पुत्र मोक्ष का द्वार है

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Astro Rakesh Periwal 23rd Jun 2019

पुत्र मोक्ष का द्वार है                सनातन शास्त्रों में बार बार, जगह जगह ऐसा समझाया गया है बताया गया है कि पुत्र मोक्ष का द्वार है, क्या ये कोरी कल्पना है, मनगढ़त है या विज्ञान विहीन है, नही ऐसा कुछ भी नही है ये तो सिर्फ सूत्र है और इस सूत्र के पीछे बहुत ही गूढ़ सनातन विज्ञान, तत्व विज्ञान और जीवन जीने के तरीके को समझाया गया और एक प्रारंभिक स्तर जो की मोक्ष जाने के लिए बेहद जरूरी है आइए इस सूत्र को गहराई से समझते है।        पुत्र का जन्म होगा और युवा होते होते वो पिता की जिम्मेदारी अपने सर ले कर पिता को जिम्मेदारी मुक्त कर देगा और फिर पिता धर्म का अनुशरण करके मोक्ष की तरफ बढ़ चलेंगे ऐसा भी बहुत लोगो का मानना है लेकिन मैं यंहा पे एक बात थोड़ी और साफ कर दु की प्राचीन भारत मे 50 वर्ष की आयु के बाद वानप्रस्थ आश्रम और 75 वर्ष के बाद सन्यास आश्रम जीवन का हिस्सा था तो हर कोई 50 वर्ष के बाद तो धर्म मे लग ही रहा था तो फिर भी पुत्र को अतिआवयशक बताया है और मैने जितना शास्त्रों को समझा है तो वही मैं प्रस्तुत करने जा रहा हूँ।       सबसे पहले समझते है की पुत्र का जन्म कैसे होता है        पुत्र के जन्म के लिए माता के रज और पिता के वीर्य में जल तत्व का प्रभाव होना अत्यंत आवयशक है बिना जल तत्व के प्रभाव से कभी भी पुत्र का जन्म नही हो सकता है।       अब मैं यंहा पे थोड़ा जल तत्व के विषय मे बता दु की ये क्या है और क्या क्या इसके मुख्य कर्म है, जल तत्व, पंचतत्व में से चौथे नम्बर का एक तत्व है जो कि अग्नि तत्व के बाद और पृथ्वी तत्व से पहले आता है और धर्म, दया, ज्ञान, जिज्ञासाएं, मानवता, अनुशासन, गुरु, स्थिरता ये सब जल तत्व के अधिकार क्षेत्र में आते है।      अब समझते है कि माता के रज और पिता के वीर्य में जल तत्वों का प्रभाव कैसे आता है,      रज और वीर्य में जल का प्रभाव जब ही आएगा जब शरीर मे जल का प्रभाव रहेगा और शरीर मे जल का प्रभाव जब ही रहेगा जब उनका रहन सहन और खान पान में जल तत्व का प्रभाव रहेगा,     अब समझते है कि रहन सहन और खान पान में जल तत्वों का प्रभाव कैसे रहेगा, रहन सहन में जल तत्व का प्रभाव जब ही रहेगा जब आपके पूर्वज, आप और आपका परिवार धर्म के मार्ग पे चलेंगे या धर्म का अनुसरण करेंगे और जब आप धर्म की राह पे चलेंगे तो जल तत्व स्वतः ही बढ़ने लगेगा और अब बात करते है खान पान की, खान पान जब सात्विक होगा तब स्वतः धर्म भी बढ़ेगा और जल तत्व भी बढ़ेगा,     तो अब ये निश्चित हो गया कि शरीर मे जल तत्व जब ही बढ़ेगा जब आपका दैनिक आचरण धर्म के अनुसार ही चलता हो और जब इतना सब कुछ धर्म के अनुसार चलेगा तो आपको पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी और जब इतना सब कुछ धर्म के हिसाब से चलेगा तो मोक्ष स्वतः ही शुलभ हो जाएगी।       आपके घर मे पुत्र का जन्म इस बात की तरफ इशारा करते है की आपके साथ जल तत्वों का प्रभाव जुड़ा हुआ है और इसलिये ही सनातन शास्त्रों में पुत्र को मोक्ष का द्वार कहते है।        पुत्र मोक्ष का द्वार है ये तो मात्र एक सूत्र है और इस सूत्र के पीछे की हकीकत और गूढ़ विज्ञान, जितना आज तक मुझे समझ आया है आपके सामने प्रस्तुत किया है सनातन विज्ञान ही महाविज्ञान है और यंहा हर शब्द विज्ञान से परिपूर्ण है तो जब सनातन शास्त्रों को पढ़े बड़ी जिम्मेदारी के साथ पढ़े और ये मान कर ही पढ़े की आप दुनिया का सबसे बड़ा विज्ञान पढ़ रहे है। ।।जय माता दी।।


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यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति | काकोऽपि किं न कुरूते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् || If the 'living' of a person results in 'living' of many other persons, only then consider that person to have really 'lived'. Look even the crow fill it's own stomach by it's beak!! (There is nothing great in working for our own survival) I am not finding any proper adjective to describe how good this suBAshit is! The suBAshitkAr has hit at very basic question. What are all the humans doing ultimately? Working to feed themselves (and their family). So even a bird like crow does this! Infact there need not be any more explanation to tell what this suBAshit implies! Just the suBAshit is sufficient!! *जिसके जीने से कई लोग जीते हैं, वह जीया कहलाता है, अन्यथा क्या कौआ भी चोंच से अपना पेट नहीं भरता* ? *अर्थात- व्यक्ति का जीवन तभी सार्थक है जब उसके जीवन से अन्य लोगों को भी अपने जीवन का आधार मिल सके। अन्यथा तो कौवा भी भी अपना उदर पोषण करके जीवन पूर्ण कर ही लेता है।* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।

न भारतीयो नववत्सरोSयं तथापि सर्वस्य शिवप्रद: स्यात् । यतो धरित्री निखिलैव माता तत: कुटुम्बायितमेव विश्वम् ।। *यद्यपि यह नव वर्ष भारतीय नहीं है। तथापि सबके लिए कल्याणप्रद हो ; क्योंकि सम्पूर्ण धरा माता ही है।*- ”माता भूमि: पुत्रोSहं पृथिव्या:” *अत एव पृथ्वी के पुत्र होने के कारण समग्र विश्व ही कुटुम्बस्वरूप है।* पाश्चातनववर्षस्यहार्दिकाःशुभाशयाः समेषां कृते ।। ------------------------------------- स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्रभक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु ॥ *आप सभी सदैव आनंद और, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें*... *विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें,* ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे, आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे.. *अंग्रेजी नव् वर्ष आगमन की पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं* ज्योतिषाचार्य बृजेश कुमार शास्त्री

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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