ऋषि पंचमी की कथा व्रत और मान्यताएं

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Ravinder Pareek 22nd Aug 2020

ऋषि पंचमी ***************************** *महिलाओं के लिए विशेष लाभकारी हैं यह व्रत* *=============================*
23 अगस्त 2020 दिन भाद्रपद, शुक्लपक्ष, रविवार, को *"ऋषि पंचमी"* हैं। ऋषि पंचमी का व्रत भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी को किया जाता हैं इस दिन सप्तऋषियों की पूजा की जाती हैं। यह व्रत गणेश चतुर्थी के अगले दिवस एवं हरतालिका तीज के दूसरे दिन किया जाता हैं। इस व्रत के बारे में ब्रह्माजी ने राजा सिताश्व को बताया था। एक बार राजा सिताश्व ने ब्रह्माजी से ऐसे व्रत के बारे में जानना चाहा जिसके करने से प्राणियों के समस्त पापों का नाश हो जाता है। तब ब्रह्माजी ने उन्हें ऋषि पंचमी के व्रत के बारे में बताया।
*ऋषि पंचमी व्रत कथा*
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विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सदाचारी ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता थी, जिसका नाम सुशीला था। उस ब्राह्मण के एक पुत्र तथा एक पुत्री दो संतान थी। विवाह योग्य होने पर उसने समान कुलशील वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया। दैवयोग से कुछ दिनों बाद वह विधवा हो गई। दुखी ब्राह्मण दम्पति कन्या सहित गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे। एक दिन ब्राह्मण कन्या सो रही थी कि उसका शरीर कीड़ों से भर गया। कन्या ने सारी बात मां से कही। मां ने पति से सब कहते हुए पूछा- प्राणनाथ! मेरी साध्वी कन्या की यह गति होने का क्या कारण है?

उत्तंक ने समाधि द्वारा इस घटना का पता लगाकर बताया- पूर्व जन्म में भी यह कन्या ब्राह्मणी थी। इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू दिए थे। इस जन्म में भी इसने लोगों की देखा-देखी ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़े हैं। धर्म-शास्त्रों की मान्यता हैं कि रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती हैं। वह चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। यदि यह शुद्ध मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य प्राप्त करेगी। पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधिपूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। व्रत के प्रभाव से वह सारे दुखों से मुक्त हो गई। अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित अक्षय सुखों का भोग मिला।

*ऋषि पंचमी पूजा विधि*
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ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार ऋषि पंचमी के दिन महिलाएं घर में साफ-सफाई करके पूरे विधि विधान से सात ऋषियों के साथ देवी अरुंधती की स्थापना करती हैं। सप्त ऋषियों की हल्दी, चंदन, पुष्प अक्षत आदि से पूजा करके उनसे क्षमा याचना कर सप्तऋषियों की पूजा की जाती हैं। पूरे विधि- विधान से पूजा करने के बाद ऋषि पंचमी व्रत कथा सुना जाता है तथा पंडितों को भोजन करवाकर कर व्रत का उद्यापन किया जाता हैं।

*ऋषि पंचमी पूजा में इस मंत्र का स्मरण करें* *=========================* *कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोय गौतम:* *जमदग्निर्वसिष्ठश्च। सप्तैते ऋषय: स्मृता:*
*गृह्णन्त्वर्ध्य मया दत्तं तुष्टा भवत मे सदा।।*

*ऋषि पंचमी व्रत फल*
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इस दिन व्रत रखकर पूरे विधि- विधान से सप्तर्षियों की करने से व्यक्ति के सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। अविवाहित स्त्रियों के लिए यह व्रत बेहद महत्त्वपूर्ण और फलकारी माना जाता हैं। इस दिन हल से जोते हुए अनाज को नहीं खाया जाता अर्थात धरती से उगने वाले अन्न ग्रहण नहीं किए जाते हैं। ऋषि पंचमी का व्रत करने से अत्यंत लाभ प्राप्त होता है, यह व्रत करने से महिलाओं को मासिक धर्म में हुई जाने अनजाने में हुई गलतियों के दोषों से मुक्ति प्राप्त होती है। ऋषि पंचमी का व्रत करके महिलाएँ भूलवस में हुए पापों से मुक्ति पा सकती हैं। वैसे भी यह व्रत विशेषकर महिलाओं के लिए ही हैं। यह व्रत करके महिलाएँ अपने जीवन के कई दोषों से मुक्ति पा सकते हैं। इस दिन सप्तऋषियों के साथ- साथ गुरु वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति की भी पूजा की जाती हैं।

*ऋषि पंचमी व्रत के लाभ* *=================*
1. ऋषि पंचमी का व्रत विशेष रूप से महिलाएँ मासिक धर्म में हुई धार्मिक गलतियों और दोषों से रक्षा के लिए करती हैं। माना जाता है यह व्रत करने से इन सभी दोषों से मुक्ति मिल जाती हैं।

2. ऋषि पंचमी के व्रत में अपामार्ग को पौधे को विशेष महत्व दिया जाता हैं। इस दिन *अपामार्ग* (चिटचिरा) के पौधे से दातुन और स्नान करने के उपरान्त ही यह व्रत पूर्ण माना जाता हैं। ऋषि पंचमी का यह व्रत सभी पापों का नाश करने वाला माना गया हैं।

3. ऋषि पंचमी का व्रत प्रत्येक वर्ग की महिला कर सकती हैं। इस व्रत के पुण्यफल से सभी प्रकार के पापों का क्षय होता हैं। इसलिए यह व्रत महिलाओं के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता हैं।

4. ऋषि पंचमी का यह व्रत सुहागन स्त्रियों के साथ-साथ कुँवारी कन्याएं भी कर सकती हैं लेकिन यह व्रत मनोवांछित और योग्य वर पाने के लिए नहीं किया जाता बल्कि अन्य दोषों से मुक्ति पाने के लिए किया जाता हैं।
5. ऋषि पंचमी के दिन गंगा स्नान को अधिक महत्व दिया जाता हैं। इसलिए गंगा स्नान आदि करें और उसके बाद ही सप्तऋषि की पूजा करें।

6. ऋषि पंचमी के दिन जमीन से बोया हुआ अनाज नहीं खाया जाता अगर कोई महिला ऐसा करती हैं तो उसे सप्तऋषियों का श्राप मिलता हैं और उसे जीवन में अनेकों कष्टों का सामना करना पड़ता हैं।

7. ऋषि पंचमी के दिन ऋषि वशिष्ठ की पत्नी अरुंधति की भी पूजा की जाती हैं। इसलिए सप्तऋषि के साथ- साथ देवी अरुंधति की भी पूजा अवश्य करें। ऐसा करने से आपको मासिक धर्म में होने वाली पीड़ा से मुक्ति मिलेगी।
8. ऋषि पंचमी के सात वर्षों के बाद आठवें वर्ष में सप्त ऋषियों की सोने की प्रतिमा बनाकर ब्राह्मण को दान दी जाती हैं। ऐसा करने से ही यह व्रत पूर्ण माना जाता हैं।

9. मासिक धर्म में किसी ब्राह्मण को भोजन कराने के पाप से मुक्ति दिलाता हैं ऋषि पंचमी का व्रत।

10. ऋषि पंचमी का व्रत मासिक धर्म में किसी पूजा के समान को हाथ लगाने के पाप से भी मुक्ति दिलाता हैं।।

द्वारा रविन्द्र पारीक


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Suman Sharma

very nice article by Astro Ravi ji


Very nice articles


व्रत की कथा व्रत फल एवं महिमा और अध्यात्म की जानकारी के लिए धन्यवाद


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आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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