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व्यक्तिगत बाधा निवारण के लिए उपाय —-

13th Sep 2017

व्यक्तिगत बाधा निवारण के लिए उपाय —-

 

 

व्यक्तिगत बाधा के लिए एक मुट्ठी पिसा हुआ नमक लेकर शाम को अपने सिर के ऊपर से तीन बार उतार लें औरउसे दरवाजे के बाहर फेंकें। ऐसा तीन दिन लगातार करें। यदि आराम न मिले तो नमक को सिर के ऊपर वार कर शौचालय में डालकर फ्लश चला दें। निश्चित रूप से लाभ मिलेगा।

 

 

हमारी या हमारे परिवार के किसी भी सदस्य की ग्रह स्थिति थोड़ी सी भी अनुकूल होगी तो हमें निश्चय ही इन उपायों से भरपूर लाभ मिलेगा।

 

 

अपने पूर्वजों की नियमित पूजा करें। प्रति माह अमावस्या को प्रातःकाल ५ गायों को फल खिलाएं।

 

 

गृह बाधा की शांति के लिए पश्चिमाभिमुख होकर क्क नमः शिवाय मंत्र का २१ बार या २१ माला श्रद्धापूर्वक जप करें।

 

 

यदि बीमारी का पता नहीं चल पा रहा हो और व्यक्ति स्वस्थ भी नहीं हो पा रहा हो, तो सात प्रकार के अनाज एक-एक मुट्ठी लेकर पानी में उबाल कर छान लें। छने व उबले अनाज (बाकले) में एक तोला सिंदूर की पुड़िया और ५० ग्राम तिल का तेल डाल कर कीकर (देसी बबूल) की जड़ में डालें या किसी भी रविवार को दोपहर १२ बजे भैरव स्थल पर चढ़ा दें।

 

 

बदन दर्द हो, तो मंगलवार को हनुमान जी के चरणों में सिक्का चढ़ाकर उसमें लगी सिंदूर का तिलक करें।

 

 

पानी पीते समय यदि गिलास में पानी बच जाए, तो उसे अनादर के साथ फेंकें नहीं, गिलास में ही रहने दें। फेंकने से मानसिक अशांति होगी क्योंकि पानी चंद्रमा का कारक है।

 

 

शास्त्रों के अनुसार मनुष्य के जीवन के 16 महत्वपूर्ण संस्कार बताए गए हैं, इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार में से एक है विवाह संस्कार। सामान्यत: बहुत कम लोगों को छोड़कर सभी लोगों का विवाह अवश्य ही होता है। शादी के बाद सामान्य वाद-विवाद तो आम बात है लेकिन कई बार छोटे झगड़े भी तलाक तक पहुंच जाते हैं। इस प्रकार की परिस्थितियों को दूर रखने के लिए ज्योतिषियों और घर के बुजूर्गों द्वारा एक उपाय बताया जाता है।

अक्सर परिवार से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए मां पार्वती की आराधना की बात कही जाती है। शास्त्रों के अनुसार परिवार से जुड़ी किसी भी प्रकार की समस्या के लिए मां पार्वती भक्ति सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। मां पार्वती की प्रसन्नता के साथ ही शिवजी, गणेशजी आदि सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त हो जाती है। अत: सभी प्रकार के ग्रह दोष भी समाप्त हो जाते हैं।

 

 

 

 

ज्योतिष के अनुसार कुंडली में कुछ विशेष ग्रह दोषों के प्रभाव से वैवाहिक जीवन पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे में उन ग्रहों के उचित ज्योतिषीय उपचार के साथ ही मां पार्वती को प्रतिदिन सिंदूर अर्पित करना चाहिए। सिंदूर को सुहाग का प्रतीक माना जाता है। जो भी व्यक्ति नियमित रूप से देवी मां की पूजा करता है उसके जीवन में कभी भी पारिवारिक क्लेश, झगड़े, मानसिक तनाव की स्थिति निर्मित नहीं होती है।

