राम कथा(2)

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Astro Pawan Kumar Pandey Ji 31st Aug 2020

☀️ *श्रीरामचरितमानस* ☀️ *षष्ठ सोपान* *लंकाकाण्ड* *दोहा सं० ८०* *(चौपाई सं० १ से ३ तक)* *रावनु रथी बिरथ रघुबीरा ।* *देखि बिभीषन भयउ अधीरा ।।१।।* *अधिक प्रीति मन भा संदेहा ।* *बंदि चरन कह सहित सनेहा ।।२।।* *नाथ न रथ नहि तन पद त्राना ।* *केहि बिधि जितब बीर बलवाना ।।३।।* अर्थ – रावण को रथ पर और श्रीरघुवीर को बिना रथ के देखकर विभीषण अधीर हो गये (धैर्य जाता रहा, घबड़ा गये) । प्रेम अधिक होने से उनके मन में सन्देह हो गया (कि वे बिना रथ के रावण को कैसे जीत सकेंगे)। श्रीरामजी के चरणों की वन्दना करके वे स्नेह पूर्वक कहने लगे – हे नाथ ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं । वह बलवान्‌ वीर रावण किस प्रकार जीता जायेगा ? 👉 यहांँ कुछ लोग यह शंका करते हैं कि 'विभीषणजी जानते तो पहले से ही थे कि श्रीरामसेना में रथ, घोड़े, हाथी इत्यादि कोई वाहन नहीं हैं, रघुनाथजी को पैदल ही युद्ध करना पड़ेगा और मेघनाद एवं कुम्भकर्ण से पैदल ही युद्ध किया भी है, तब पूर्व ही यह प्रश्न क्यों नहीं किया गया ?' विभिन्न विद्वानों ने इसका समाधान निम्न प्रकार किया है – (१) जानते तो पहले से ही थे कि सेना में एक टटुआ भी नहीं है । सरकार को पैदल ही युद्ध करना पड़ेगा, पर घर बैठे जानना दूसरी बात है और समरांगण में देखने से दूसरे ही भाव उत्पन्न होते हैं । अतः विभीषण अधीर हो उठे । खटकती तो यह बात बंदरों को भी थी, यथा – _*'रथारूढ़ रघुनाथहिं देखी । धाए कपि बल पाइ बिसेषी ।।'*_ पर वे अधीर नहीं हुए, क्योंकि उन लोगों में पैदल ही युद्ध करने की प्रथा है, (वे श्रीरामजी को पैदल ही सर्वत्र विजयी होते देख भी चुके हैं) ; परन्तु विभीषण लंकेश ठहरे, रथी की गरिमा को जानते हैं और पदाति की असुविधा का भी उन्हें सम्यक बोध है । अतएव वे अधीर हो गये । (२) विभीषणजी को विजय में संदेह कभी नहीं था । उन्होंने लंका से चलते समय पुकारकर कहा था कि _*'राम सत्य संकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि ।'*_ परन्तु उस समय सरकार को देखा नहीं था, देखने पर प्रीति बढ़ी और समर के संकट में देखकर वह प्रीति अधिक बढ़ गयी, एवं अधिक प्रीति बढ़ने पर चित्त आशंकित हो उठता है, अतएव _*'उर भा संदेहा ।'*_ (३) माधुर्य-लीला की अद्भुतता, गहनता और प्रबलता ऐसी ही है कि वह ऐश्वर्य को दबा देती है । विभीषणजी प्रभु का ऐश्वर्य भली-भांँति जानते थे । उन्होंने रावण से स्वयं कहा था कि _*'तात राम नहिं नर भूपाला । भुवनेश्वर कालहु कर काला ।। ब्रह्म अनामय अज भगवंता । व्यापक अजित अनादि अनंता ।।'*_ समुद्र तरने का उपाय प्रभु पूछते हैं तब भी वे कहते हैं कि _*'कोटि सिंधु सोषक तब सायक ।। जद्यपि तदपि नीति अस गाई ।'*_(५/५०) फिर वे समुद्रबन्धन, एक ही बाण से रावण के मुकुट आदि का हरण करना, महाबल कुम्भकर्ण का लीलापूर्वक वध आदि आंँखों से देख भी चुके हैं । वे ही विभीषण आज प्रभु के माधुर्य में ऐश्वर्य भूल गये । इसी तरह श्रीकौशल्याजी श्रीरामजी का अद्भुत ऐश्वर्य-स्वरूप देख चुकी हैं, उनको अलौकिक ज्ञान प्राप्त है, फिर भी उनकी माधुरी मूर्ति देखकर उनको संदेह हो जाता है वे कह उठती हैं – _*'केहि बिधि तात ताड़का मारी ।.... मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु ।'*_ इत्यादि । यह माधुर्य का प्रभाव है । अत्यन्त स्नेहवश स्नेही को प्रिय के सम्बन्ध में सदा शंका हो जाती है । श्रीकिशोरीजी की भी यही दशा उस समय हो गयी थी जब श्रीराघवजी धनुष तोड़ने के लिये रंगभूमि में चल पड़े थे । श्रीसरकार के अंगों की कोमलता और धनुष की कठोरता वे वहाँ जैसे प्रत्यक्ष देख रही थीं वैसे ही कोमलता और कठोरता विभीषणजी श्रीरामचन्द्रजी और रावण में लोचन-गोचर कर रहे हैं । प्रीति के आधिक्यवश ये भी अधीर हो गये । (४) अन्य सभी जोड़ी से भिड़े हैं, पर यहांँ विषमता देख रहे हैं कि एक अस्त्र-शस्त्र-ध्वजा-पताका सारथी आदि से सुसज्जित रथ पर सवार है और दूसरा पैदल है, कवच आदि से भी रक्षित नहीं है । इस प्रकार जोड़ी समान न देख वे सह न सके, उनसे रहा नहीं गया । ************************************* 🙏 *श्रीराम – जय राम – जय जय राम* 🙏 ************************************* 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️


