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दशावतार में ग्रहों का अंश

Acharya Sarwan Kumar Jha 09th Apr 2018

अपने एक ही अंश (एकांशेन जगत्सर्वं सृजत्यवति लीलया) से संसार की रचना, पालन-पोशन एवं संहार करने वाले श्री विष्णु के दशावतार प्रकरण में कहा गया है कि उनके सभी अवतार सूर्यादि ग्रहों से परमात्मांश प्राप्त कर हुए हैं । आगे हमलोग इसी को जानने का प्रयत्न करते हैं ।

सूर्य आदि सभी ग्रहों तथा ब्रह्मा, रूद्र आदि देवताओं तथा इनकी शक्ति - लक्ष्मी आदि में परमात्मांश अधिक होते हैं साथ ही बहुत से अन्य अवतारी देवताओं में भी परमात्मांश अधिक होते हैं । अन्य देवता आदि में जीवांश अधिक होते हैं ।

इसी जीवांश में परमात्मांश के विषय में बताते हुए महर्षि पराशर कहते हैं कि -

रामः कृष्णश्च भो विप्र नृसिंहः सूकरस्तथा ।

एते पूर्णावतारश्च ह्यन्ये जीवांशकान्विताः ।।

राम, कृष्ण, नृसिंह और वराह यही चार अवतार पूर्ण अवतार हैं अर्थात इसमें परमात्मांश अधिक है अन्य अवतारों में जीवांश भी मिश्रित है । हम लोग भी जानते हैं इन्हीं चार अवतारों कि संसार में विशेष चर्चा भी होती है ।

महर्षि पराशर कहते हैं कि अजन्मा परमेश्वर के अनेक अवतार हैं । उनमें जीवों को अपने कर्म के अनुरूप फलदेने हेतु सूर्यादि ग्रहरूप जनार्दन नामक अवतार हैं । इन्हीं ग्रहों से पूर्णपरमात्मांश प्राप्त कर विष्णु के अवतार कहे गए हैं ।

रामोऽवतारः सूर्यस्य चन्द्रस्य यदुनायकः ।

नृसिंहो भूमिपुत्रस्य बुद्धः सोमसुतस्य च ।।

वामनो विबुधेज्यस्य भार्गवो भार्गवस्य च ।

कुर्मो भास्कर पुत्रस्य सैंहिकेयस्य सूकरः ।।

केतोर्मीनावतारश्च ये चान्ये तेऽपि खेटजाः ।

पराम्तांशेऽधिको येषु ते सर्वे खेचराधिपः ।।

सूर्य परात्मांश प्राप्त कर रामचन्द्र जी का तथा इसी तरह, चन्द्र से कृष्ण, मंगल से नृसिंह, बुध से बुद्ध, बृहस्पति से वामन, शुक्र से परशुराम, शनि से कुर्म, राहु से वराह, केतु से मीन का अवतार हुआ । जिनमें अधिक परात्मा अंश हैं वे देवता कहलाते हैं ।

जगत में परमपिता परमेश्वर अवतरित होते हैं और अपने कार्यों को समाप्त कर सूर्यादि ग्रहों में ही लीन हो जाते हैं । सूर्यादि ग्रहों से ही अधिक जीवांश प्राप्त कर मनुष्यादि जीव भी अपने कर्मफल को भोगकर उन्हीं ग्रहों में लीन हो जाते हैं तथा प्राकृतिक  प्रलय के समय सभी ग्रहादि परमात्मा में लीन हो जाते हैं । अर्थात सृष्टि और प्रलय जब-जब हुए हैं या होने वाले हैं परमात्मांश परमात्मा जानते हैं । यह ज्ञान बिना ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान से नहीं जाना जा सकता इसलिए सतोगुणी विद्वानों को ज्योतिष शास्त्र अवश्य पढ़ना चाहिए ।

ज्योतिषाचार्य श्रवण झा “आशुतोष”


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