 

 

– सप्तम स्थान में स्थित क्रूर ग्रह का उपाय कराएं।

 

 

 

 

– मंगल का दान करें ।

 

 

 

 

– गुरुवार का व्रत करें।

 

 

 

 

– माता पार्वती का पूजन करें।

 

 

 

 

– सोमवार का व्रत करें।

 

 

 

 

– प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाएं और पीपल की परिक्रमा करें।

 

 

 

 

 

 

सौभाग्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्र

 

 

 

 

किसी भी श्रद्धा-विश्वास-युक्त स्त्री के द्वारा स्नानादि से शुद्ध होकर सूर्योदय से पहले नीचे लिखे मन्त्र की १० माला प्रतिदिन जप किये जाने से घर में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है तथा उसका सौभाग्य बना रहता है। किसी शुभ दिन जप का आरम्भ करना चाहिये तथा प्रतिवर्ष चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में विधिपूर्वक हवन करवा कर यथाशक्ति कुमारी, वटुक आदि को भोजनादि से संतुष्ट करना चाहिये। इस मन्त्र के हवन में समिधा केवल वट-वृक्ष की लेनी चाहिये।

 

 

 

 

मन्त्रः- ” ॐॐ ह्रीं ॐ क्रीं ह्रीं ॐ स्वाहा।”

 

 

 

 

साथ ही नीचे लिखे “सौभाग्याष्टित्तरशतनामस्तोत्र” का प्रतिदिन कम-से-कम एक पाठ करना चाहिये। इससे सौभाग्य की रक्षा होती है।

 

सौभाग्याष्टित्तरशतनामस्तोत्र—

 

 

 

 

निशम्यैतज्जामदग्न्यो माहात्म्यं सर्वतोऽधिकम्।

 

 

स्तोत्रस्य भूयः पप्रच्छ दत्तात्रेयं गुरुत्तमम्।।१

 

 

भगवंस्त्वन्मुखाम्भोजनिर्गमद्वाक्सुधारसम्।

 

 

पिबतः श्रोत्रमुखतो वर्धतेऽनुरक्षणं तृषा।।२

 

 

अष्टोत्तरशतं नाम्नां श्रीदेव्या यत्प्रसादतः।

 

 

कामः सम्प्राप्तवाँल्लोके सौभाग्यं सर्वमोहनम्।।३

 

 

सौभाग्यविद्यावर्णानामुद्धारो यत्र संस्थितः।

 

 

तत्समाचक्ष्व भगवन् कृपया मयि सेवके।।४

 

 

निशम्यैवं भार्गवोक्तिं दत्तात्रेयो दयानिधिः।

 

 

प्रोवाच भार्गवं रामं मधुराक्षरपूर्वकम्।।५

 

 

श्रृणु भार्गव यत्पृष्टं नाम्नामष्टोत्तरं शतम्।

 

 

श्रीविद्यावर्णरत्नानां निधानमिव संस्थितम्।।६

 

 

श्रीदेव्या बहुधा सन्ति नामानि श्रृणु भार्गव।

 

 

सहस्त्रशतसंख्यानि पुराणेष्वागमेषु च।।७

 

 

तेषु सारतरं ह्येतत् सौभाग्याष्टोत्तरात्मकम्।

 

 

यदुवाच शिवः पूर्वं भवान्यै बहुधार्थितः।।८

 

 

सौभाग्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्रस्य भार्गव।

 

 

ऋषिरुक्तः शिवश्छन्दोऽनुष्टुप् श्रीललिताम्बिका।।९

 

 

देवता विन्यसेत् कूटत्रयेणावर्त्य सर्वतः।

 

 

ध्यात्वा सम्पूज्य मनसा स्तोत्रमेतदुदीरयेत्।।१०

 

 

।।अथ नाममन्त्राः।।

 

 

ॐ कामेश्वरी कामशक्तिः कामसौभाग्यदायिनी।

 