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*वसंत नवरात्र 13 अप्रैल से 21 अप्रैल 2021 तक* चैत्र नवरात्रि घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 13 अप्रैल दिन मंगलवार प्रातः 5:30 से 10:15 तक। अभिजीत मुहूर्त 11:56 से दोपहर 12: 47 तक होगा। 13 अप्रैल से नव संवत्सर भारतीय नववर्ष की शुरुआत भी होगी। क्रमश: नवरात्र 13 अप्रैल प्रतिपदा ,शैलपुत्री। 14 अप्रैल द्वितीया, ब्रह्मचारिणी। 15 अप्रैल तृतीया, चंद्रघंटा। 16 अप्रैल चतुर्थी ,कुष्मांडा। 17 अप्रैल पंचमी, स्कंदमाता। 18 अप्रैल षष्ठी, कात्यायनी। 19 अप्रैल सप्तमी, कालरात्रि। 20 अप्रैल अष्टमी, महागौरी। 21 अप्रैल नवमी, सिद्धिदात्री मां का पूजन होता है। ज्योतिषाचार्य अजय शास्त्री के अनुसार दुर्गा सप्तशती नारायण अवतार श्री व्यास जी द्वारा रचित महापुराणों में मार्कंडेय पुराण से ली गई है। इसमें 700 श्लोक व 13 अध्यायों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक क्रियाओं का इसके पाठ में बहुत उपयोग होता है। दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य ने बताया है कि शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य है। दुर्गासप्तशती का हर मंत्र ब्रह्मवशिष्ठ विश्वामित्र ने शापित किया है। शापोद्धार के बिना पाठ का फल नहीं मिलता दुर्गा सप्तशती के 6 अंगों सहित पाठ करना चाहिए कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती का रहस्य बताया गया है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती की चरित्र का क्रमानुसार पाठ करने से शत्रु नाश और लक्ष्मी की प्राप्ति व सर्वदा विजय होती है।

यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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