कृष्‍णमूर्ती पद्धति क्या है

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Ravinder Pareek 08th Aug 2020

इलेक्ट्रनिक मीडिया का जमाना है। हर क्षेत्र में हमें नवीन बातें सुनने और जानने को मिलती हैं। ज्‍योतिष भी इससे कुछ अलग नहीं है। कोई ज्‍योतिषी नाड़ी की बात करता है, तो कोई भृगु संहिता की। कोई कृष्‍णमूर्ती पद्धति का ज़िक्र करता है, तो कोई लाल किताब का। ऐसे में आम आदमी के लिए यह समझना बेहद मुश्किल हो जाता है कि आख़िर ये सब हैं क्‍या और इन सबका वे अपने दैनिक जीवन में क्‍या फायदा उठा सकते हैं? आइए, इस लेख में बात करते हैं कृष्‍णमूर्ति पद्धति के बारे में और समझने की कोशिश करते हैं कि यह ज्‍योतिष की पारम्‍परिक पद्धति से किस तरह भिन्‍न है। कृष्णमूर्ति पद्धति की सबसे बड़ी ख़ासियत है इसका सटीक फलकथन। इस पद्धति के आधार पर निश्चित तौर पर यह बताया जा सकता है कि कोई घटना ठीक कितने बजे घटित होगी, यहाँ तक कि उसके घटित होने के समय का ब्यौरा सटीकता से सेकेण्डों में भी बताना संभव है। उदाहरण के लिए कृष्णमूर्ति पद्धति यह बताने में सक्षम है कि कोई हवाई जहाज़ हवाई-पट्टी पर कब उतरेगा, बिजली कितने बजकर कितने मिनट पर आएगी और कोई खोई हुई वस्तु कब मिलेगी। केपी के आश्चर्यजनक फलकथन इस पद्धति को ज्योतिष की दुनिया में न सिर्फ़ एक विशेष स्थान दिलाते हैं, बल्कि स्वयं ज्योतिष को एक ठोस वैज्ञानिक आधार भी मुहैया कराते हैं। कृष्‍णमूर्ति पद्धति को संक्षेप में “केपी” भी कहते हैं। इस प‍द्धति की खोज या आविष्कार का श्रेय दक्षिण भारत के श्री के. एस. कृष्‍णमूर्ति को जाता है। उन्‍होंने पारम्‍परिक और विदेशी अनेक ज्‍योतिष की शाखाओं का अध्‍ययन किया और पाया की वे बहुत ही भ्रमित करने वाली और मुश्‍किल हैं। पुराने लेखकों की बातों में भी काफ़ी मतभेद हैं। लाखों या करोड़ों की संख्‍या में लिखे गए श्लोकों को याद रखना सामान्‍य व्‍यक्ति के लिए बड़ा मुश्‍किल है। सबसे मुख्‍य बात यह है कि दो अलग-अलग ज्‍योतिषियों के पास जाएँ तो वे दो अलग-अलग और परस्‍पर विरोधी बातें बता देते हैं। इन सभी वजहों से ज्‍योतिषी सही भविष्‍यवाणी नहीं कर पाते, जनता भ्रमित होती है और अन्त में ज्‍योतिष का नाम भी बदनाम होता है। श्री के. एस. कृष्‍णमूर्ति ने ज्‍योतिष की विभिन्‍न शाखाओं के बेहतरीन विचारों को एकत्रित करके और उनमें अपने नवीन शोधों का समन्‍वयन करके इस पद्धति का नामकरण किया “कृष्‍णामूर्ति पद्धति”। यह पद्धति आज के समय में ज्‍योतिष की सबसे सटीक पद्धतियों में से एक मानी जाती है। यह पद्धति सीखने और प्रयोग में लाने में बहुत आसान है। पारम्‍परिक पद्धति के विपरीत यह सुनियोजित है और दो केपी ज्‍योतिषी आपको विरोधी भविष्‍यकथन करते भी नहीं मिलेंगे। पारम्‍परिक पद्धति और कृष्‍णमूर्ति पद्धति में मुख्य फ़र्क इस प्रकार हैं - जिस तरह बारह राशियाँ और सत्ताईस नक्षत्र होते हैं, उसी तरह केपी में हर नक्षत्र के भी नौ विभाजन किए जाते हैं जिसे उप-नक्षत्र या “सब” कहते हैं। कुल मिलाकर 249 उपनक्षत्र होते हैं, जो ज्‍योतिष फलकथन की सूक्ष्‍मता में वृद्धि करते हैं। उप-नक्षत्र की वजह से ही केपी में दिन की ही नहीं, बल्कि घण्टे, मिनट और सेकन्‍ड की सूक्ष्‍मता से भी भविष्‍यवाणी की जा सकती है। “सब” की सूक्ष्‍मता और स्‍पष्ट सिद्धान्‍तों की वजह से केपी ज्‍योतिषी सूक्ष्‍म और दैनिक जीवन के बहुत सटीक फलकथन भी कर सकता है, जैसे - बिजली कितने बजे आएगी, कोई फोन कॉल कितने बजे आएगा, बारिश कितने बजे तक होगी और कब रुकेगी इत्‍यादि। पारम्‍परिक ज्‍योतिष से इतनी सटीकता से फलकथन बहुत मुश्किल या यूँ कहें कि असम्‍भव-सा लगता है। केपी नक्षत्रों के प्रयोग पर विशेष जोर देती है। पारम्‍परिक ज्‍योतिष में नक्षत्रों का प्रयोग सीमित है। पारम्‍परिक भारतीय ज्‍योतिष में भाव की गणना भाव चलित के आधार पर होती है। केपी पाश्‍चात्‍य पद्धिति के भाव चलित को मान्‍यता देता है, जिसे प्लेसीडस कस्‍प चार्ट या ‘निरयन भाव चलित’ भी कहते हैं। इस वजह से केपी की कुण्‍डली और पारम्‍परिक राशिचक्र में ग्रहों की स्थिति में कभी-कभी फ़र्क आ जाता है। केपी में फलकथन का मुख्‍य आधार यह है कि कोई ग्रह न सिर्फ अपना फल देता है, परन्‍तु अपने नक्षत्र-स्वामी का भी फल देता है। पारम्‍परिक ज्‍योतिष का भुलाया हुआ यह सूत्र केपी में अति महत्‍ववपूर्ण है। पारम्‍परिक ज्‍योतिषी में कई दशाओं का प्रयोग होता है, जैसे विशोंत्तरी दशा, अष्‍टोत्तरी दशा और योगिनी दशा इत्‍यादि। केपी सिर्फ विशोंत्‍तरी दशा को मानती है। सिर्फ एक दशा होने की वजह से ज्‍योतिषी के लिए केपी का प्रयोग आसान हो जाता है। केपी में शासक ग्रहों के सिद्धान्‍त का प्रयोग होता है जिसके अनुसार प्रश्‍न के समय और उत्‍तर के समय शासक ग्रह समान होते हैं। जैसे किसी व्‍यक्ति को यह जानना है कि उसका विवाह कब होगा। केपी के अनुसार जिस वक्‍त यह प्रश्‍न पूछा जाएगा उस वक्‍त के शासक ग्रह और जब उस व्‍यक्ति का विवाह होगा उस वक्‍त के शासक ग्रह एक ही होंगे। केपी में हजारों योगों का प्रयोग नहीं होता अत: ज्‍योतिषी को लाखों करोडों श्‍लोक याद रखने की जरूरत नहीं है। जरूरत है तो बस मुख्‍य नियमों को याद रखने की केपी 21वीं सदी के ज्‍योतिषियों के मस्तिष्‍क के लिए बनाई गई पद्धति है। केपी पारम्‍परिक ज्‍योतिष के अन्‍य कई सिद्धान्‍तों जैसे अष्‍टकवर्ग, योग जैसे कालसर्प, साढ़ेसाती, मंगल दोष आदि को भी मान्‍यता नहीं देती है। केपी में प्रश्न ज्‍योतिष पर विस्‍तार से चर्चा की गई है। अगर किसी व्‍यक्ति को अपना जन्‍म-दिन और जन्‍म-समय नहीं पता, तो उसका जन्‍म समय न सिर्फ निकाला जा सकता है परन्‍तु बिना जन्‍म-समय आदि के भी उस व्‍यक्ति के प्रश्न का उत्तर दिया जा सकता है। बताना कहूंगा कि “केपी” 21वीं सदी की, कम्‍प्‍यूटर के जमाने के ज्‍योतिषी के लिए बनाई गई पद्धति है जो किसी व्‍यक्ति के जीवन के छोटे-से-छोटे पहलू का भी सटीकता से फलकथन करती है। रविन्द्र पारीक


