जन्मकुंडली से जाने पूर्व जन्म के ऋण

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जन्मकुंडली से जाने पूर्व जन्म के ऋण

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Astro Rakesh Periwal 16th Feb 2020

*ज्योतिष अनुसार ग्रह स्थिति से बनने वाले ऋण विचार* :
#पितृ_ऋण : कुंडली में बृहस्पति (गुरु) अपने पक्के घर 2, 5, 9, 12 भावों से बाहर हो और बृहस्पति के पक्के घरों (2,5,9,12) में बुध या शुक्र या शनि या राहु या केतु बैठा हो, तो व्यक्ति पितृ ऋण से पीड़ित होता है।
कारण : पितृ ऋण के कई कारण है। प्रारब्ध के कारण भी पितृ ऋण होता है। इसके अलावा तात्कालिक भी पितृ ऋष या दोष पैदा हो जाता है जैसे कि यदि आपने पास के मंदिर में तोड़ फोड़ हो, बढ़, पीपल, नीम, तुलसी सहित सात प्रमुख वृक्षों को काटा या कटवाया हो या पिता, दादा, नाना, कुल पुरोहित, पंडित आदि का अपमान किया हो।
#समाधान : इस ऋण को कुछ लोग पितृदोष भी कहते हैं। इस दोष में सूर्य का उपाय करना चाहिए। इसके अलावा यह उपाय घर के सभी सदस्यों को मिलकर ही करना चाहिए। परिवार के सभी सदस्यों से बराबर धन एकत्रित करके किसी मंदिर में दान कर दें। किसी पीपल के वृक्ष को लगातार 43 दिन तक पानी अर्पित करें।
#मातृ_ऋण : जब कुंडली में चन्द्रमा द्वितीय एवं चतुर्थ भाव से बाहर कहीं भी स्थित हो तथा चतुर्थ भाव में केतु हो तो व्यक्ति मातृ-ऋण से पीड़ित रहता है। अर्थात चन्द्रमा विशेषतः 3,6,8,10,11,12 भावों में स्थित हो तो। इसके अलावा जब केतु कुंडली के चौथे भाव में बैठा हो तब भी मातृ ऋण माना जाता है।
कारण : जातक के कुल में किसी बड़े या पूर्वज ने विवाह या बच्चा होने के बाद अपनी मां को छोड़ दिया हो, नजरअन्दाज किया हो, मां के दुखी और उदास होने पर उसकी परवाह न की हो या मां को किसी भी रूप में दुखी किया हो। यह भी संकेत हो सकता है कि पास के कुंए या नदी की पूजा करने के बजाय उसमें गंदगी और कचरा डाला जा रहा होगा।
#समाधान : इस में सर्वप्रथम मां की सेवा करना चाहिए। चंद्र का उपाय करना चाहिए। बहते पानी या नदी में एक चांदी का सिक्का बहाना चाहिए। माता दुर्गा से क्षमा मांगनी चाहिए। इसके अलाव अपने सभी रक्त (सगे) संबंधियों से बराबर-बराबर मात्रा में चांदी लेकर किसी नदी में बहाएं। यह काम एक ही दिन करना है।
#स्त्री_ऋण : जब शुक्र कुंडली के 3,4,5,6,9,10,11 भावों में स्थित हो तथा द्वितीय या सप्तम भाव में सूर्य, चन्द्र या राहु स्थित हो तो जातक स्त्री (पत्नी) के ऋण से ग्रस्त होता है। कारण : इसका कारण पूर्वजों द्वारा लोभ या विवाहेतर संबंधों के चलते पत्नी या परिवार की किसी स्त्री की हत्या की संभावना या किसी गर्भवती महिला को हानि पहुंचाना हो सकता है। इसका संकेत यह माना जा सकता है कि घर में ऐसे जानवर होंगे जो समूह में न रहते हों। पत्नी का मन दुखाने और उसका अपमान करने से यह ऋण निर्मित होता है जो व्यक्ति की बर्बादी का कारण भी बन जाता है।
#समाधान : स्त्री या पत्नीं का सम्मान करना और उन्हें खुश रखना सीखें। रक्त संबंधियों से बराबर मात्रा में पैसे लेकर उसका चारा खरीदें और दिन के किसी समय पर 100 गायों को एक ही दिन में हरा चारा खिलाएं। चरित्र को उत्तम बनाए रखें और माता लक्ष्मी की पूजा करें। पांच शुक्रवार को व्रत उपवास रखें।
#पुत्री-बहन_ऋण : जब कुंडली में बुध 1,4,5,8,9,10,11 भावों में स्थित हो तथा 3,6 भावों में चन्द्रमा हो तो व्यक्ति पुत्री और बहन के ऋण से ग्रस्त होता है। यह ऋण है तो नौकरी और व्यापार में व्यक्ति कभी तरक्की नहीं कर सकता और वह हमेशा चिंता से ही घिरा रहता है। कारण : इसका कारण किसी की बहन या बेटी की हत्या या उन्हें परेशान करने की संभावना हो सकती है या फिर किसी अविवाहित स्त्री या बहन के साथ विश्वासघात किया हो। इसका संकेते यह हो सकता है कि खोए हुए बच्चों को बेचना या उससे लाभ कमाने का प्रयास किया गया हो।