 

कामरुपा कामकला कामिनी कमलासना।।११

 

 

कमला कल्पनाहीना कमनीय कलावती।

 

 

कमलाभारतीसेव्या कल्पिताशेषसंसृतिः।।१२

 

 

अनुत्तरानघानन्ताद्भुतरुपानलोद्भवा।

 

 

अतिलोकचरित्रातिसुन्दर्यतिशुभप्रदा।।१३

 

 

अघहन्त्र्यतिविस्तारार्चनतुष्टामितप्रभा।

 

 

एकरुपैकवीरैकनाथैकान्तार्चनप्रिया।।१४

 

 

एकैकभावतुष्टैकरसैकान्तजनप्रिया।

 

 

एधमानप्रभावैधद्भक्तपातकनाशिनी।।१५

 

 

एलामोदमुखैनोऽद्रिशक्रायुधसमस्थितिः।

 

 

ईहाशून्येप्सितेशादिसेव्येशानवरांगना।।१६

 

 

ईश्वराज्ञापिकेकारभाव्येप्सितफलप्रदा।

 

 

ईशानेतिहरेक्षेषदरुणाक्षीश्वरेश्वरी।।१७

 

 

ललिता ललनारुपा लयहीना लसत्तनुः।

 

 

लयसर्वा लयक्षोणिर्लयकर्त्री लयात्मिका।।१८

 

 

लघिमा लघुमध्याढ्या ललमाना लघुद्रुता।

 

 

हयारुढा हतामित्रा हरकान्ता हरिस्तुता।।१९

 

 

हयग्रीवेष्टदा हालाप्रिया हर्षसमुद्धता।

 

 

हर्षणा हल्लकाभांगी हस्त्यन्तैश्वर्यदायिनी।।२०

हलहस्तार्चितपदा हविर्दानप्रसादिनी।

 

 

रामा रामार्चिता राज्ञी रम्या रवमयी रतिः।।२१

 

 

रक्षिणी रमणी राका रमणीमण्डलप्रिया।

 

 

रक्षिताखिललोकेशा रक्षोगणनिषूदिनी।।२२

 

 

अम्बान्तकारिण्यम्भोजप्रियान्तभयंकरी।

 

 

अम्बुरुपाम्बुजकराम्बुजजातवरप्रदा।।२३

 

 

अन्तःपूजाप्रियान्तःस्थरुपिण्यन्तर्वचोमयी।

 

 

अन्तकारातिवामांकस्थितान्तस्सुखरुपिणी।।२४

 

 

सर्वज्ञा सर्वगा सारा समा समसुखा सती।

 

 

संततिः संतता सोमा सर्वा सांख्या सनातनी ॐ।।२५

 

 

।।फलश्रुति।।

 

 

एतत् ते कथितं राम नाम्नामष्टोत्तरं शतम्।

 

 

अतिगोप्यमिदं नाम्नां सर्वतः सारमुद्धृतम्।।२६

 

 

एतस्य सदृशं स्तोत्रं त्रिषु लोकेषु दुर्लभम्।

 

 

अप्रकाश्यमभक्तानां पुरतो देवताद्विषाम्।।२७

 

 

एतत् सदाशिवो नित्यं पठन्त्यन्ये हरादयः।

 

 

एतत्प्भावात् कंदर्पस्त्रैलोक्यं जयति क्षणात्।।२८

 

 

सौभाग्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं मनोहरम्।

 

 

यस्त्रिसंध्यं पठेन्नित्यं न तस्य भुवि दुर्लभम्।।२९

 

 

श्रीविद्योपासनवतामेतदावश्यकं मतम्।

 

 

सकृदेतत् प्रपठतां नान्यत् कर्म विलुप्यते।।३०

 

 

अपठित्वा स्तोत्रमिदं नित्यं नैमित्तिकं कृतम्।

 

 

व्यर्थीभवति नग्नेन कृतं कर्म यथा तथा।।३१

 

