसमे अयनांश जोडकर ’सायन’ पद्धति अपनाते हैं। किन्तु हमे भारतीय ज्योतिष के आधार पर गणना करनी चाहिये। क्योंकि गणना में यह पद्धति भास्कर के अनुसार सही मानी गई है। मेष राशि पूर्व दिशा की द्योतक है, तथा इसका स्वामी ’मंगल’ है। इसके तीन द्रेष्काणों (दस दस अंशों के तीन सम भागों) के स्वामी क्रमश: मंगल-मंगल, मंगल-सूर्य, और मंगल-गुरु हैं। मेष राशि के अन्तर्गत अश्विनी नक्षत्र के चारों चरण और कॄत्तिका का प्रथम चरण आते हैं। प्रत्येक चरण 3.20' अंश का है, जो नवांश के एक पद के बराबर का है। इन चरणों के स्वामी क्रमश: अश्विनी प्रथम चरण में केतु-मंगल, द्वितीय चरण में केतु-शुक्र, तॄतीय चरण में केतु-बुध, चतुर्थ चरण में केतु-चन्द्रमा, भरणी प्रथम चरण में शुक्र-सूर्य, द्वितीय चरण में शुक्र-बुध, तॄतीय चरण में शुक्र-शुक्र, और भरणी चतुर्थ चरण में शुक्र-मंगल, कॄत्तिका के प्रथम चरण में सूर्य-गुरु हैं।

मेष राशि भचक्र की पहली राशि है और इस राशि मे एक से लेकर तीस अंश तक चन्द्रमा अपने अपने प्रकार सोच को प्रदान करता है। नाडी ज्योतिष मे यह तीस अंश एक सौ पचास सोच को देता है,और एक अंश की पांच सोच अपने आप ही पांच प्रकार के तत्वो के ऊपर निर्भर होकर चलती है। सवा दो दिन के अन्दर एक सौ पचास तरफ़ की सोच जब व्यक्ति के अन्दर एक राशि की पैदा हो जायेंगी तो एक महिने के अन्दर अपने आप चाढे चार हजार सोच बन जायेंगी,एक एक सोच का अगर निरूपण किया जाये तो एक व्यक्ति की सोच बताने मे ही साढे चार हजार लोगो को लगना पडेगा,तब जाकर जीवन की एक महिने की सोच को पैदा किया जा सकता है,वह भी सोच केवल समय काल परिस्थिति के अनुसार बनेगी जैसी जलवायु होगी उसी प्रकार की सोच बनेगी यह जरूरी नही है कि थार के रेगिस्तान की सोच आसाम के अधिक पानी वाले क्षेत्र मे जाकर एक ही हो जाये। या अमेरिका के व्यक्ति की सोच भारत के व्यक्ति की सोच से मेल खा जाये अथवा ब्रिटेन के व्यक्ति की मानसिकता भारत के व्यक्ति के मानसिकता से जुड कर ही चल पाये।

चन्द्रमा जब मेष राशि मे प्रवेश करता है तो पहले अश्विनी नक्षत्र में प्रवेश करता है,नक्षत्र का पहला पाया होता है इस नक्षत्र का मालिक भी केतु होता है और पहले पाये का मालिक भी केतु होता है। राहु केतु वैसे चन्द्रमा की गति के अनुसार सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव देने वाले होते है चन्द्रमा की उत्तरी ध्रुव वाली सीमा को राहु के घेरे मे मानते है और दक्षिणी ध्रुव वाली सीमा को केतु के घेरे वाली सीमा को मानते है। इस प्रकार से जातक के अन्दर जो स्वभाव पैदा होगा वह मूल संज्ञक नक्षत्र के रूप मे होगा उसके अन्दर मंगल का प्रभाव राशि से होगा केतु का प्रभाव नक्षत्र से होगा और केतु का ही प्रभाव पद के अनुसार होगा। नकारात्मक भाव देने और केवल अपनी ही हांकने के कारण इस पद मे पैदा होने वाला जातक अधिक तरक्की नही कर पाता है

मंगल के क्षेत्र मे आने से जातक के अन्दर एक प्रकार का पराक्रम जो लडाई झगडे से सम्बन्धित हो सकता है एक इंजीनियर के रूप मे हो सकता है एक भोजन पकाने वाले रसोइये के रूप मे हो सकता है एक भवन बनाने वाले कारीगर के रूप मे भी हो सकता है लेकिन वह अपने दिमाग का प्रयोग नही कर पायेगा,वह जो भी काम करेगा वह दूसरो की आज्ञा के अनुसार ही करेगा जैसे वह फ़ौज मे भर्ती होगा तो उसे अपने अफ़सर की आदेश की पालना करनी होगी वह अगर इंजीनियर होगा तो वह केवल बिजली आदि मे पहले से बनी रूप रेखा मे ही काम कर पायेगा यानी वह अपने दिमाग का प्रयोग केवल पहले से बने नियम के अन्दर ही करने का अधिकार होगा वह अपने मन से काम नही कर सकता है।

केतु का रूप धागे के रूप मे है लेकिन गर्म मंगल के साथ सूत आदि का धागा जल जायेगा यहां पर केवल धातु जो मंगल की कारक होगी वह तांबा ही होगी और जातक तांबे के तार से मंगल बिजली की रूप मे प्रयोग करने का कारण जानता होगा वह धातु मे केतु जो पत्ती के रूप मे भी होगा 

http://www.futurestudyonline.com/astro-details/125

 


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आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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