#समाधान : बहन को खुश रखने के उपाय पर विचार करें। बहन नहीं है तो बहन बनाएं और उसको हर तरह से सम्मानित करें। सारे परिजन पीले रंग की कौड़ियाँ लेकर एक जगह इकट्ठी करके जलाकर राख कर दें और उस राख को उसी दिन नदी में विसर्जित कर दें।
#भाई_का_ऋण : लाल किताब के अनुसार जब बुध या शुक्र किसी कुंडली के पहले या आठवें भाव में स्थित हों, तो उस जातक को भ्रातृ-ऋण या संबंधी-ऋण का भागी माना जाता है। इसे इस तरह समझें- कुंडली में मंगल 2,4,5,6,9,11 एवं 12 भावों में स्थित हो तथा प्रथम व अष्टम भाव में बुध, केतु स्थित हो, तो व्यक्ति रिश्तेदारी के ऋण से ग्रस्त होता है।
कारण: किसी पूर्वज द्वारा किसी दोस्त या रिश्तेदार के खेत या घर में आग लगाना या फिर भाई या संबंधी के प्रति द्वेष का भाव हो सकता है। दूसरा कारण घर में बच्चे के जन्म या उत्सव विशेष के वक्त घर से दूर रहना भी हो सकता है।
समाधान : भाई और रिश्तेदारों से संबंध अच्छे बनाएं। सभी परिजनों से रकम इकट्ठी करके किसी हकीम या वैद्य को दान करें। #आत्म-ऋण : पांचवें भाव में जब शुक्र, शनि, राहु या केतु स्थित हों या इनमें से किसी की युति पंचम भाव में हो, तो जातक आत्म-ऋण का भागी माना जाता है।
कारण : इसका कारण पूर्वजों द्वारा परिवार के रीति-रिवाजों और परम्पराओं से अलग होना या परमात्मा में अविश्वास हो सकता है। इसका संकेत यह है कि घर के नीचे आग की भट्ठियां होंगी या छ्त में सूर्य की रोशनी आने के लिए बहुत सारे छेद होंगे।
#समाधान : सभी संबंधियों के सहयोग से सूर्य यज्ञ का आयोजन करना चाहिए।
#क्रूरता-ऋण : सूर्य, चन्द्रमा या मंगल या इनमें से किसी की युति कुंडली के दसवें या बारहवें भाव में हो, तो जातक को इस ऋण से ग्रसित माना जाता है।
कारण: इसका कारण किसी की जमीन या पुश्तैनी घर जबरन हड़पना या फिर मकान-मालिक को उसके मकान या भूमि का पैसा न देना हो सकता है।
#समाधान: अलग-अलग जगह के सौ मजदूरों या मछलियों को सभी परिजन धन इकट्ठा करके एक दिन में भोजन कराएं।
#अजात-ऋण : लाल किताब के मुताबिक जब सूर्य, शुक्र या मंगल या फिर इन ग्रहों की युति कुंडली के बारहवें भाव में हो, तो जातक इस ऋण का भागी कहलाता है।
कारण : इसका कारण ससुराल-पक्ष के लोगों के साथ छल या फिर किसी को धोखा देने पर उसके पूरे परिवार का बर्बाद हो जाना है।
#समाधान : सभी परिजनों से एक-एक नारियल लेकर उन्हें एक जगह इकट्ठा करें और उसी दिन नदी में प्रवाहित कर दें। ससुराल पक्ष से संबंध अच्छे बनाए रखने से यह ऋण नहीं होता। #कुदरती_ऋण : जब चन्द्रमा या मंगल कुंडली के छठे भाव में स्थित हों, तो जातक इस ऋण से ग्रसित माना जाता है।
कारण : इसका कारण किसी कुत्ते को मारना या भतीजे से इतना कपट करना कि वह पूरी तरह बर्बाद हो जाए।
#समाधाना : एक ही दिन में सौ कुत्तों को एक दिन में सभी परिजनों के सहयोग से दूध या खीर खिलानी चाहिए। ऐसा नहीं कर पाने की स्थिति में किसी विधवा की सेवा करके उससे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। भैरव महाराज से क्षमा मांगना चाहिए।