 

सहस्त्रनामपाठादावशक्तस्त्वेतदीरयेत्।

 

 

सहस्त्रनामपाठस्य फलं शतगुणं भवेत्।।३२

 

 

सहस्त्रधा पठित्वा तु वीक्षणान्नाशयेद्रिपून्।

 

 

करवीररक्तपुष्पैर्हुत्वा लोकान् वशं नयेत्।।३३

 

 

स्तम्भेत् पीतकुसुमैर्णीलैरुच्चाटयेद् रिपून्।

 

 

मरिचैर्विद्वेषणाय लवंगैर्व्याधिनाशने।।३४

 

 

सुवासिनीर्ब्राह्मणान् वा भोजयेद् यस्तु नामभिः।

 

 

यश्च पुष्पैः फलैर्वापि पूजयेत् प्रतिनामभिः।३५

 

 

चक्रराजेऽथवान्यत्र स वसेच्छ्रीपुरे चिरम्।

 

 

यः सदाऽऽवर्तयन्नास्ते नामाष्टशतमुत्तमम्।।३६

 

 

तस्य श्रीललिता राज्ञी प्रसन्ना वाञ्छितप्रदा।

 

 

एतत्ते कथितं राम श्रृणु त्वं प्रकृतं ब्रुवे।।३७

 

 

।।श्रीत्रिपुरारहस्ये श्रीसौभाग्याष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं।।

 

 

शुभ ग्रह हमेशा शुभ नहीं होते(पति पत्नी में अलगाव के ज्योतिषीय कारण )—

 

 

ज्योतिषीय नियम है कि कुंडली में अशुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल का ह्वास और शुभ ग्रहों से अधिष्ठित भाव के बल की समृद्धि होती है। जैसे, मानसागरी में वर्णन है कि केन्द्र भावगत बृहस्पति हजारों दोषों का नाशक होता है। किन्तु, विडंबना यह है कि सप्तम भावगत बृहस्पति जैसा शुभ ग्रह जो स्त्रियों के सौभाग्य और विवाह का कारक है, वैवाहिक सुख के लिए दूषित सिद्ध हुआ हैं।

 

 

यद्यपि बृहस्पति बुद्धि, ज्ञान और अध्यात्म से परिपूर्ण एक अति शुभ और पवित्र ग्रह है, मगर कुंडली में सप्तम भावगत बृहस्पति वैवाहिक जीवन के सुखों का हंता है। सप्तम भावगत बृहस्पति की दृष्टि लग्न पर होने से जातक सुन्दर, स्वस्थ, विद्वान, स्वाभिमानी और कर्मठ तथा अनेक प्रगतिशील गुणों से युक्त होता है, किन्तु ‘स्थान हानि करे जीवा’ उक्ति के अनुसार यह यौन उदासीनता के रूप में सप्तम भाव से संबन्धित सुखों की हानि करता है। प्राय: शनि को विलंबकारी माना जाता है, मगर स्त्रियों की कुंडली के सप्तम भावगत बृहस्पति से विवाह में विलंब ही नहीं होता, बल्कि विवाह की संभावना ही न्यून होती है।

 

 

यदि विवाह हो जाये तो पति-पत्नी को मानसिक और दैहिक सुख का ऐसा अभाव होता है, जो उनके वैवाहिक जीवन में भूचाल आ जाता हैं। वैद्यनाथ ने जातक पारिजात, अध्याय 14, श्लोक 17 में लिखा है, ‘नीचे गुरौ मदनगे सति नष्ट दारौ’ अर्थात् सप्तम भावगत नीच राशिस्थ बृहस्पति से जातक की स्त्री मर जाती है। कर्क लग्न की कुंडलियों में सप्तम भाव गत बृहस्पति की नीच राशि मकर होती है। व्यवहारिक रूप से उपयरुक्त कथन केवल कर्क लग्न वालों के लिए ही नहीं है, बल्कि कुंडली के सप्तम भाव अधिष्ठित किसी भी राशि में बृहस्पति हो, उससे वैवाहिक सुख अल्प ही होते हैं।