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Suman Sharma

nice article


very good knowledge


very nice article


very nice article by Ravi ji


“कृष्‍णामूर्ति पद्धति”। आज के समय में ज्‍योतिष की सबसे सटीक पद्धतियों में से एक मानी जाती है


very good knowledge


Minutes and seconds can also be predicted with precision.


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*वसंत नवरात्र 13 अप्रैल से 21 अप्रैल 2021 तक* चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल दिन मंगलवार प्रातः 5:30 से 10:15 तक। अभिजीत मुहूर्त 11:56 से दोपहर 12: 47 तक होगा। 13 अप्रैल से नव संवत्सर भारतीय नववर्ष की शुरुआत भी होगी। क्रमश: नवरात्र 13 अप्रैल प्रतिपदा ,शैलपुत्री। 14 अप्रैल द्वितीया, ब्रह्मचारिणी। 15 अप्रैल तृतीया, चंद्रघंटा। 16 अप्रैल चतुर्थी ,कुष्मांडा। 17 अप्रैल पंचमी, स्कंदमाता। 18 अप्रैल षष्ठी, कात्यायनी। 19 अप्रैल सप्तमी, कालरात्रि। 20 अप्रैल अष्टमी, महागौरी। 21 अप्रैल नवमी, सिद्धिदात्री मां का पूजन होता है। ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री के अनुसार दुर्गा सप्तशती नारायण अवतार श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में मार्कंडेय पुराण से ली गई है। इसमें 700 श्लोक व 13 अध्यायों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक क्रियाओं का इसके पाठ में बहुत उपयोग होता है। दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य ने बताया है कि शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य है। दुर्गासप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मवशिष्ठ विश्वामित्र ने शापित किया है। शापोद्धार के बिना पाठ का फल नहीं मिलता दुर्गा सप्तशती के 6 अंगों सहित पाठ करना चाहिए कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती का रहस्य बताया गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती की चरित्र का क्रमानुसार पाठ करने से शत्रु नाश और लक्ष्मी की प्राप्ति व सर्वदा विजय होती है।

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न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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