#जालिमाना_ऋण: जब कुंडली में शनि 1,2,5,6,8,9,12 भावों में स्थिति हो तथा 10 या 11 भावों में सूर्य, चन्द्र और मंगल स्थित हो तो व्यक्ति जालिमाना ऋण से पीड़ित होता है। कारण: आपके पूर्वजों या पितरों ने किसी से धोखा किया या उसे घर से बाहर निकाल दिया या उसे गुजारा नहीं दिया होगा। घर का मुख्य द्वार दक्षिण दिशा में होगा अथवा घर की जमीन किसी ऐसे व्यक्ति से ली गई होगी जिसके पुत्र न हो या घर किसी सड़क या कुएं के ऊपर निर्मित होगा। #समाधान: अलग-अलग जगह की सौ मछलियों को सभी परिजन धन इकट्ठा करके एक दिन में भोजन कराएं। इसका विकल्प यह है कि अलग अलग जगह के 10 मजदूरों को भोजन कराएं। #अजन्मे_का_ऋण : जब कुंडली में राहु 3,6,12 भावों के अतिरिक्त किसी भी भाव में हो या 12वें भाव में सूर्य, मंगल और शुक्र मौजूद हो या दोनों ही प्रकार की स्थिति हो, तो व्यक्ति अजन्मे के ऋण से ग्रस्त होता है।
कारण : आपके पूर्वजों ने ससुराल-पक्ष के लोगों को धोखा दिया या किसी रिश्तेदार के परिवार के विनाश में भूमिका निभाई होगी। संकेत यह भी हो सकता है कि दरवाजे के नीचे कोई गंदा नाला बह रहा होगा या कोई विनाशित श्मशान होगा अथवा घर की दक्षिणी दीवार से जुडी कोई भट्ठी होगी।
#समाधान : सभी परिजनों से एक-एक नारियल लेकर उन्हें एक जगह इकट्ठा करें और उसी दिन नदी में प्रवाहित कर दें।
#संबंधी_ऋण : लाल किताब के अनुसार जब बुध और केतु कुंडली के पहले अथवा आठवें भाव में हो, तो संबंधी ऋण से ग्रसित माना जाता है।
कारण: हो सकता है कि आपके पूर्वजों ने किसी की फसल या घर में आग लगाई हो, किसी को जहर दिया हो अथवा किसी की गर्भवती भैंस को मार डाला हो। इसका संकेत यह भी हो सकता है कि घर में किसी बच्चे के जन्मदिन, त्योहारों या अन्य उत्सवों के समय अपने परिवार से दूर रहना अथवा रिश्तेदारों से न मिलना।
#समाधान : अपने सभी रक्त संबंधियों से बराबर मात्रा में पैसे लेकर उसे दूसरों की मदद के लिए किसी चिकित्सक को दें या उससे दवाएं खरीद कर धर्मार्थ संस्थाओं को दें।


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आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताआलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः | नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति || Laziness is verily the great enemy residing in our body. There is no friend like hard work, doing which one doesn’t decline. *मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही ( उनका ) सबसे बड़ा शत्रु होता है | परिश्रम जैसा दूसरा (हमारा )कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता |* हरि ॐ,प्रणाम, जय सीताराम।राम।

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