 

 

एक नियम यह भी है कि किसी भाव के स्वामी की अपनी राशि से षष्ठ, अष्टम या द्वादश स्थान पर स्थिति से उस भाव के फलों का नाश होता है। सप्तम से षष्ठ स्थान पर द्वादश भाव- भोग का स्थान और सप्तम से अष्टम द्वितीय भाव- धन, विद्या और परिवार तथा उनसे प्राप्त सुखों का स्थान है। यद्यपि इन भावों में पाप ग्रह अवांछनीय हैं, किन्तु सप्तमेश के रूप में शुभ ग्रह भी चंद्रमा, बुध, बृहस्पति और शुक्र किसी भी राशि में हों, वैवाहिक सुख हेतु अवांछनीय हैं। चंद्रमा से न्यूनतम और शुक्र से अधिकतम वैवाहिक दुख होते हैं। दांपत्य जीवन कलह से दुखी पाया गया, जिन्हें तलाक के बाद द्वितीय विवाह से सुखी जीवन मिला।

 

 

पुरुषों की कुंडली में सप्तम भावगत बुध से नपुंसकता होती है। यदि इसके संग शनि और केतु की युति हो तो नपुंसकता का परिमाण बढ़ जाता है। ऐसे पुरुषों की स्त्रियां यौन सुखों से मानसिक एवं दैहिक रूप से अतृप्त रहती हैं, जिसके कारण उनका जीवन अलगाव या तलाक हेतु संवेदनशील होता है। सप्तम भावगत बुध के संग चंद्रमा, मंगल, शुक्र और राहु से अनैतिक यौन क्रियाओं की उत्पत्ति होती है, जो वैवाहिक सुख की नाशक है।

 

 

‘‘यदि सप्तमेश बुध पाप ग्रहों से युक्त हो, नीचवर्ग में हो, पाप ग्रहों से दृष्ट होकर पाप स्थान में स्थित हो तो मनुष्य की स्त्री पति और कुल की नाशक होती है।’’सप्तम भाव के अतिरिक्त द्वादश भाव भी वैवाहिक सुख का स्थान हैं। चंद्रमा और शुक्र दो भोगप्रद ग्रह पुरुषों के विवाह के कारक है। चंद्रमा सौन्दर्य, यौवन और कल्पना के माध्यम से स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण उत्पन्न करता है।दो भोगप्रद तत्वों के मिलने से अतिरेक होता है। अत: सप्तम और द्वादश भावगत चंद्रमा अथवा शुक्र के स्त्री-पुरुषों के नेत्रों में विपरीत लिंग के प्रति कुछ ऐसा आकर्षण होता है, जो उनके अनैतिक यौन संबन्धों का कारक बनता है। यदि शुक्र -मिथुन या कन्या राशि में हो या इसके संग कोई अन्य भोगप्रद ग्रह जैसे चंद्रमा, मंगल, बुध और राहु हो, तो शुक्र प्रदान भोगवादी प्रवृति में वृद्धि अनैतिक यौन संबन्धों की उत्पत्ति करती है।

 

 

ऐसे व्यक्ति न्यायप्रिय, सिद्धांतप्रिय और दृढ़प्रतिज्ञ नहीं होते बल्कि चंचल, चरित्रहीन, अस्थिर बुद्धि, अविश्वासी, व्यवहारकुशल मगर शराब, शबाब, कबाब, और सौंदर्य प्रधान वस्तुओं पर अपव्यय करने वाले होते हैं। क्या ऐसे व्यक्तियों का गृहस्थ जीवन सुखी रह सकता है? कदापि नहीं। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि कुंडली में अशुभ ग्रहों की भांति शुभ ग्रहों की विशेष स्थिति से वैवाहिक सुख नष्ट होते हैं।


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